प्रो. सुमित सरकार: स्थापित इतिहास को चुनौती देने वाला बेबाक कलमकार
(आलेख : रबीकर गुप्ता, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)
13 अगस्त, 2026 का दिन इतिहास की देवी 'क्लियो' के लिए दुख का दिन था, क्योंकि आधुनिक भारत के महान इतिहासकारों और इतिहास के सबसे बड़े चहेतों में से एक, प्रोफ़ेसर सुमित सरकार ने अपनी आखिरी सांस ली। 87 साल की उम्र में, प्रोफ़ेसर सरकार बीमारी से अपनी लंबी लड़ाई हार गए। उनके परिवार में उनकी पत्नी, मशहूर इतिहासकार तानिका सरकार और उनके बेटे आदित्य सरकार हैं। प्रोफ़ेसर सरकार का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसी संस्था का अचानक ढह जाना है, जिसकी मौजूदगी को हम इतने लंबे समय से सामान्य बात मान रहे थे। उनके निधन के साथ, उन बुद्धिजीवियों की संख्या और कम हो गई है, जो मानते हैं कि बुद्धिजीवियों का काम सिर्फ़ कैरियर को आगे बढ़ाने के लिए 'आइवरी टावर' (आम लोगों से दूर ऊंचे ओहदे पर बैठे रहना) में बैठकर शोध पेपर और किताबें लिखना नहीं है।
प्रोफ़ेसर सरकार का जन्म 1939 में कलकत्ता के एक ब्राह्मो परिवार में हुआ था। उनके अकादमिक कामों और अकादमिक दायरे से बाहर की सक्रियता को आगे बढ़ाने वाली सोच यहीं पर बनी और विकसित हुई। उनके पिता, प्रोफ़ेसर सुसोभन चंद्र सरकार, प्रेसिडेंसी कॉलेज में इतिहास पढ़ाते थे। वे मार्क्सवादी ऐतिहासिक विश्लेषण के शुरुआती अग्रदूतों में से एक थे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लंबे समय से मित्र थे। सुमित सरकार ने भी अपने पिता के रास्ते पर ही चलना चुना। उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर किया और कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की। दिल्ली आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक बर्दवान और कलकत्ता विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाया। प्रोफ़ेसर सरकार ने 1974 में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाना शुरू किया और बेहतर मौकों की तलाश में कहीं और जाने के बजाय, उन्होंने इस संस्थान को अपने जीवन के तीन दशक दिए।
प्रोफ़ेसर सरकार उस समय (शायद आज भी) एक क्रांतिकारी तरीके से पढ़ाते थे। उनकी कक्षा का पहला हिस्सा साधारण व्याख्यान जैसा लगता था। वे छात्रों के सामने उस दिन के विषय से जुड़ी एक मानक ऐतिहासिक आख्यान रखते थे, जिसके समर्थन में कई तथ्य होते थे। लेकिन कक्षा के बीच में, जब छात्रों को लगता था कि वे प्रोफ़ेसर की बात समझ गए हैं, तो सरकार अचानक अपना रुख बदल लेते थे। बहुत मेहनत से एक आख्यान बनाने के बाद, वे उसे व्यवस्थित तरीके से तोड़ते और उसका विश्लेषण करते थे। इसके लिए वे उन तथ्यों का इस्तेमाल करते थे, जिन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया गया था, उन आवाज़ों को सामने लाते थे, जिन्हें भुला दिया गया था, और उन लेखों का ज़िक्र करते थे, जिनकी नए नज़रिए से व्याख्या की जा सकती थी। जादू की तरह, वह आख्यान खुद-ब-खुद बदल जाता था और कई बार तो वह आख्यान बिल्कुल वैसा नहीं होता था, जैसा कक्षा ने शुरू में सोचा था। इस पूरी प्रक्रिया के ज़रिए, प्रोफ़ेसर सरकार अपने छात्रों को दो महत्वपूर्ण बातें सिखाते थे : अ) कोई भी मान्यता इतनी पक्की नहीं, कोई भी आख्यान इतना अटूट नहीं, और कोई भी घटना इतनी पवित्र नहीं कि उसे नए तथ्यों के आधार पर तोड़ा और नए नज़रिए से समझा न जा सके, और ब) उन्होंने अपने छात्रों के मन में मार्क्स का पसंदीदा सिद्धांत बैठाया -- ‘हर चीज़ पर शक करो’।
प्रोफ़ेसर सरकार इतिहास को द्वंद्वात्मक नज़रिए से देखते थे और मानते थे कि यह हमेशा गतिशील रहता है। वे घटनाओं के किसी साफ़-सुथरे और सरल पाठ में कभी विश्वास नहीं करते थे ; बल्कि वे हमेशा उन अनेक और जटिल ऐतिहासिक प्रवृत्तियों और ताक़तों को खोजने की कोशिश करते थे, जो अक्सर साफ़-सुथरे आख्यानों के पीछे छिपी रहती हैं। उनके इस नज़रिए को उनकी पहली किताब में ही देखा जा सकता है, जो उनकी पीएचडी थीसिस भी थी — 'द स्वदेशी मूवमेंट इन बंगाल, 1903-1908' (1973 में प्रकाशित)। इस किताब में सुमित सरकार ने एक ऐसे आंदोलन को चुना, जिसके बारे में सब कुछ कहा जा चुका था, और फिर उस साफ़-सुथरे राष्ट्रीय आख्यान को पूरी तरह से चुनौती दी। अख़बार के लेखों, नाटकों, कविताओं और यहाँ तक कि अप्रकाशित संस्मरणों जैसे विभिन्न स्रोतों का इस्तेमाल करके सरकार ने स्वदेशी आंदोलन की नई व्याख्या की। उन्होंने इतिहास को धूल-धूसरित अभिलेखागारों से निकालकर संस्कृति और जन-स्मृतियों के जीवंत दायरे में ला खड़ा किया। इस तरह के स्रोतों का उनका क्रांतिकारी इस्तेमाल अब एक मानक तरीका बन गया है, लेकिन ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने ही इसकी शुरुआत की थी।
उस समय तक राष्ट्रीय आंदोलन की सभी घटनाओं को एक ऐसी पवित्र भूमि माना जाता था, जहाँ कोई इतिहासकार केवल सम्मान के साथ ही कदम रख सकता था। प्रोफ़ेसर सरकार एक ऐसे व्यक्ति थे, जो परंपराओं और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने से नहीं डरते थे। उनकी बेबाक, लेकिन निष्पक्ष जांच-पड़ताल ने स्वदेशी आंदोलन से जुड़े राष्ट्रीय मिथकों की परतें खोल दीं। उन्होंने 'भद्रलोक' नेतृत्व की उन कमियों को उजागर किया, जिन पर पहले किसी का ध्यान नहीं गया था और जिनका विश्लेषण नहीं हुआ था — ये नेता हमेशा आंदोलन को अपने नियंत्रण में रखना चाहते थे। इसके साथ ही, उन्होंने आंदोलन से जुड़े हिंदू प्रतीकों और खास सांस्कृतिक ढांचे का भी ज़िक्र किया, जिनका इस्तेमाल अंग्रेजों ने मुस्लिम जनता को आंदोलन से दूर रखने के लिए किया था, और उन उग्र मज़दूर आंदोलनों का भी ज़िक्र किया, जिन्होंने 'नीचे से दबाव' बनाया था।
इसके बाद सरकार ने इस किताब में इस्तेमाल किए गए तरीकों को एक बहुत बड़े दायरे में लागू किया — 19वीं सदी के आखिर से लेकर आज़ादी तक के पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौर पर। इसका नतीजा प्रोफ़ेसर सरकार की सबसे मशहूर किताब 'मॉडर्न इंडिया, 1885-1947' के तौर पर सामने आया। लाल रंग की यह मोटी किताब, जिसे कई पीढ़ियों के इतिहास के लाखों छात्रों ने पसंद किया, सुमित सरकार के इतिहास को देखने के नज़रिए को सबसे दूर-दराज़ के कॉलेजों तक ले गई। इस किताब का मकसद सिर्फ़ तथ्यों को बताना नहीं था, और लेखक ने शुरू से ही यह बात साफ़ कर दी थी। किताब के हर दूसरे वाक्य में सरकार का विश्लेषण करने का अनोखा अंदाज़ दिखता है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को एक साफ़-सुथरा, एक जैसा और एक ही दिशा में चलने वाला आंदोलन मानने की गलतफहमी को सिलसिलेवार ढंग से तोड़ा और उन अलग-अलग ताकतों और उनके अलग-अलग एजेंडों को सामने लाया, जिन्होंने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। सुमित सरकार के काम में कांग्रेस सिर्फ़ एक पार्टी के तौर पर नहीं, बल्कि एक मंच के तौर पर उभरती है। मज़दूर, किसान और आदिवासी महज़ 'राष्ट्रीय नेताओं' के इशारे पर चलने वाली बेबस भीड़ के रूप में नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी और एजेंडे वाली ताकतों के रूप में सामने आते हैं ; कई मामलों में उन्होंने नीचे से इतना ज़बरदस्त दबाव बनाया कि स्वतंत्रता संग्राम की दिशा ही बदल गई और 'राष्ट्रीय नेताओं' को लोगों के साथ कदम मिलाने के लिए भाग-दौड़ करनी पड़ी। 'लोकप्रिय' आंदोलन और 'मध्यम वर्ग' का नेतृत्व — औपनिवेशिक भारत के आखिरी दौर पर प्रोफ़ेसर सरकार का यह काम उनके सबसे अनोखे कामों में से एक है। वे दिखाते हैं कि कैसे 'मध्यम वर्ग' का नेतृत्व हमेशा 'लोकप्रिय' आंदोलनों की ऊर्जा को अपने निश्चित लक्ष्य की तरफ़ मोड़ने के लिए बेचैन रहता था, लेकिन साथ ही उससे किसी भी तरह की सामाजिक क्रांति के पैदा होने से बहुत डरता भी था। इन नए विश्लेषणों को सरकार की बहुत सारे विषयों पर ज़बरदस्त पकड़ का सहारा मिला था। उनकी पढ़ाई-लिखाई का दायरा कितना बड़ा था, यह उनके निबंधों के संग्रह 'राइटिंग सोशल हिस्ट्री' को पढ़कर समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने भारतीय इतिहास लेखन में ई.पी. थॉम्पसन की अहमियत से लेकर विद्यासागर की बौद्धिक और सामाजिक दुनिया जैसे अलग-अलग विषयों पर बात की है।
प्रोफ़ेसर सरकार की एक बड़ी खूबी यह थी कि वे अपने ही काम का विश्लेषण भी उसी बेबाक, शक करने वाले और लीक से हटकर सोचने वाले नज़रिए से करते थे। उनके मुताबिक, इतिहास में कोई भी बात आखिरी नहीं होती। समय के साथ इतिहास से जुड़े सवाल बदलते रहते हैं और उनके साथ इतिहास का विश्लेषण भी। अपने कैरियर के आखिर में, जब ज़्यादातर अकादमिक अपनी पुरानी कामयाबियों के सहारे आराम करते हैं, सुमित सरकार ने पीछे मुड़कर देखा, तो पाया कि उनकी सबसे असरदार किताब, 'मॉडर्न इंडिया, 1885-1947', काफी पुरानी हो चुकी थी और अब आज के सवालों के जवाब नहीं दे सकती थी। इसका हल उन्होंने यह निकाला कि किताब को शुरू से आखिर तक पूरी तरह से दोबारा लिखा जाए। इसके बाद जो किताब तैयार हुई, 'मॉडर्न टाइम्स : इंडिया 1880-1950', उसमें लिंग, पर्यावरण और सिनेमा जैसे अलग-अलग विषयों को शामिल किया गया और उन पर बात की गई। इससे किताब का पूरा ढांचा ही बदल गया। किसी इतिहासकार द्वारा अपनी ही किताब में इतने बड़े पैमाने पर बदलाव के बहुत कम उदाहरण मिलते हैं। अपने ही काम को लेकर इसी लगातार शक करने की आदत की वजह से उन्होंने 1980 के दशक के आखिर में 'सबॉल्टर्न ग्रुप' की दिशा पर सवाल उठाए थे ; यह वही ग्रुप था, जिसके साथ उन्होंने काफी समय बिताया था और जिसमें अहम योगदान दिया था।
प्रोफ़ेसर सरकार का मानना था कि उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ 'नीचे से दबाव' का विश्लेषण करने और उन दबे-कुचले वर्गों के बारे में लिखने तक सीमित नहीं थी, जिनकी आवाज़ को ताकतवर लोगों ने दबा दिया था। उनके विचारों ने उन्हें बार-बार अकादमिक दुनिया के ऊँचे और अलग-थलग दायरे से बाहर निकलकर आम लोगों के बीच आने के लिए प्रेरित किया। प्रोफ़ेसर सरकार लोगों को पवित्र, कभी गलती न करने वाला या हमेशा सही मानने वालों में से नहीं थे। लेकिन उनका मानना था कि लोगों के साथ खड़े रहना हमेशा उनका फ़र्ज़ है। इस मामले में वे पुराने रूसी 'नरोदनिक' (जन-आंदोलनकारी) जैसे थे। वे एक छात्र की तरह जन-आंदोलनों में शामिल होते थे और अपनी विद्वता के बावजूद कभी यह नहीं सोचते थे कि वे उस औद्योगिक मज़दूर से ज़्यादा जानते हैं, जिसके साथ वे चल रहे हैं। उन्होंने हमेशा जन-आंदोलनों के जोश को सही दिशा देने और अकादमिक जगत में भी वैसी ही भावना जगाने की कोशिश की। दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के विरोध-प्रदर्शनों में उनकी उत्साहपूर्ण और सक्रिय भागीदारी ने इस कोशिश को और मज़बूत किया।
प्रोफ़ेसर सरकार हमेशा अपने विचारों पर दोबारा सोचते और उनमें बदलाव करते रहते थे। लेकिन उनकी सोच में एक बात हमेशा एक जैसी रही : आरएसएस-भाजपा और एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में 'हिंदुत्व' का उन्होंने हमेशा बिना किसी समझौते के विरोध किया। उनका यह विरोध उसी गहरी विश्लेषणात्मक सोच पर आधारित था, जो उनकी पहचान थी। 'खाकी शॉर्ट्स एंड सैफ़्रन फ़्लैग्स : अ क्रिटिक ऑफ़ द हिंदू राइट' और 'फ़ासिज़्म : एसेज़ ऑन यूरोप एंड इंडिया' नाम की दो किताबों में उनके योगदान को हर उस व्यक्ति को बार-बार पढ़ना चाहिए, जो उस सर्वव्यापी ताकत को समझना चाहता है, जो आज भारत पर राज कर रही है।
प्रोफ़ेसर सुमित सरकार अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन उनका हर बात पर सवाल उठाने वाला और लीक से हटकर सोचने का नज़रिया, साफ़-सुथरे और साधारण आख्यानों को नापसंद करना, और घटनाओं की गहराई में जाकर उनके पीछे की ताकतों को पहचानने का उनका शानदार तरीका — ये सब चीजें उनके हज़ारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष छात्रों के बीच आज भी ज़िंदा है। इसके साथ ही, एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और देश के लोगों में उनका अटूट विश्वास भी कायम है। जब तक उनके बताए तरीके और उनके माने हुए आदर्श इतने सारे लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगे, तब तक उनकी सोच और उनका प्रभाव भी जीवित रहेगा।
(लेखक शोधार्थी हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 9424231650)
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