अगले दौर के सुधारों में नियमन में ढील पर जोर: राजीव गौबा

नई दिल्ली। नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 में भारत के अगले दौर के आर्थिक सुधारों के लिए नियमन को सरल और कम बोझिल बनाने पर जोर दिया। “विनियमन से परिवर्तन तक: भारत की अगली पीढ़ी के सुधार ढांचे का निर्माण” विषय पर अनौपचारिक चर्चा में उन्होंने कहा कि भारत को विकास की गति बनाए रखने के लिए ऐसी नियामक व्यवस्था की जरूरत है, जो भरोसे पर आधारित हो और नवाचार के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए।
पुराने सुधारों ने अर्थव्यवस्था को दी नई दिशा
राजीव गौबा ने पिछले एक दशक में किए गए प्रमुख सुधारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वस्तु एवं सेवा कर (GST), दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) और उदारीकृत विदेशी निवेश व्यवस्था ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। उन्होंने कहा कि इन सुधारों के जरिए रक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में निजी भागीदारी के अवसर बढ़े हैं और अब परमाणु ऊर्जा क्षेत्र भी खुल रहा है।
उन्होंने कहा कि अगली पीढ़ी के सुधारों की प्रमुख पहचान ‘डीरेगुलेशन’ यानी अनावश्यक नियमन को कम करना होनी चाहिए। लाइसेंस, मंजूरी, अनुमति और बार-बार नवीनीकरण की प्रक्रियाओं को कम करके कारोबार के लिए अधिक सरल और पूर्वानुमानित व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है।

कानून और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की होगी समीक्षा
गौबा ने कानूनों, नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की व्यवस्थित समीक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री द्वारा प्रतिपादित विश्वास आधारित शासन के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए इस दिशा में उच्च स्तरीय समिति काम कर रही है।
उन्होंने कहा कि कई महत्वपूर्ण सुधार राज्य सरकारों और नगर निकायों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ऐसे में राज्य और शहरों के स्तर पर भी विश्वास आधारित शासन को बढ़ावा देना जरूरी है। इसके लिए गठित विनियमन कार्यबल की ओर से किए जा रहे प्रयासों का भी उन्होंने उल्लेख किया।
‘प्रतिस्पर्धी बढ़त वाला सहकारी संघवाद’ पर जोर
राजीव गौबा ने केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को ‘प्रतिस्पर्धी बढ़त वाला सहकारी संघवाद’ बताया। उन्होंने पूंजी निवेश के लिए राज्यों को दी जाने वाली विशेष सहायता योजना और शहरी चुनौती कोष का उदाहरण देते हुए कहा कि योजनाओं के प्रोत्साहन को सुधार के लक्ष्यों से जोड़ा जा रहा है तथा परियोजनाओं का चयन चुनौती पद्धति के जरिए किया जा रहा है।
फिनटेक में नवाचार और नियमन के बीच संतुलन जरूरी
फिनटेक क्षेत्र पर चर्चा करते हुए गौबा ने भारत की तेज प्रगति और वित्तीय समावेशन में इसके योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और अकाउंट एग्रीगेशन फ्रेमवर्क जैसी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को भारत की बड़ी उपलब्धियों के रूप में बताया।
उन्होंने कहा कि भारत का मॉडल इस विचार पर आधारित है कि सरकार खुले, सुरक्षित और अंतर-संचालनीय डिजिटल ढांचे तैयार करे, जिनके आधार पर निजी क्षेत्र नवाचार और नई सेवाओं का विकास कर सके। तकनीक आधारित क्षेत्रों में नियमन का उद्देश्य जनहित की रक्षा के साथ-साथ नवाचार को बढ़ावा देना होना चाहिए।
जोखिम के अनुरूप हो नियामक व्यवस्था
गौबा ने कहा कि नियामक ढांचे सिद्धांत आधारित, प्रौद्योगिकी-तटस्थ और जोखिम के अनुपात में होने चाहिए। इसके साथ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, बुनियादी ढांचे तक गैर-भेदभावपूर्ण पहुंच सुनिश्चित करने और सूचना की असमानता कम करने की जरूरत है।
उन्होंने वित्तीय नियामकों के बीच बेहतर समन्वय, सरल और पूर्वानुमानित अनुपालन व्यवस्था तथा डिजिटल प्रणालियों में घर्षण और अंतर-संचालनीयता की समस्याओं को कम करने पर भी जोर दिया।
निवेशकों का भरोसा बढ़ाने पर सरकार का फोकस
राजीव गौबा ने कहा कि निष्पक्ष व्यवहार, पूर्वानुमानित नीतियां, मजबूत डेटा प्रबंधन और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार की पहल से निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे भारत में दीर्घकालिक घरेलू और विदेशी पूंजी आकर्षित करने का आधार मजबूत होगा।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि सुधार केवल अलग-अलग नीतिगत फैसलों तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें शासन की संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को उन्होंने एक राष्ट्रीय प्रयास बताते हुए कहा कि सरकार, उद्योग और नागरिकों की सामूहिक भूमिका से देश की सुधार और विकास की गति को बनाए रखा जा सकता है।
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