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वोट की राजनीति एवं दरकती राष्ट्रीयता

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हमारे जिन छात्रों पर भारत के भविष्य गढ़ने, संवारने और उसे विश्व मानचित्र के शिखर पर पहुंचाने की जिम्मेदारी है क्या देशवासी उनसे यही उम्मीद करते हैं कि पढ़-लिखकर, अच्छी शिक्षा प्राप्त कर वह भारत माता की जय के जगह पाकिस्तान जिन्दाबाद और भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाएंगे। यह बोलने की आजादी की कौन सी स्वतंत्रा का परिचायक है।

 

नौ फरवरी को जो जेएनयू में घटित हुआ उसने देशवासियों को कमजोर कर दिया है। किसी राजनीतिक दल को इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि इस देश की जनता राष्ट्रविरोधी नारों को सहन कर लेगी। देश में अराजक स्थिति होने पर कोई किसी की पहचान नहीं करता। कुल मिलाकर इससे देशवासियों का नुकसान ही होता है। देश सुरक्षित है तो ही देशवासी सुरक्षित हैं। कई नेता जिन्होंने इस घटना का समर्थन किया है या जो इसके पीछे खड़े हैं उन्हें अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के बहुत अवसर मिलेंगे। जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाकर सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है।'

आज देश में भाजपा एवं एनडीए की सरकार है तो विपक्षी दल तोहमत लगा रहे हैं कि वर्तमान केंद्र सरकार देश में भगवाकरण करना चाहती है और विरोधियों को यह सरकार सहन नहीं करती तो आज यदि केंद्र में यूपीए की सरकार रहती तो ऐसी घटनाओं को क्या मूकदर्शक हो देखती रहती। जब न्यूज चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषक यहां तक कहते हैं कि कांग्रेस देश का विभाजन कराना चाहती है तो यह अपने आप में बड़ी बात है। वोट की राजनीति हमारे कई नेताओं पर इस तरह सवार है कि उन्हें भटकते बच्चों को समझाने के बजाए उनके पीछे खड़े होने में ज्यादा फायदा नजर आ रहा है।

देश विरोधी नारे खुले जगह लगे या किसी चहारदीवारी के अंदर लोगों को यह समझ होनी चाहिए कि सरकार के लम्बे हाथ हर तक पहुंचते हैं। सहिष्णुता, असहिष्णुता पर उठे विवाद की पराकाष्ठा ही है कि बोलने की आजादी के नाम पर कुछ भी बोल सकते हैं यहां तक कि पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाना। हमारे देश के छात्र हों, बुद्विजीवी या कोई हमें यह ख्याल रखना चाहिए कि जिस देश में जन्म लिये हैं पल रहे हैं, बढ़ रहे हैं, जीविका के साधन प्राप्त हो रहा है, सम्मान मिल रहा है सबको देश के प्रति सच्ची निष्ठा रखना बेहद जरूरी है। जेएनयू प्रकरण में कोई निर्दोष छात्र न फंसे इसका भी ख्याल रखा जाना चाहिए, जो भी पार्टी या राजनीतिक दल इस संवेदनशील मुद्दे को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन कर रहे दिखते हैं उन्हें स्थिति की नाजुकता को समझने और इस पर विजय पाने के लिए एकजुट प्रयास करना चाहिए। इससे देश में विस्फोटक स्थिति पैदा होने का वातावरण बनता है। जेएनयू में जो घटित हुआ उसकी लपट जादवपुर यूनिवर्सिटी में दिखी तो गम्भीर संकेत देती है।

जब सरकार को देश में रह रहे तथाकथित राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वालों से निपटने के लिए लम्बे समय का इंतजार करना पड़ सकता है तो ऐसे में देशवासियों को क्या मान लेना चाहिए कि भारत सरकार के अवांछित लोग जो पाकिस्तान में रह रहे हैं और जिन्हें सरकार पाकिस्तान से लौटाने की बात करती है वह कोरी कल्पना है। जेएनयू प्रकरण में सत्ता पक्ष और विपक्ष में क्या वोटों के सह-मात का खेल ही महत्वपूर्ण हो गया है और राष्ट्रहित गौड़ हो गया है। देश का कोई विश्वविद्यालय या कोई अन्य संस्थान देश से बड़ा कैसे हो सकता है। आखिर कोई संप्रभू सरकार देश के अंदर देश के विरुद्ध लगने वाले नारों को कैसे सह सकती है। गनीमत है कि देश में कानून का राज है जहां सबकी नजरें अदालतों पर टिकी रहती है।