क्या 2014 में पूंजी ने सत्ता की दिशा बदल दी थी?
भारतीय राजनीति में 2014 को अक्सर भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी, नेतृत्व संकट और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के चश्मे से देखा जाता है। लेकिन इस चुनाव की एक दूसरी कहानी भी है—पैसे की कहानी। सवाल यह नहीं कि “क्या उद्योगपतियों ने मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया?”, क्योंकि ऐसा कहना चुनाव जैसे बहुस्तरीय जनादेश को एक ही कारण में समेट देना होगा। ज्यादा गंभीर सवाल यह है कि क्या 2014 से पहले भारतीय कॉरपोरेट जगत के एक प्रभावशाली हिस्से ने कांग्रेस से अपना भरोसा हटाकर मोदी और भाजपा को अधिक उपयोगी राजनीतिक विकल्प मानना शुरू कर दिया था?
उपलब्ध आंकड़े इस संभावना को खारिज नहीं करते, बल्कि काफी हद तक इसकी पुष्टि करते हैं। मगर वे यह भी बताते हैं कि कहानी किसी एक गुप्त कॉरपोरेट लॉबी की नहीं थी। यह व्यापारिक हितों, नीतिगत अनिश्चितता, राजनीतिक नेतृत्व और चुनावी वित्त के धीरे-धीरे बदलते समीकरण की कहानी थी।
UPA के पहले कार्यकाल में भारत ने तेज आर्थिक वृद्धि देखी थी। उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही थी और कांग्रेस को कॉरपोरेट-विरोधी पार्टी कहना तब भी मुश्किल था। लेकिन दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्षों तक सरकार के सामने एक अलग समस्या खड़ी हो गई। 2G, कोयला आवंटन और अन्य विवादों ने भ्रष्टाचार की धारणा को मजबूत किया, जबकि निवेश और मंजूरियों से जुड़े फैसलों में देरी तथा कर और नियामकीय अनिश्चितताओं ने उद्योग जगत में बेचैनी पैदा की। यहां “कांग्रेस कॉरपोरेट विरोधी हो गई थी” कहना शायद गलत शब्दावली है; अधिक सटीक शब्द अनिश्चितता है। कारोबारी दुनिया के लिए सरकार का हर फैसला उसके हित में होना जरूरी नहीं होता, लेकिन यह जरूरी होता है कि नियम स्पष्ट हों, फैसले समय पर हों और भविष्य का अनुमान लगाया जा सके।
इसी पृष्ठभूमि में नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय आर्थिक छवि बनी। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने खुद को ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया जो प्रशासनिक निर्णयों को तेज कर सकता है, बुनियादी ढांचे पर जोर देता है और उद्योग के साथ सरकार के रिश्तों को टकराव की जगह साझेदारी के रूप में देखता है। 2014 तक यह छवि भाजपा के चुनावी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी। यह कहना मुश्किल है कि हर उद्योगपति मोदी का समर्थक था, लेकिन यह कहना भी अब मुश्किल है कि मोदी को कारोबारी वर्ग के एक बड़े हिस्से की पसंद हासिल नहीं थी।
सबसे दिलचस्प बात चुनावी चंदे के आंकड़ों में दिखाई देती है। वित्त वर्ष 2013-14 में राष्ट्रीय दलों को घोषित ₹20,000 से अधिक के चंदे का लगभग 92 प्रतिशत हिस्सा कॉरपोरेट और कारोबारी क्षेत्र से आया था। उसी वर्ष भाजपा को घोषित चंदे के रूप में लगभग ₹170.86 करोड़ मिले, जिसमें करीब ₹157.84 करोड़ यानी 92.38 प्रतिशत कॉरपोरेट और कारोबारी स्रोतों से था। कांग्रेस को लगभग ₹59.58 करोड़ मिले, जिसमें लगभग ₹55.02 करोड़ यानी 92.35 प्रतिशत कारोबारी क्षेत्र से आया। (ADR India)
यहां एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्य छूट जाता है। कॉरपोरेट पैसा कांग्रेस के पास भी था। इसलिए यह कहना कि “कारोबार ने कांग्रेस को छोड़ दिया और मोदी के पीछे खड़ा हो गया” आंकड़ों के साथ न्याय नहीं करता। मसलन, 2013-14 में Satya Electoral Trust ने भाजपा को लगभग ₹41.37 करोड़ और कांग्रेस को ₹36.50 करोड़ दिए। यानी एक ही बड़े कारोबारी funding mechanism से दोनों प्रमुख पार्टियों को पैसा मिल रहा था। (ADR India)
लेकिन अंतर यह था कि भाजपा का कुल कारोबारी समर्थन कहीं बड़ा हो चुका था। उपलब्ध आंकड़ों में भाजपा को मिले ₹170.86 करोड़ कांग्रेस के लगभग ₹59.58 करोड़ के मुकाबले करीब तीन गुने थे। भाजपा को मिले चंदे में कारोबारी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 92 प्रतिशत थी और उसके तीन प्रमुख कॉरपोरेट donors में Satya Electoral Trust, Sterlite Industries और Cairn India शामिल थे। दिलचस्प रूप से इन तीनों ने पिछले वित्त वर्ष में भाजपा को चंदा नहीं दिया था। (ADR India)
यहीं से “कॉरपोरेट shift” की परिकल्पना को गंभीरता मिलती है।
यह बदलाव केवल किसी एक उद्योगपति की व्यक्तिगत पसंद नहीं था। इसके पीछे कारोबारी वर्ग की उस मनोवृत्ति को समझना जरूरी है जिसमें सरकार से वैचारिक प्रेम की अपेक्षा कम और नीतिगत स्थिरता, निर्णय लेने की क्षमता, बुनियादी ढांचा, निवेश का वातावरण और प्रशासनिक predictability की अपेक्षा ज्यादा होती है। अगर किसी कारोबारी को लगता है कि मौजूदा सरकार निर्णय लेने में फंसी हुई है और विपक्ष का कोई नेता ज्यादा निर्णायक आर्थिक प्रशासन दे सकता है, तो राजनीतिक समर्थन का बदलना अस्वाभाविक नहीं है।
लेकिन यहां भी एक सीमा है। चंदा देना और चुनाव जिताना दो अलग बातें हैं।
2014 का चुनाव केवल कॉरपोरेट धन से नहीं जीता गया था। भाजपा के पास RSS और पार्टी का विशाल संगठन था। उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा स्पष्ट प्रधानमंत्री पद का चेहरा था। UPA-II के खिलाफ भारी anti-incumbency थी। भ्रष्टाचार और महंगाई चुनावी मुद्दे थे। सोशल मीडिया का राजनीतिक उपयोग तेजी से बढ़ रहा था। मोदी की रैलियां और उनका संचार अभियान अभूतपूर्व पैमाने पर चल रहा था। दूसरी ओर कांग्रेस के पास नेतृत्व और संदेश दोनों के स्तर पर स्पष्ट कमजोरी दिखाई दे रही थी।
इसलिए कॉरपोरेट पैसा इस चुनाव की एक शक्ति था, लेकिन एकमात्र शक्ति नहीं।
दरअसल 2014 के बाद की राजनीति इस बहस को और गंभीर बनाती है। आने वाले वर्षों में भाजपा और अन्य दलों के बीच राजनीतिक funding का अंतर बढ़ता गया। Electoral Trusts के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2013-14 से 2023-24 के बीच प्रत्यक्ष कॉरपोरेट donations में भाजपा का हिस्सा लगभग 84.65 प्रतिशत था, जबकि कांग्रेस का लगभग 10.80 प्रतिशत। Electoral Trusts के माध्यम से मिली रकम में भी भाजपा की हिस्सेदारी करीब 71.67 प्रतिशत रही, जबकि कांग्रेस की लगभग 9.92 प्रतिशत थी। (ADR India)
यह केवल एक चुनाव की कहानी नहीं रह जाती। यह बताता है कि 2014 के बाद भारतीय राजनीति के financial architecture में भी शक्ति का पुनर्विन्यास हुआ।
फिर आया Electoral Bonds का दौर, जिसने इस बहस को और संवेदनशील बना दिया। राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन का बड़ा हिस्सा ऐसी व्यवस्था के माध्यम से आने लगा जिसमें आम नागरिक के लिए donor और recipient के बीच संबंध को देखना आसान नहीं था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा Electoral Bonds scheme को असंवैधानिक ठहराए जाने के बाद सामने आए आंकड़ों ने यह स्पष्ट किया कि भाजपा इस व्यवस्था की सबसे बड़ी लाभार्थी थी। इसने उस पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया—क्या राजनीतिक funding केवल चुनाव लड़ने का खर्च है या सत्ता और पूंजी के बीच influence का माध्यम भी बन सकती है?
यहीं लोकतंत्र की असली चिंता शुरू होती है।
किसी कंपनी का भाजपा को पैसा देना यह साबित नहीं करता कि उसके बदले सरकार ने उसे कोई लाभ दिया। उसी तरह किसी सरकार की कारोबारी नीति का किसी कंपनी को लाभ मिलना यह साबित नहीं करता कि उसके पीछे राजनीतिक चंदा था। दोनों घटनाओं के बीच संबंध स्थापित करने के लिए प्रत्येक मामले में अलग प्रमाण चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह भी भोलेपन की बात होगी कि अरबों रुपये के राजनीतिक funding flows को लोकतंत्र की शक्ति-संरचना से पूरी तरह अलग मान लिया जाए।
पैसा चुनाव नहीं जीतता, लेकिन पैसा चुनाव लड़ने की क्षमता बदल देता है।
एक बड़ी पार्टी के पास ज्यादा पैसा हो तो वह ज्यादा विज्ञापन कर सकती है, ज्यादा यात्राएं कर सकती है, ज्यादा डिजिटल campaign चला सकती है, ज्यादा professionals नियुक्त कर सकती है और ज्यादा बड़े पैमाने पर मतदाताओं तक अपना संदेश पहुंचा सकती है। इसलिए चुनावी धन को परिणाम का अकेला कारण नहीं कहा जा सकता, लेकिन उसे परिणाम से अप्रासंगिक भी नहीं माना जा सकता।
यही वजह है कि 2014 की कहानी को “कॉरपोरेट ने मोदी को जिताया” कहना उतना ही अधूरा है जितना “कॉरपोरेट का कोई योगदान नहीं था” कहना।
ज्यादा सटीक निष्कर्ष यह है कि UPA-II के अंतिम वर्षों में सरकार और कारोबारी क्षेत्र के एक हिस्से के बीच भरोसे की समस्या बढ़ी; उसी समय मोदी ने खुद को अधिक निर्णायक और business-friendly विकल्प के रूप में स्थापित किया; 2013-14 में भाजपा के पक्ष में कॉरपोरेट funding का स्पष्ट उछाल दिखाई दिया; और 2014 के बाद यह financial advantage लंबे समय तक कायम रहा।
इसका अर्थ किसी “गुप्त लॉबी” की मौजूदगी साबित करना नहीं है। बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के एक ज्यादा बड़े बदलाव की ओर संकेत करता है—राजनीतिक शक्ति और आर्थिक शक्ति के बीच संबंध का पुनर्गठन।
कांग्रेस के बारे में भी निष्कर्ष सावधानी से निकालना होगा। उसे “anti-corporate” कह देना इतिहास के साथ अन्याय होगा। वही कांग्रेस 1991 के आर्थिक उदारीकरण की प्रमुख राजनीतिक शक्ति थी और UPA-I के दौरान निजी निवेश तथा बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के विस्तार को आगे बढ़ाती रही। समस्या उसके दूसरे कार्यकाल के अंतिम चरण में नीतिगत विश्वसनीयता और प्रशासनिक क्षमता की धारणा में आई। यही वह खाली जगह थी जिसे मोदी ने अपने राजनीतिक narrative से भरा।
इसलिए 2014 को समझने का सबसे मजबूत सूत्र शायद यह है:
कांग्रेस के खिलाफ जनता का असंतोष + UPA-II की नीतिगत कमजोरी + मोदी की निर्णायक नेतृत्व की छवि + भाजपा का संगठन + कॉरपोरेट जगत के एक हिस्से का बढ़ता आर्थिक समर्थन = 2014 का सत्ता परिवर्तन।
इनमें से किसी एक तत्व को पूरी कहानी बना देना इतिहास को सरल बनाना है।
और असली सवाल आज भी वहीं खड़ा है—क्या भारत में चुनावी चंदा केवल चुनाव जीतने का साधन है, या वह यह भी तय करने लगा है कि सत्ता में आने के बाद नीति किसकी आवाज ज्यादा गंभीरता से सुनेगी?
यही सवाल 2014 से ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि चुनाव बदलते रहते हैं, पार्टियां बदलती रहती हैं, लेकिन राजनीति और पूंजी के बीच बनने वाला रिश्ता लोकतंत्र की संरचना को लंबे समय तक प्रभावित करता है।
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