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अपनी कहानी बताएंगी।★ बरेली MLC शिक्षक चुनाव में BJP की जीत। बीजेपी प्रत्याशी डॉ. हरि सिंह ढिल्लों जीते। डॉ. हरि सिंह ने दानिश अख्तर को हराया। डॉ. हरि सिंह ढिल्लों को 21672 मत मिले। सपा के दानिश अख्तर को 3996 मत मिले।★ यूपी के कुशीनगर में भीषण हादसा। तेज रफ्तार रोडवेज बस ने कई लोगों को मारी टक्कर, 1 महिला की मौत।★ तूफान अर्नब पर नागरिक उड्डयन मंत्रालय अलर्ट, फ्लाइट बदलाव की जानकारी समय पर देने के निर्देश।★ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आज़ का दैनिक कार्यक्रम। साइबर सुरक्षा और एआई को लेकर कार्यक्रम बंथरा स्थित फोरेंसिक संस्थान कानपुर रोड। सायंकाल वाराणसी के लिए प्रस्थान करेंगे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।★ रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को नई दिल्ली में सेना कमांडर्स कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए भारतीय सेना से भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सेना को अगले 20 से 30 वर्षों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। साथ ही, भू-राजनीतिक और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर कड़ी नजर रखते हुए तत्काल और उभरती चुनौतियों से निपटने की क्षमता भी मजबूत करनी होगी।★ लखनऊ में ED का अधिकारी दीपक कुमार मनी लॉन्ड्रिंग के मामले को सुलटाने के लिए रिश्वत ले रहा था। दीपक ने ED ऑफिस में तैनात हेड कांस्टेबल मनोज द्विवेदी को रिश्वत लेने दिल्ली भेजा था, जहां वो पकड़ा गया। इसके बाद ED के अधिकारी दीपक को भी गिरफ्तार कर लिया गया।★ लखनऊ। बागेश्वरी अपार्टमेंट के लिए 26 अक्टूबर से पंजीकरण। LDA की शारदानगर विस्तार योजना में शुरू होगी बुकिंग। 35 लाख रुपये में मिलेगा दो बेडरूम का फ्लैट। 55.25 वर्गमीटर के कुल 936 फ्लैट उपलब्ध होंगे। PM आवास योजना में 312 मकान भी मिलेंगे। 40.25 वर्गमीटर के मकान की कीमत 8.99 लाख रुपये। पात्र लाभार्थियों को ढाई लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। सब्सिडी के बाद लाभार्थियों को देने होंगे 6.50 लाख रुपये।★ पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से सपा उम्मीदवार लाल बिहारी यादव ने MLC चुनाव जीता।★ लखनऊ। LDA में 2 नवंबर को बोर्ड बैठक, 20 से ज्यादा प्रस्ताव होंगे पेश। लखनऊ विकास प्राधिकरण से अब पति-पत्नी दो भूखंड ले सकेंगे। अभी एक व्यक्ति को सीधे एलडीए से एक ही भूखंड लेने का नियम है। मंजूरी मिलने पर नैमिष, वरुण विहार समेत आगामी 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से पंजीकरण। LDA की शारदानगर विस्तार योजना में शुरू होगी बुकिंग। 35 लाख रुपये में मिलेगा दो बेडरूम का फ्लैट। 55.25 वर्गमीटर के कुल 936 फ्लैट उपलब्ध होंगे। PM आवास योजना में 312 मकान भी मिलेंगे। 40.25 वर्गमीटर के मकान की कीमत 8.99 लाख रुपये। पात्र लाभार्थियों को ढाई लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। सब्सिडी के बाद लाभार्थियों को देने होंगे 6.50 लाख रुपये।

विवाद का बाजार और अभिव्यक्ति की घटती जगह

Published By Ankit Awasthi·02 Sept 2026 08:19 AM (IST)
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विवाद का बाजार और अभिव्यक्ति की घटती जगह

विज्ञापन, सिनेमा और कला पर सोशल मीडिया की नई अदालत के दौर में यह समझना जरूरी है कि हर आपत्ति सेंसरशिप का आधार नहीं हो सकती

विज्ञापन और कला के सामने आज सेंसरशिप का चेहरा पहले जैसा नहीं रहा। अब किसी सरकारी आदेश, सेंसर बोर्ड या कानूनी नोटिस का इंतजार जरूरी नहीं है। एक तस्वीर, एक संवाद, किसी अभिनेता का पहनावा, किसी त्योहार का संदर्भ या किसी किताब का एक अंश सोशल मीडिया पर पहुंचता है और देखते ही देखते उस पर आपत्ति, विरोध, ट्रोलिंग, बहिष्कार और हटाने की मांग शुरू हो जाती है। कुछ घंटों में विवाद इतना बड़ा हो सकता है कि ब्रांड या निर्माता को सफाई देनी पड़े और कई बार अपना काम वापस लेना पड़े। हाल में अभिनेत्री कृति सेनन के GIVA के रक्षाबंधन विज्ञापन को लेकर हुआ विवाद इसी नए वातावरण का ताजा उदाहरण है। विज्ञापन में उनके पहनावे को लेकर सोशल मीडिया पर आपत्तियां उठीं और अंततः GIVA ने विज्ञापन वापस ले लिया। बाद में कंपनी के संस्थापक ने यह भी कहा कि कुछ स्टोर्स के आसपास पैदा हुई परिस्थितियों में कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता थी। इसलिए इसे महज कपड़ों पर हुई बहस के रूप में देखना अधूरा होगा; यह उस बदलती दुनिया का हिस्सा है जिसमें ब्रांड, कलाकार और दर्शक के बीच का संवाद अब एल्गोरिदम और डिजिटल भीड़ के माध्यम से संचालित होता है।

इस घटना का सबसे दिलचस्प पहलू यह नहीं है कि कृति सेनन के कपड़े उपयुक्त थे या नहीं। ऐसे प्रश्नों के उत्तर स्वभावतः व्यक्तिगत और सांस्कृतिक पसंद से जुड़े हो सकते हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या किसी विज्ञापन को केवल इसलिए हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि सोशल मीडिया पर उसका एक मुखर हिस्सा उसे पसंद नहीं करता? यदि उत्तर हां है तो फिर हमें यह भी तय करना होगा कि किसी रचनात्मक कृति की सीमा कौन तय करेगा—कलाकार, विज्ञापनदाता, दर्शक, समाज, सरकार या वह डिजिटल भीड़ जो सबसे अधिक शोर पैदा करने में सक्षम है?

यहीं से मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन से आगे बढ़कर attention economy का मामला बन जाता है।

आज किसी विज्ञापन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसे कितने लोगों ने ध्यान से देखा; कई बार उपलब्धि यह होती है कि उसके बारे में कितने लोगों ने बात की। सोशल मीडिया ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। पहले विज्ञापनदाता को लोगों का ध्यान खरीदना पड़ता था, अब विवाद कई बार स्वयं ध्यान पैदा करता है। एक व्यक्ति आपत्ति करता है, दूसरा उसका समर्थन करता है, तीसरा विरोध में वीडियो बनाता है, चौथा उसी वीडियो की आलोचना करता है और पांचवां इस पूरी बहस को समाचार में बदल देता है। विज्ञापन का मूल संदेश पीछे छूट जाता है और विवाद स्वयं विज्ञापन का दूसरा संस्करण बन जाता है।

यही कारण है कि negative publicity अब हमेशा negative नहीं रहती। Marketing research में ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां नकारात्मक चर्चा ने कम-ज्ञात उत्पादों या ब्रांडों की awareness बढ़ाई और कुछ परिस्थितियों में खरीद की संभावना तक प्रभावित की। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विवाद किसी मार्केटिंग एजेंसी की बनाई हुई चाल है। ऐसा निष्कर्ष बिना ठोस प्रमाण के निकालना गलत होगा। लेकिन बाजार ने इतना जरूर सीख लिया है कि controversy attention पैदा करती है और attention स्वयं एक आर्थिक संसाधन है।

यहीं से एक नया सवाल जन्म लेता है—क्या आज कुछ विवाद स्वतः पैदा होते हैं और कुछ विवादों को जानबूझकर हवा दी जाती है?

इसका उत्तर भी सीधा नहीं है। किसी ब्रांड के लिए विवाद पैदा करना जोखिम भरा खेल है। अगर लोग यह समझ जाएं कि कंपनी ने जानबूझकर उनकी भावनाओं से खेला है तो backlash ब्रांड को नुकसान भी पहुंचा सकता है। इसलिए हर वायरल विवाद को marketing gimmick कहना उतना ही सतही है जितना हर विरोध को genuine public anger मान लेना। असली समस्या यह है कि सोशल मीडिया ने दोनों के बीच अंतर करना मुश्किल कर दिया है।

और इस मुश्किल को समझने के लिए सोशल मीडिया के मनोविज्ञान को समझना होगा।

मनुष्य सामान्य सूचना की तुलना में ऐसी सूचना पर अधिक तीखी प्रतिक्रिया देता है जो उसकी पहचान, नैतिकता, धर्म, परिवार, राष्ट्र या सामाजिक मान्यताओं से जुड़ी हो। किसी विज्ञापन को “खराब” कहना सीमित प्रतिक्रिया पैदा करता है; लेकिन उसे “संस्कृति का अपमान” कहना प्रतिक्रिया की तीव्रता कई गुना बढ़ा सकता है। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम भी अक्सर इसी भावनात्मक engagement को पुरस्कृत करता है। शोध में यह पाया गया है कि social feedback लोगों को भविष्य में अधिक outrage वाली भाषा इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

इसका परिणाम एक प्रकार का outrage cycle है—आपत्ति, प्रतिक्रिया, प्रतिप्रतिक्रिया, अधिक visibility और फिर और अधिक आपत्ति।

यही वह चक्र है जिसमें एक सामान्य विज्ञापन अचानक राष्ट्रीय बहस बन सकता है।

भारत में इसके उदाहरण कम नहीं हैं। Tanishq के अंतरधार्मिक परिवार वाले विज्ञापन पर 2020 में #BoycottTanishq अभियान चला और कंपनी को विज्ञापन हटाना पड़ा। Dabur के Fem विज्ञापन में समलैंगिक जोड़े को करवा चौथ मनाते दिखाने पर विवाद हुआ और कंपनी ने उसे वापस लिया। Fabindia के दीपावली अभियान में 'Jashn-e-Riwaaz' नाम को लेकर विवाद हुआ और Sabyasachi के मंगलसूत्र अभियान पर भी आपत्तियों के बाद विज्ञापन हटाना पड़ा।

इन सभी विवादों को एक ही तराजू में तौलना भी उचित नहीं होगा। कुछ मामलों में आलोचना ने वास्तविक सामाजिक प्रश्न उठाए, कुछ में राजनीतिक ध्रुवीकरण प्रमुख था और कुछ में प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से अनुपातहीन दिखाई दी। लेकिन इन घटनाओं में एक समानता जरूर है—विज्ञापन अब केवल विज्ञापन नहीं रह गया है; वह पहचान की राजनीति, सांस्कृतिक असुरक्षा और डिजिटल भीड़ की शक्ति का मैदान बन गया है।

यह प्रवृत्ति केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं है। सिनेमा, साहित्य, रंगमंच और ओटीटी भी इसी दबाव से गुजर रहे हैं। कभी किसी फिल्म के संवाद पर विवाद होता है, कभी किसी चरित्र के चित्रण पर, कभी किसी ऐतिहासिक प्रसंग पर। समस्या यह नहीं कि दर्शक विरोध क्यों करते हैं। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है। समस्या तब पैदा होती है जब विरोध का अंतिम लक्ष्य बहस नहीं बल्कि अनुपस्थिति हो जाता है—फिल्म दिखाई ही न जाए, किताब प्रकाशित ही न हो, विज्ञापन प्रसारित ही न हो, कलाकार मंच पर आए ही नहीं।

आलोचना और censorship के बीच यही बारीक लेकिन निर्णायक अंतर है।

किसी फिल्म को खराब कहना आलोचना है। उसे न देखने की अपील करना भी लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकता है। लेकिन थिएटर में प्रदर्शन रोक देना या निर्माता को धमकी देकर उसे हटवाना अलग बात है। इसी तरह किसी विज्ञापन के संदेश से असहमत होना पूरी तरह जायज है; लेकिन केवल इसलिए उसे हटवाने की मांग करना कि उसमें महिला का पहनावा हमारी व्यक्तिगत पसंद के अनुरूप नहीं है, एक खतरनाक सामाजिक मिसाल बना सकता है।

क्योंकि आज किसी दूसरे के विज्ञापन पर लागू किया गया नैतिक मानदंड कल आपकी अपनी अभिव्यक्ति पर भी लागू हो सकता है।

भारत में Tanishq, Fabindia और Dabur जैसे मामलों के अलावा साहित्य भी इस दबाव से अछूता नहीं है। सोनिया गांधी की पुस्तक Belonging: A Journey of Love के भारतीय प्रकाशन को लेकर सामने आया विवाद इस बात को दूसरे स्तर पर ले जाता है। रिपोर्टों के अनुसार पुस्तक की कुछ राजनीतिक टिप्पणियों में बदलाव को लेकर लेखक पक्ष और प्रकाशक के बीच सहमति नहीं बनी और भारतीय प्रकाशन आगे नहीं बढ़ सका। प्रकाशक ने राजनीतिक दबाव की बात से इनकार किया और इसे संपादकीय प्रक्रिया से जुड़ा मामला बताया।

इस मामले में भी दो बातें अलग रखना जरूरी है। संपादक को संपादन का अधिकार है और प्रत्येक संपादकीय बदलाव को censorship कहना गलत होगा। लेकिन यदि लेखक को राजनीतिक असुविधा के कारण अपनी बात बदलने के लिए बाध्य किया जाए तो सवाल गंभीर हो जाता है। कला और साहित्य का मूल्य ही इस बात में है कि वे कई बार वह कह देते हैं जिसे समाज का शक्तिशाली हिस्सा सुनना नहीं चाहता।

वास्तविक खतरा केवल सरकारी censorship नहीं है। उससे भी सूक्ष्म खतरा self-censorship है।

जब लेखक लिखने से पहले सोचने लगे कि कौन नाराज होगा, निर्देशक दृश्य फिल्माने से पहले सोचने लगे कि किस समूह का विरोध होगा, विज्ञापन एजेंसी यह तय करने लगे कि कौन-सा पहनावा ट्रोलिंग से बच जाएगा और प्रकाशक राजनीतिक प्रतिक्रिया के डर से किसी अध्याय को बदलने लगे, तब बिना किसी औपचारिक प्रतिबंध के भी अभिव्यक्ति का दायरा सिकुड़ने लगता है।

डर स्वयं एक सेंसर बन जाता है।

हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि कलाकार या ब्रांड आलोचना से मुक्त हो जाएं। विज्ञापन समाज में स्त्री, पुरुष, परिवार, शरीर, धर्म, जाति और जीवनशैली की छवियां बनाते हैं। इसलिए उनसे सवाल पूछना जरूरी है। यदि कोई विज्ञापन किसी समुदाय को अपमानित करता है, स्त्री को वस्तु में बदल देता है, नस्लीय या लैंगिक रूढ़ि को मजबूत करता है अथवा बच्चों और कमजोर वर्गों को नुकसान पहुंचाने वाली भाषा इस्तेमाल करता है तो आलोचना केवल जायज ही नहीं, आवश्यक है।

लेकिन आलोचना का अर्थ प्रतिबंध की मांग होना जरूरी नहीं है।

हमने एक खतरनाक मानसिक सुविधा विकसित कर ली है—जो चीज हमें असुविधाजनक लगे, उसे गलत घोषित कर देना। जबकि लोकतांत्रिक समाज की असली परीक्षा यह नहीं कि वह हमारी पसंद की बातों को कितनी स्वतंत्रता देता है; उसकी परीक्षा यह है कि वह हमारी नापसंद बातों को कितनी जगह देता है।

सोशल मीडिया ने इस परीक्षा को और कठिन बना दिया है क्योंकि वहां संख्या से ज्यादा perception काम करता है। हजार लोग किसी विज्ञापन के विरोध में पोस्ट करें तो वह पूरे देश का मत नहीं हो जाता। लेकिन algorithm उस विरोध को पूरे देश का mood जैसा दिखा सकता है। इसके बाद मीडिया उस trend को खबर बनाता है और खबर उस trend को और बड़ा कर देती है। इस तरह एक छोटा डिजिटल समूह वास्तविक सामाजिक बहुमत का भ्रम पैदा कर सकता है।

यही कारण है कि आज “public outrage” और “manufactured outrage” के बीच फर्क करना पत्रकारिता की भी बड़ी जिम्मेदारी है।

किसी hashtag का trending होना अपने आप में जनमत का प्रमाण नहीं है।

किसी वीडियो पर लाख views होना सामाजिक सहमति का प्रमाण नहीं है।

और किसी विज्ञापन के हट जाने से यह साबित नहीं होता कि वह विज्ञापन गलत था।

इसी तरह किसी कंपनी का विज्ञापन न हटाना भी यह साबित नहीं करता कि आलोचना निराधार थी।

हमें reaction नहीं, context देखना होगा।

शायद आने वाले समय में negative publicity स्वयं marketing strategy का हिस्सा बनने की संभावना इसलिए बढ़ेगी क्योंकि विज्ञापन बाजार में attention की कीमत बढ़ती जा रही है। लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उपभोक्ता को इस खेल को समझना होगा। यदि किसी विवाद ने हमें किसी ऐसे ब्रांड के बारे में बता दिया जिसके बारे में हमने पहले कभी सुना ही नहीं था, तो हमें यह सवाल भी पूछना चाहिए कि कहीं हमारी नाराजगी ने अनजाने में उसी ब्रांड की मुफ्त advertising तो नहीं कर दी?

यह विडंबना है कि हम किसी विज्ञापन को हटाने के लिए जिस पोस्ट को हजारों बार share करते हैं, वही पोस्ट उस विज्ञापन को उस audience तक पहुंचा देती है जिसके लिए वह बनाया ही नहीं गया था।

विरोध कभी-कभी विज्ञापन का सबसे सस्ता माध्यम बन जाता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर विवाद नकली है। समाज में वास्तविक सांस्कृतिक असुरक्षाएं हैं, वास्तविक भेदभाव हैं और वास्तविक रूप से खराब विज्ञापन भी हैं। इसलिए समाधान यह नहीं कि हर आलोचक को troll कह दिया जाए। समाधान यह है कि हम आलोचना की संस्कृति को censorship की संस्कृति बनने से रोकें।

हमें ऐसी सार्वजनिक संस्कृति चाहिए जिसमें कोई विज्ञापन हमें खराब लगे तो हम कह सकें—“यह खराब है”, बिना यह कहे कि “इसे हर हाल में हटाओ।”

किसी फिल्म से असहमति हो तो कह सकें—“मैं इसे नहीं देखूंगा”, बिना यह तय किए कि “कोई और भी इसे न देख पाए।”

किसी किताब से असहमति हो तो उसकी समीक्षा लिखें, लेखक से बहस करें, तथ्य चुनौती दें; लेकिन किताब को अलमारी से गायब कर देना अंतिम उत्तर न हो।

और किसी कलाकार के कपड़े, विचार या दृश्य से असहमति हो तो उस असहमति को व्यक्त करने का अधिकार उसी तरह सुरक्षित रहे, जैसे कलाकार को अपनी रचना प्रस्तुत करने का अधिकार।

क्योंकि अंततः सवाल केवल कृति की स्वतंत्रता का नहीं है। सवाल दर्शक की स्वतंत्रता का भी है—चुनने की, असहमत होने की और स्वयं निर्णय लेने की।

एक स्वस्थ लोकतंत्र में कला को गलत होने का भी अधिकार होना चाहिए। विज्ञापन को असफल होने का अधिकार होना चाहिए। कलाकार को आलोचना झेलने का अधिकार होना चाहिए और दर्शक को असहमति का।

लेकिन किसी भी समाज के लिए यह स्वस्थ स्थिति नहीं हो सकती कि हर असुविधाजनक चीज को हटाना ही समाधान बन जाए।

आज GIVA का विज्ञापन है। कल कोई फिल्म होगी। परसों कोई किताब होगी। उसके बाद शायद कोई कार्टून, कोई पेंटिंग या कोई राजनीतिक टिप्पणी।

यदि हर विवाद का अंतिम उत्तर 'हटा दो' है, तो धीरे-धीरे समाज में केवल सामग्री नहीं, विचारों की विविधता भी कम होती जाएगी।

इसलिए हमें censorship कम करने की बात केवल कलाकारों के लिए नहीं, अपने लिए भी करनी चाहिए।

विवाद होने दीजिए।

बहस होने दीजिए।

बहिष्कार भी होने दीजिए।

कड़ी आलोचना भी होने दीजिए।

लेकिन हर बार हटाने की मांग मत कीजिए।

क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह नहीं कि उसमें सभी हमारी बात से सहमत होते हैं; बल्कि यह है कि असहमति के बावजूद दूसरे की आवाज को मौजूद रहने दिया जाता है।

और शायद यही वह जगह है जहां कला, विज्ञापन और बाजार के बीच एक जरूरी रेखा खींचनी होगी—विवाद को बाजार की रणनीति बनने से रोकना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि विरोध को censorship का औजार बनने से रोका जाए।

लेखक के बारे में

Ankit Awasthi

श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें →

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