उर्दू ड्रामा कार्यशाला में विवाद, नाटक के मंचन से पहले चार प्रतिभागियों को हटाने का आरोप

लखनऊ। उर्दू अकादमी, लखनऊ से जुड़ी तीन माह की नाट्य कार्यशाला में नाटक के मंचन से ठीक पहले चार प्रतिभागियों को हटाए जाने का मामले को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। प्रतिभागियों का आरोप है कि उन्होंने तीन महीने तक नियमित रूप से कार्यशाला में हिस्सा लिया और उन्हें सौंपे गए सभी कार्य पूरी मेहनत और लगन से किए। इसके बावजूद 16 अक्टूबर को होने वाले नाटक के मंचन से कुछ दिन पहले उन्हें कार्यशाला से बाहर कर दिया गया। प्रतिभागियों के अनुसार, इस कार्यशाला से जुड़े नाटक ’‘जिस लाहौर नई वेख्या ओ जम्याई नी’’ का निर्देशन एनएसडी (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) से प्रशिक्षित निर्देशक राजेंद्र सिंह कर रहे हैं। कार्यशाला की समन्वयक सीमा मोदी हैं, जबकि उर्दू अकादमी के सचिव शौकत अली हैं। इस बारे में सीमा मोदी ने कहा कि भी प्रतिभागी को नाटक से निकाला नहीं गया है। वह खूद छोड़कर गए हैं। नाटक इन सभी प्रतिभागियों की भूमिका अहम थी। उनके हट जाने से इन पात्रों के लिये हमे अगल से कलाकारों को प्रशिक्षण देना पड़ रहा है। कुछ प्रतिभागियों नाटक के रिहलसल के समय को लेकर दिक्कत थी। सीमा मोदी ने कहा कि नाटक में कौन अभियन करेगा यह प्रतिभागी तय नहीं करता है।

अभिनय में भागीदारी को लेकर शुरू हुआ विवाद
प्रतिभागियों के मुताबिक, विवाद उस समय शुरू हुआ जब उन्होंने कार्यशाला की समन्वयक सीमा मोदी के नाटक में अभिनय करने को लेकर सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को अभिनय का प्रशिक्षण देना और उन्हें मंच पर अवसर प्रदान करना है, तो नाटक में प्रतिभागियों के अवसरों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

प्रतिभागियों का आरोप है कि इस विषय पर सवाल उठाने के बाद भी उनकी आपत्ति पर विचार नहीं किया गया। उनका कहना है कि जब उन्होंने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी, तो उन्हें जवाब मिला कि वह स्वयं नाटक से नहीं हटेंगी और उन्हें जो करना है, कर सकते हैं। इसके बाद चार प्रतिभागियों को हटाए जाने का आरोप लगाया गया है।

तीन महीने की मेहनत के बाद हटाए जाने से नाराज़ प्रतिभागी
इस मामले में जिन चार प्रतिभागियों के नाम सामने आए हैं, उनमें ’श्याम देव महतो, बृजेश कुमार, शैलजा और नीलम’ शामिल हैं। इन प्रतिभागियों का कहना है कि उन्होंने तीन महीने तक नियमित रूप से कक्षाओं में भाग लिया। कार्यशाला के दौरान उन्हें जो भी जिम्मेदारियाँ दी गईं, उन्हें पूरी गंभीरता और लगन के साथ निभाया। उनका कहना है कि उन्होंने इस उम्मीद के साथ मेहनत की थी कि उन्हें अपनी कला प्रदर्शित करने और रंगमंच पर काम करने का अवसर मिलेगा।

प्रतिभागियों का सवाल है कि यदि किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना ही कार्यशाला से बाहर किए जाने का कारण बन जाए, तो प्रशिक्षण के दौरान संवाद और असहमति के लिए जगह कहाँ बचेगी?
उनका यह भी कहना है कि नाटक का मंचन 16 अक्टूबर को निर्धारित है और ऐसे समय में कार्यशाला से हटाए जाने के कारण उनकी तीन महीने की मेहनत और आगे अभिनय करने की संभावनाओं पर असर पड़ा है।
कार्यशाला के उद्देश्य पर उठे सवाल
इस घटनाक्रम ने कार्यशालाओं में प्रतिभागियों की भूमिका, अभिनय के अवसरों के वितरण और आयोजकों की जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

रंगमंच की कार्यशालाओं का उद्देश्य केवल एक नाटक तैयार करना नहीं, बल्कि नए कलाकारों को प्रशिक्षण देना, उनकी प्रतिभा विकसित करना और उन्हें मंच का अनुभव प्रदान करना भी होता है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि कार्यशाला में भूमिकाओं का निर्धारण किन आधारों पर किया जाता है और प्रतिभागियों की आपत्तियों को सुनने की क्या व्यवस्था है।
हालाँकि, किसी समन्वयक का नाटक में अभिनय करना अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन यदि प्रतिभागियों को लगता है कि उनके अवसर प्रभावित हुए हैं, तो उनके सवालों पर निष्पक्षता से विचार किया जाना चाहिए।
निष्पक्ष जाँच और स्पष्टीकरण की माँग
चारों प्रतिभागियों ने अपने साथ हुई इस घटना को लेकर सवाल उठाए हैं। मामले में कार्यशाला के आयोजकों और संबंधित जिम्मेदार लोगों का पक्ष सामने आना भी आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्रतिभागियों को हटाने का निर्णय किन कारणों से लिया गया और क्या उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया गया था।
’अब सवाल यह है कि तीन महीने तक लगातार मेहनत करने वाले प्रतिभागियों को नाटक के मंचन से ठीक पहले हटाने का निर्णय क्यों लिया गया? क्या इस फैसले के पीछे कोई स्पष्ट कारण था, और क्या प्रतिभागियों को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिला?’
लेखक के बारे में
Santosh Kumar Singh
श्री सिंह ‘विजुअल लाइव’ मासिक पत्रिका एवं न्यूज पोर्टल के संपादक के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्ष 2004 से उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए पत्रकारिता का लंबा अनुभव अर्जित किया है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक राष्ट्रीय सहारा, डेली न्यूज एक्टिविस्ट, राष्ट्रीय स्वरूप और भारत प्रतिदिन सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए उन्होंने रिपोर्टिंग की है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के लखनऊ आगमन से लेकर राजनीति, प्रशासन, जनसरोकार और शहर की महत्वपूर्ण घटनाओं की रिपोर्टिंग में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। श्री सिंह की विशेष रुचि खोजी पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों के प्रभावी इस्तेमाल में है। इंटरनेट आधारित शोध, सूचना के स्रोतों की पड़ताल और खबर की बारीकियों तक पहुंचने की उनकी कार्यशैली उन्हें अलग पहचान देती है। बदलते मीडिया परिदृश्य में वे तथ्यपरक, विश्वसनीय और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं। पत्रकारिता के साथ उन्हें संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनका मानना है कि एक पत्रकार के लिए जिज्ञासा, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति और तथ्यों के प्रति ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। Santosh Kumar Singh की सभी खबरें देखें →
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