गिद्ध संरक्षण को लेकर पंचकुला में बड़ा अभियान, भूपेंद्र यादव ने सुरक्षित क्षेत्रों के निर्माण पर दिया जोर

पंचकुला। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 के अवसर पर हरियाणा के पंचकुला में भारत में गिद्ध संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने ‘संकट से उबरना—भारत के गिद्धों का संरक्षण’ विषय पर आयोजित कार्यशाला का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने गिद्धों के लिए लगातार सुरक्षित क्षेत्र विकसित करने और वन्यजीव संरक्षण के लिए तकनीकी क्षमता को मजबूत करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में हरियाणा के पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव मंत्री राव नरबीर सिंह, केंद्र और हरियाणा सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, पशु चिकित्सक, चिड़ियाघर विशेषज्ञ तथा संरक्षण कार्यकर्ता मौजूद रहे। कार्यशाला का उद्देश्य देश में गिद्ध संरक्षण के लिए विभिन्न विभागों और संस्थाओं के बीच सहयोग को मजबूत करना रहा।

गिद्ध प्रकृति की सफाई व्यवस्था का अहम हिस्सा
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृत पशुओं के शवों को तेजी से खाकर ये पक्षी पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में मदद करते हैं और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में योगदान देते हैं।

भारत में निवासी और प्रवासी गिद्धों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें श्वेत-पूंछ वाले, लंबी चोंच वाले, पतली चोंच वाले, लाल सिर वाले, मिस्र के गिद्ध, हिमालयी ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, सिनेरियस और दाढ़ी वाले गिद्ध शामिल हैं।
मंत्री ने कहा कि 1990 के दशक से भारत में गिद्धों की आबादी में तेजी से गिरावट देखी गई है। इसके पीछे उनकी खाद्य श्रृंखला में आए बदलाव और पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दर्द निवारक दवाओं से जुड़ा खतरा प्रमुख कारणों में रहा है।
गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों पर जोर
भूपेंद्र यादव ने गिद्ध संरक्षण के लिए ‘संपूर्ण सरकार’ और ‘संपूर्ण समाज’ के समन्वित प्रयासों की जरूरत बताई। उन्होंने गिद्ध-सुरक्षित पशु चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने, सुरक्षित भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े तकनीकी कौशल को मजबूत करने पर जोर दिया।
उन्होंने पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, स्थानीय प्रशासन और समुदायों से सुरक्षित शव प्रबंधन की व्यवस्था अपनाने तथा गिद्ध संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील की।

पिंजोर का जटायु संरक्षण केंद्र बना महत्वपूर्ण केंद्र
कार्यशाला से पहले केंद्रीय मंत्री ने पिंजोर स्थित जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र (जेसीबीसी) का दौरा किया। उन्होंने केंद्र का निरीक्षण किया और गिद्ध संरक्षण से जुड़े अधिकारियों के साथ बातचीत की।
हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) की संयुक्त पहल से विकसित जेसीबीसी सफेद-पूंछ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों के संरक्षण प्रजनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
केंद्र में वैज्ञानिक पालन-पोषण, कृत्रिम ऊष्मायन, पशु चिकित्सा देखभाल, प्रजनन और आनुवंशिक प्रबंधन जैसे कार्य किए जा रहे हैं।

एक साल में 35 चूजों का सफल प्रजनन
जेसीबीसी की उपलब्धियां गिद्ध संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। 2025-26 के दौरान केंद्र ने 356 गिद्धों को आश्रय दिया और 35 चूजों का सफलतापूर्वक प्रजनन कराया। इसके अलावा 87 गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने या पुनर्वास के लिए योगदान दिया गया, जबकि 90 पक्षियों को दूसरे संरक्षण-प्रजनन संस्थानों में स्थानांतरित किया गया।
केंद्र ने गिद्ध संरक्षण से जुड़े तकनीकी कौशल को बढ़ाने के लिए भी काम किया। इस अवधि में 22 संस्थानों के 1,222 प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया गया।
हरियाणा के मंत्री राव नरबीर सिंह ने कहा कि संरक्षण प्रजनन की सफलता को केवल पैदा होने वाले पक्षियों की संख्या से नहीं आंका जाना चाहिए। इसके साथ स्वस्थ और आनुवंशिक रूप से प्रबंधित आबादी तैयार करना, वैज्ञानिक ज्ञान विकसित करना, तकनीकी क्षमता बढ़ाना और पक्षियों के प्राकृतिक आवास में संरक्षण में योगदान भी महत्वपूर्ण है।
जटायु की कहानी’ का विमोचन
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में ‘जटायु की कहानी: भारत के गिद्धों का संरक्षण’ नामक कॉफी टेबल बुक का विमोचन भी किया गया। इसमें देश में गिद्धों की आबादी में आई गिरावट से लेकर पिंजोर में संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम के विकास तक की यात्रा को दर्शाया गया है।

इस अवसर पर गिद्ध संरक्षण को लेकर आयोजित ऑनलाइन चित्रकला और डिजिटल फोटोग्राफी प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार भी प्रदान किए गए।
संरक्षण से संकट से उबरने की ओर
अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 का आयोजन भारत में गिद्ध संरक्षण के लिए विज्ञान, नीति, सुरक्षित पशु चिकित्सा पद्धतियों, संरक्षण प्रजनन और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ किया गया।
गिद्धों की संख्या में गिरावट ने पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव की चिंता पैदा की है। ऐसे में सुरक्षित भोजन, गिद्ध-सुरक्षित पशु चिकित्सा और वैज्ञानिक संरक्षण कार्यक्रमों के जरिए इस प्रजाति को संकट से बाहर लाने की कोशिशें महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं।
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