भारत का नारियल फाइबर उद्योग बना रोजगार और उद्यमिता का मजबूत आधार

नई दिल्ली। भारत का नारियल फाइबर (कॉयर) उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने, रोजगार के अवसर पैदा करने और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा रहा है। नारियल के बाहरी छिलके से प्राप्त प्राकृतिक रेशे से चटाई, रस्सी, गद्दे, ब्रश और जैविक उर्वरक जैसे कई उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। केंद्र सरकार की योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता से इस पारंपरिक उद्योग में उद्यमिता और नवाचार को भी बढ़ावा मिल रहा है।
सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 में भारत से नारियल फाइबर और इससे बने उत्पादों का निर्यात 1,630.33 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 6,614.40 करोड़ रुपये हो गया। इस तरह पिछले 12 वर्षों में निर्यात में 305.70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अमेरिका, चीन, नीदरलैंड, स्पेन और ब्रिटेन भारतीय कॉयर उत्पादों के प्रमुख निर्यात बाजार हैं।
21 हजार से अधिक इकाइयां पंजीकृत
नारियल फाइबर क्षेत्र में उद्यम पंजीकरण पोर्टल पर 21,000 से अधिक इकाइयां पंजीकृत हैं। मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी में इस क्षेत्र से जुड़े रोजगार के आंकड़ों में अलग-अलग स्तर पर उल्लेख किया गया है। इसके तहत एक ओर 23 लाख लोगों को रोजगार मिलने की बात कही गई है, वहीं पंजीकृत इकाइयों के विवरण में 2.3 लाख लोगों के कार्यरत होने का आंकड़ा भी दिया गया है। उद्योग में ग्रामीण परिवारों की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत वैश्विक स्तर पर नारियल फाइबर और इससे बने उत्पादों का प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक है। देश में नारियल के छिलकों से प्राकृतिक रेशा निकालकर उसका प्रसंस्करण किया जाता है और उससे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जाते हैं। इससे कृषि आधारित कच्चे माल का बेहतर उपयोग होने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर भी बढ़ते हैं।
कॉयर विकास योजना से उद्योग को मिल रहा प्रोत्साहन
एमएसएमई मंत्रालय की कॉयर विकास योजना (सीवीवाई) का उद्देश्य कॉयर उद्योग का सतत विकास करना और कारीगरों तथा उद्यमियों को सहायता उपलब्ध कराना है। योजना के अंतर्गत नई तकनीकों, मशीनों और उत्पादों के विकास, कौशल प्रशिक्षण, घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रचार और व्यापार मेलों में भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाता है। इसके साथ ही निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने तथा उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता भी दी जाती है।
12 वर्षों में प्रशिक्षण और नवाचार को बढ़ावा
मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2014-15 से अब तक विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से 68,000 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है। इनमें 80 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। कॉयर क्षेत्र में 150 से अधिक नई मशीनों, तकनीकों और मूल्यवर्धित उत्पादों को बढ़ावा मिला है। इसके अलावा, 1,000 से अधिक निर्यातकों की अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भागीदारी सुगम बनाई गई और निर्यात बाजार प्रोत्साहन के तहत 850 से अधिक उद्यमियों को 20 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय सहायता प्रदान की गई। देशभर में 1,400 से अधिक प्रचार कार्यक्रम आयोजित किए गए और 950 से अधिक प्रदर्शनियों में भागीदारी की गई।
सरकारी योजनाओं से सफल हो रहे उद्यमी
महाराष्ट्र की रंजना रामचंद्र कदम: सिंधुदुर्ग जिले की रंजना रामचंद्र कदम ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत कॉयर इकाई स्थापित की। कॉयर बोर्ड के मार्गदर्शन से उन्होंने मशीनरी और उपकरण प्राप्त किए। उनकी इकाई में कॉयर की रस्सियां, तकिए और डोरमैट बनाए जाते हैं। इस उद्यम से छह लोगों को पूर्णकालिक रोजगार मिला है।
केरल के सुरेंद्रन पी.: कोझिकोड स्थित संपूर्ण प्लस एग्रो फर्टिलाइजर एंटरप्राइजेज को कॉयर बोर्ड और केंद्रीय कॉयर अनुसंधान संस्थान से प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन मिला। इकाई ने एक वर्ष के भीतर 500 से अधिक ग्राहकों का आधार बनाया और 20 टन से अधिक कॉयर पिथ जैव-उर्वरक की बिक्री दर्ज की। यहां पांच लोग कार्यरत हैं, जिनमें दो महिलाएं शामिल हैं।
आंध्र प्रदेश की अल्लम गौथमी: पूर्वी गोदावरी जिले की गौथमी ने कॉयर बोर्ड के प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन के बाद एडिगो कॉयर प्रोडक्ट्स नाम से अपना उद्यम शुरू किया। पीएमईजीपी के तहत वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली इस इकाई का वार्षिक कारोबार लगभग 35 लाख रुपये और वार्षिक लाभ करीब 10 लाख रुपये बताया गया है। उद्यम छह महिलाओं को रोजगार देता है। साथ ही, गौथमी ने लगभग 120 महिलाओं को कॉयर मैट बुनाई, रस्सी बनाने और हस्तशिल्प उत्पादन का प्रशिक्षण देने में योगदान दिया है।
केरल के जी. साबू: अलाप्पुझा के जी. साबू ने वर्ष 2024 में पीएमईजीपी के तहत कॉयर कताई इकाई शुरू की। दो वर्षों के भीतर उनकी इकाई स्थानीय कॉयर समितियों और निर्माताओं को सूत एवं रस्सी की आपूर्ति करने लगी। इससे आसपास के गांवों के 8 से 10 श्रमिकों को रोजगार मिला, जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं।
सतत विकास में अहम भूमिका
नारियल फाइबर उद्योग प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग, पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के निर्माण और ग्रामीण उद्यमिता को प्रोत्साहित करने का माध्यम बन रहा है। निर्यात में बढ़ोतरी, कौशल विकास और महिला उद्यमियों की भागीदारी से यह क्षेत्र रोजगार सृजन के साथ भारत के सतत एवं समावेशी आर्थिक विकास में भी योगदान दे रहा है।
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