कानपुर में शौचालयों की कमी, और सुविधा की नई परिभाषा: हमसे खाए, हमारे यहाँ जाए!

शहर में खाने की डिलीवरी मिनटों में हो सकती है, लेकिन इंसान को शौचालय कहाँ मिलेगा—इस सवाल का जवाब अब भी इतना आसान नहीं है।
कानपुर एक ऐसा शहर है जहाँ जिंदगी तेजी से चलती है। बाजार भागते हैं, सड़कें दौड़ती हैं, ट्रैफिक रेंगता है और मोबाइल पर Blinkit तथा Zomato जैसे ऐप लोगों की सुविधा के लिए हर समय तैयार दिखाई देते हैं। भूख लगी है? खाना हाजिर। दूध खत्म हो गया? कुछ मिनट में दरवाजे पर। घर में सामान नहीं है? मोबाइल उठाइए, ऑर्डर कीजिए और इंतजार कीजिए।
लेकिन इस आधुनिक सुविधा के बीच एक छोटा-सा सवाल है, जिसका कोई ऐप अभी तक सर्वमान्य समाधान नहीं दे पाया है—घर से बाहर निकले इंसान को शौचालय जाना हो तो वह कहाँ जाए?
यह सवाल सुनने में छोटा है, लेकिन शहर की नागरिक व्यवस्था का पूरा रिपोर्ट कार्ड अपने भीतर समेटे हुए है।
शहर स्मार्ट हो रहा है, मगर शरीर अभी पुराने ढर्रे पर है
तकनीक ने हमारी जिंदगी को सुविधाजनक बनाने का दावा किया है। अब बाजार जाने की जरूरत कम हुई है, सामान घर पहुँच जाता है। मगर तकनीक शायद यह मानकर चल रही है कि शहर में रहने वाला नागरिक या तो घर से निकलने से पहले अपनी सभी शारीरिक जरूरतें पूरी कर चुका होगा, या फिर उसकी जरूरतें किसी ऐप की डिलीवरी विंडो के हिसाब से चलती होंगी।
काश, मानव शरीर भी स्मार्टफोन की तरह होता! जब तक सार्वजनिक शौचालय न मिले, उसे एयरप्लेन मोड पर डाल दिया जाता। जरूरत पड़ने पर दोबारा चालू कर लेते।
हकीकत यह है कि कानपुर में सार्वजनिक शौचालयों की उपलब्धता और उनकी उपयोगिता दोनों सवालों के घेरे में हैं। अगस्त 2026 में नमक फैक्ट्री चौराहे से विजय नगर की ओर एक सार्वजनिक शौचालय में पानी न होने की खबर सामने आई। मई 2026 में विकास नगर मार्केट के व्यापारियों ने भी सार्वजनिक शौचालयों की कमी का मुद्दा उठाया था।
यानी कहीं शौचालय नहीं है, कहीं है तो पानी नहीं। नागरिक सुविधा का यह ऐसा मॉडल है जिसमें भवन का उद्घाटन हो सकता है, बजट खर्च हो सकता है और तस्वीर भी खिंच सकती है—बस सुविधा का वास्तव में काम करना जरूरी नहीं कि उसी उत्साह से हो।
हमसे खाए, हमारे यहाँ जाए!
अब जरा नए डिजिटल कारोबार की दुनिया को देखिए। कंपनियाँ उपभोक्ता की हर जरूरत को एक अवसर की तरह पहचानती हैं। खाने से लेकर किराने तक, दवा से लेकर घरेलू सामान तक, बाजार हमारे मोबाइल में समा गया है।
इस सुविधा की व्यवस्था में डिलीवरी पार्टनर भी दिनभर सड़कों पर रहते हैं। वे एक दुकान से सामान उठाते हैं, दूसरी जगह पहुँचाते हैं, ट्रैफिक और मौसम से जूझते हैं और समय पर ऑर्डर पहुँचाने की कोशिश करते हैं।
मगर उनके लिए भी एक बुनियादी सवाल है—डिलीवरी के बीच शौचालय कहाँ है?
Zomato की ओर से डिलीवरी पार्टनरों के लिए रेस्ट पॉइंट और शौचालय जैसी सुविधाओं से जुड़े प्रयासों की जानकारी सार्वजनिक की गई है। कंपनी ने 2023 में अपने 'Shelter Project' के तहत ऐसी सुविधाओं का उल्लेख किया था। 2025 में उसकी मूल कंपनी Eternal ने भी रेस्ट पॉइंट संबंधी पहलों की जानकारी दी। इसका अर्थ है कि समस्या को कम-से-कम कुछ स्तर पर पहचाना गया है; लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर घोषित पहल का मतलब यह नहीं कि कानपुर के हर व्यस्त बाजार, चौराहे या डिलीवरी रूट पर ऐसी सुविधा उपलब्ध है।
और यहीं व्यंग्य का असली बिंदु सामने आता है। हम डिजिटल अर्थव्यवस्था में इतने आगे बढ़ गए हैं कि खाना पहुँचाने वाले की गति माप सकते हैं, लेकिन उसके लिए रास्ते में बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं, इसका हिसाब उतनी तत्परता से नहीं रखते।
शहर कह सकता है—हमने शौचालय बनाए हैं। कंपनी कह सकती है—हमने रेस्ट पॉइंट बनाए हैं। नागरिक पूछ सकता है—बहुत अच्छा, लेकिन मेरे सामने वाले बाजार में वह सुविधा कहाँ है?
'हमसे खाए, हमारे यहाँ जाए' का यह वाक्य केवल मजाक नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर टिप्पणी है जिसमें सुविधा का कारोबार बढ़ रहा है, पर सार्वजनिक सुविधा की जिम्मेदारी अब भी अक्सर धुँधली बनी हुई है।
शौचालय कोई विलासिता नहीं, नागरिक अधिकारों से जुड़ी बुनियादी जरूरत है
सार्वजनिक शौचालय का सवाल केवल राहगीर की असुविधा का सवाल नहीं है। इसका संबंध महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा, बुजुर्गों, दिव्यांगजनों, बच्चों, दुकानदारों, रिक्शा चालकों, सफाई कर्मचारियों और डिलीवरी पार्टनरों से है।
किसी महिला को बाजार में शौचालय न मिले तो उसकी खरीदारी का समय सीमित हो सकता है। बुजुर्ग व्यक्ति लंबे समय तक बाहर रहने से बच सकता है। सड़क पर काम करने वाले व्यक्ति को जरूरत रोकनी पड़ सकती है या अस्वच्छ विकल्प तलाशना पड़ सकता है। यह शहर में समान भागीदारी का भी सवाल है—क्या सार्वजनिक स्थान सभी के लिए वास्तव में उपयोग योग्य हैं?
इसलिए केवल शौचालयों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं। यह भी देखना होगा कि वे कहाँ हैं, कितने समय खुले रहते हैं, पानी और बिजली उपलब्ध हैं या नहीं, सफाई नियमित होती है या नहीं, महिलाओं और दिव्यांगजनों के लिए व्यवस्था कैसी है और शिकायत करने पर कार्रवाई होती है या नहीं।
किसी दीवार पर 'स्वच्छ शहर' लिख देना और शहर को वास्तव में स्वच्छ तथा सुविधाजनक बनाना दो अलग-अलग काम हैं।
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समाधान क्या है—एक और ऐप या काम करता हुआ शौचालय?
कानपुर नगर निगम और संबंधित एजेंसियों को सार्वजनिक शौचालयों की वार्डवार सूची और उनकी वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। हर शौचालय की लोकेशन, खुलने का समय, पानी, सफाई, उपयोग शुल्क और शिकायत के लिए संपर्क उपलब्ध होना चाहिए।
बाजारों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशन के आसपास, अस्पतालों, प्रमुख चौराहों और व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार नई सुविधाएँ बनाई जाएँ। लेकिन निर्माण के बाद संचालन और रखरखाव की जवाबदेही भी तय हो। खराब सुविधा की शिकायत पर समाधान का समय निर्धारित किया जाए।
इसके साथ निजी कंपनियाँ, बाजार संघ और नगर निगम मिलकर ऐसे रेस्ट पॉइंट विकसित कर सकते हैं जहाँ डिलीवरी पार्टनर और अन्य सड़ककर्मी पानी, बैठने की जगह और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का इस्तेमाल कर सकें। जहाँ संभव हो, मौजूदा पेट्रोल पंपों, दुकानों और अन्य प्रतिष्ठानों के साथ साझेदारी की जा सकती है।
तकनीक यहाँ मददगार हो सकती है—ऐप या नक्शे पर चालू शौचालयों की जानकारी, वास्तविक समय में स्थिति और शिकायत दर्ज करने की सुविधा देकर। लेकिन तकनीक का काम सुविधा का विकल्प बनना नहीं, उसे खोजने और इस्तेमाल करने में मदद करना है।
आखिरकार शहर की प्रगति का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितने ऑर्डर कितनी जल्दी पहुँच रहे हैं। यह भी देखना होगा कि उस ऑर्डर को पहुँचाने वाला व्यक्ति रास्ते में अपनी बुनियादी जरूरत पूरी कर सकता है या नहीं।
आखिर में एक सीधा सवाल
कानपुर को तेज रफ्तार कारोबार चाहिए, आधुनिक बाजार चाहिए, डिजिटल सेवाएँ चाहिए और निवेश भी चाहिए। यह सब जरूरी हो सकता है। मगर इन सबके बीच नागरिक सुविधाएँ पीछे छूट जाएँ, तो विकास की तस्वीर अधूरी रह जाती है।
जिस शहर में भूख का समाधान मोबाइल से मिल सकता है, वहाँ शौचालय का समाधान केवल किस्मत पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। कंपनियाँ सुविधा के नए बाजार खोजती रहें, लेकिन नगर व्यवस्था को उन सुविधाओं की जिम्मेदारी भी समझनी होगी जो बिकाऊ सेवा नहीं, सार्वजनिक जरूरत हैं।
क्योंकि शहर का असली आधुनिक होना इस बात से तय नहीं होगा कि खाना कितने मिनट में पहुँचा, बल्कि इससे भी कि शहर में रहने और काम करने वाले इंसान को अपनी बुनियादी जरूरत पूरी करने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी।
डिस्क्लेमर: यह लेख व्यंग्य की शैली में लिखा गया है, लेकिन सार्वजनिक शौचालयों की उपलब्धता, स्वच्छता और उपयोग योग्य सुविधाओं की कमी एक गंभीर नागरिक मुद्दा है। इसका उद्देश्य किसी कंपनी पर अप्रमाणित आरोप लगाना नहीं, बल्कि शहर और संबंधित संस्थाओं का ध्यान बुनियादी जरूरतों की ओर आकर्षित करना है। यदि आप कानपुर में इस समस्या से जुड़े हैं, तो सत्यापित जानकारी, तस्वीरें और संबंधित स्थान के विवरण साझा करें तथा इस मुद्दे को जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों, नगर निगम और संबंधित अधिकारियों तक पहुँचाने में सहयोग करें।
लेखक के बारे में
Ankit Awasthi
श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें →
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