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राम नाईक राज्य का ‘जन’पाल

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81 वर्षीय राम नाईक ने उत्तर प्रदेश में अपने बूते बनी और दौड़ती समाजवादी पार्टी सरकार की मनमानी कभी चलने नहीं दी। 2014 में 22 जुलाई को राज्यपाल का पद संभालने के पश्चात से वे अपनी पृष्ठभूमि के नाते भूमिका को लेकर खासा चर्चा में रहे हैं। सत्तारूढ़ पार्टी के ‘बेलगाम नेता’ शुरू से उनकी ‘सक्रिय लोकरुचि’ पर विवाद खड़ा करते आये हैं। नाईक इससे बेपरवाह रहे और उन्होंने राज्य के ‘संवैधानिक संरक्षक’ की भूमिका का सम्यक निर्वहन किया है। परिणामस्वरूप, लोकप्रिय सरकार होने के बावजूद मोहर माने जाने वाले राज्यपाल पद पर रहकर भी वे व्यक्तिगत सक्रियता से राज्य के ‘जन’-पाल बन गये हैं। समस्याओं का समाधान हो या नहीं, राज्य के हजारों नागरिक अपनी तमाम तरह की दिक्कतों में उनके यहां दरख्वास्त लेकर दौड़ते नजर आते हैं। नाईक के डेढ़ साल के कार्यकाल पर स्वतंत्र राजनीतिक चिन्तक डॉ. मत्स्येन्द्र प्रभाकर का विश्लेषण.

पांच बार सांसद एवं तीन बार विधायक रह चुके राम नाईक उन अव्वल नेताओं में हैं जिनकी सियासी पृष्ठभूमि गहरी है। उनके स्वतंत्र विचार, सामाजिक सरोकार तथा लोकचिन्तन की जमीनी पकड़ है। बिना छुट्टी के काम करने वाले नाईक ‘राज्यपाल’ पद को ‘पेंशनर’ नहीं मानते। वे इस बात पर हमेशा जोर देते हैं कि उनके पद की जिम्मेदारी ‘वैधानिक मोहर’ भर की नहीं है। राज्यपाल पद पर अपनी भूमिका को संवैधानिक दायरे में रखते हुए भी उन्होंने पांव राजभवन तक सीमित नहीं रखे। पूर्ववर्ती (कार्यकारी राज्यपाल) डॉ. अजीज कुरैशी की तरह ‘दरबार’ नहीं लगाया परन्तु अपने आगमन के साथ ही राजभवन के दरवाजे सलीके के साथ सभी के लिए खोलने की घोषणा कर दी थी। 

संवैधानिक नजर : लोक जीवन में सक्रियता तथा जागरूकता के चलते राज्यपाल राम नाईक ने राज्य सरकार को कभी बेफिक्र और मदमस्त नहीं होने दिया। यह अनेक नेताओं, विशेष रूप से सत्तासीन पार्टी के अनेक नेताओं को शुरू से नागवार लगती आयी है। दूसरी तरफ अधिकांशत: उनकी पूर्ववर्ती दलीय सम्बद्धता के कारण कई बड़बोले नेताओं ने नाईक को लेकर बहुत बार विवाद खड़ा करने की कोशिश की। 

सियासत के फन्दे से बेदाग बचे : राज्यपाल बनने के बाद अयोध्या के सर्वाधिक विवादित मामले में एक सवाल पर उनके जवाब को आधार बनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर उनको पद से हटाने तक की गयी। यद्यपि ‘सिटिजंस फॉर डेमोक्रेसी’ की इस याचिका को अदालत ने ठुकरा दिया। एक साल पहले 12 जनवरी को उच्च न्यायालय तथा 2015 में ही 10 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने यह मत अधिष्ठापित किया कि ‘राज्यपाल राम नाईक की कार्य-भूमिका संविधान के दायरे में है। साथ ही, वे अपने कार्य, पद की गरिमा का ख्याल रख कर करते हैं।’

संविधानिक मर्यादा का ध्यान : श्री नाईक के कार्य तथा भूमिका के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश (न्यायमूर्ति) ऋषि राम मिश्र कहते हैं “ऐसा कार्य वही कर सकता है जिसको संविधान और इसके प्रावधानों की सही जानकारी हो। साथ-साथ वह जनता के हित सही तरीके से समझता हो, उसके जन-सरोकार स्वाभाविक लगाव के हों।” जाहिर है कि नाईक में एक साथ ये सारे गुण हैं। 

नया प्रतिमान : राज्यपाल बनने के पहले भी नाईक ने जनप्रतिनिधि की भूमिका को सही ढंग से समझा। वे सार्वजनिक जीवन को शुरू से जिम्मेदारी एवं जवाबदेही वाला मानते आये हैं। सांसद रहते हुए उन्होंने अपने साल भर के काम का ब्योरा ‘लोकसभा में राम नाईक’ शीर्षक से जनता के बीच जारी करते हुए नया प्रतिमान कायम किया। इस परम्परा को उन्होंने 2004 से ‘लोकसेवा में राम नाईक’ नाम से जारी रखा जब वे चुनाव में अभिनेता गोविन्दा से हारने के बाद सांसद नहीं रह गये थे। यह सिलसिला प्रदेश में राज्यपाल पद पर तीन महीने और फिर एक साल का कार्यकाल बीतने पर क्रमश: ‘राजभवन में राम नाईक’ तथा ‘राजभवन में राम नाईक 2014-15’ के रूप में प्रकाशित किया जा चुका है।  

जवाबदेही सर्वोपरि : राम नाईक लोक जीवन में सक्रिय रहते हुए जनता से संवाद को जरूरी मानते हैं। उनके विचार में राज्यपाल का पद प्रदेश के ‘संवैधानिक मुखिया’ का ही नहीं, सबसे बड़े जिम्मेदार का भी है। इसी धारणा के चलते जवाबदेही एवं पारदर्शिता के मद्देनजर अपने सभी आयोजनों, कार्यक्रमों तथा किसी भी ऐसी बात को जिसकी जानकारी जनता को होनी चाहिए, शुरू से ही लिखित सूचनाओं तथा चित्रों के जरिये प्रेस तथा मीडिया को उपलब्ध कराया। अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके केवल पहले साल के कार्यकाल में पिछले साल 21 जुलाई तक राजभवन से 368 विज्ञप्तियां जारी की गयीं। यह एक रिकॉर्ड है।

राजभवन को जनता ने जाना : 2014 में 8 अगस्त से उसी साल 3 सितम्बर तक राजस्थान के राज्यपाल का दायित्व अतिरिक्त कार्यभार के रूप में संभाल चुके राम नाईक का संवैधानिक कार्यों, जिम्मेदारियों को सही ढंग से समझने का नतीजा यह हुआ है कि लोकप्रिय सरकार होने के बावजूद राजभवन में जन-आस्था बढ़ी है जिसके कार्यों के बारे में पहले आम जनता को न कोई जानकारी हुआ करती थी और न ही कोई दिलचस्पी ही। इसके साथ ही नाईक प्रदेश के ऐसे पहले राज्यपाल हो गये हैं जो हमेशा बिना किसी भेदभाव के सभी राजनीतिक दलों के लोगों से समान रूप से मिलते आये हैं। 

सीएम से मधुर सम्बन्ध : सरकार के कामकाज पर लगातार निगरानी रखने के बावजूद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से उनके सम्बन्ध इसलिए मधुर हैं क्योंकि नाईक ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाया है। 

सजग जिम्मेदार : यह राज्यपाल की सतत जागरूकता का नतीजा रहा है कि राज्य सरकार मनमर्जी चलाकर उन सभी लोगों को विधान परिषद में सदस्य मनोनीत करवाने में नाकामयाब रही जिन्हें विवादास्पद और अच्छी छवि न होने के बावजूद वह राजनीतिक कारणों से उपकृत करना चाहती थी। इसी तरह राज्य में स्वच्छ छवि का लोकायुक्त तथा मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त होने में भी राज्यपाल की अहम भूमिका रही है। हालांकि उन्होंने न्यायालय से लेकर संविधान तक के निर्देशों का सदा सम्मान किया है। 

मर्यादित जीवन- स्वच्छ कार्यशैली : राज्यपाल राम नाईक सभी प्रकार से मर्यादित जीवन और कार्यशैली के हिमायती है। वे अपने पद पर रहते हुए संविधान को सर्वोच्च मानते हैं और कहते हैं कि जनता भी उनसे इसी प्रकार के काम की अपेक्षा रखती है। उनका कहना है कि उनके कामों का ‘संरक्षक-ऑब्जर्वर’ संविधान तथा न्यायपालिका है और परीक्षक राष्ट्रपति; जबकि उनकी सीमा-रेखा जनता के हित और राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करती है।

“जनता को यह जानने का अधिकार हासिल है कि उनके जनप्रतिनिधि या संवैधानिक संस्थाओं की क्या कार्य पद्धति है तथा उनके योगदान क्या हैं?”  सिर्फ साल भर की सक्रियता के आंकड़े

प्राप्त प्रार्थना पत्र  44,066 
 जन मिलन  5,810
 लखनऊ में कार्यक्रम जिनमेंशिरकत की  206
 राजधानी से बाहर कार्यक्रम  110
 प्रदेश के बाहर कार्यक्रम 42
 दीक्षान्त समारोह में शिरकत:  21
 राज्य व 8 निजी/केन्द्रीय विवि  राजभवन में कार्यक्रम  32
 केन्द्रीय मंत्री/राज्य मंत्रियों, मुख्यमंत्री, मंत्रियों, राजदूतों से हुई भेंट  29
 राष्ट्रपति को लिखे पत्र  19
 प्रधानमंत्री को लिखे पत्र  37
 उपराष्ट्रपति और केन्द्रीय मंत्रियों को लिखे पत्र  64
 सीएम और मंत्रियों को  175