
आभासी दुनिया का बढ़ता जाल: सुविधा से संकट तक की यात्रा
हाल के महीनों में सामने आई घटनाएँ—ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े आत्मघाती मामले, सोशल मीडिया ट्रेंड्स के दबाव में टूटते किशोर, डिजिटल ठगी के बढ़ते शिकार—यह साफ़ संकेत देते हैं कि आभासी दुनिया अब सिर्फ़ स्क्रीन तक सीमित नहीं रही। उसने हमारे घरों, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य के भीतर गहरी पैठ बना ली है। जो तकनीक कभी सुविधा और संपर्क का माध्यम थी, वही आज कई ज़िंदगियों के लिए अदृश्य जाल बनती जा रही है।
आभासी दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त उसका आकर्षण है। यहाँ सब कुछ तेज़ है—तुरंत प्रतिक्रिया, तुरंत सराहना, तुरंत पहचान। सोशल मीडिया पर लाइक और व्यूज़ की गिनती, ऑनलाइन गेम्स में लेवल और रिवॉर्ड, वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बनी एक “परफेक्ट” छवि—ये सब मिलकर इंसान के दिमाग़ को लगातार उत्तेजित रखते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब वास्तविक जीवन की धीमी, जटिल और कभी-कभी निराशाजनक सच्चाई इस आभासी चमक के सामने फीकी पड़ने लगती है।
हालिया घटनाओं में यह साफ़ दिखा है कि बच्चे और युवा सबसे अधिक प्रभावित हैं। ऑनलाइन गेमिंग या सोशल प्लेटफॉर्म पर असफलता, ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग और तुलना की संस्कृति मानसिक दबाव को कई गुना बढ़ा देती है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने आसपास के लोगों से कटने लगता है, संवाद कम हो जाता है और अकेलापन गहराता है। यह अकेलापन ही आगे चलकर अवसाद, ग़ुस्से और आत्मघाती विचारों का रूप ले लेता है—जिसका अंदाज़ा परिवार को तब होता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है।
आभासी दुनिया का एक और खतरनाक पहलू है—पहचान का भ्रम। यहाँ हर कोई अपनी सबसे अच्छी तस्वीर, सबसे खुशहाल पल और सबसे सफल रूप दिखाता है। इसके मुकाबले में देखने वाला खुद को अधूरा, असफल और पीछे छूटता हुआ महसूस करता है। यह निरंतर तुलना आत्मसम्मान को खोखला कर देती है। लाइफस्टाइल के नाम पर परोसी जा रही यह चमक-दमक दरअसल एक मानसिक दबाव बन चुकी है, जिसे स्वीकार करने में हम अब भी हिचकते हैं।
डिजिटल ठगी और फर्जी रिश्तों का जाल भी इसी आभासी दुनिया की देन है। ऑनलाइन दोस्ती, फेक प्रोफाइल, भावनात्मक छल—इनके शिकार हर उम्र के लोग हो रहे हैं। कई बार आर्थिक नुकसान के साथ-साथ भावनात्मक टूटन भी गहरी होती है। जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी यह डिजिटल निर्भरता हमें असुरक्षित भी बना रही है, लेकिन सुविधा के लालच में हम खतरे को अनदेखा कर देते हैं।
यह कहना ग़लत होगा कि तकनीक या आभासी दुनिया पूरी तरह नकारात्मक है। समस्या उसके अति-उपयोग और बिना समझ के इस्तेमाल में है। जब स्क्रीन समय रिश्तों की जगह लेने लगे, जब संवाद की जगह इमोजी आ जाएँ और जब नींद, स्वास्थ्य व संवेदनाएँ नोटिफिकेशन के आगे हार मान लें—तब खतरे की घंटी बजनी चाहिए।
समाधान किसी एक पक्ष के हाथ में नहीं है। परिवारों को बच्चों और युवाओं से खुलकर बात करनी होगी—नज़र रखने के नाम पर नहीं, बल्कि भरोसे के साथ। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी चर्चा ज़रूरी है। समाज को यह समझना होगा कि हर चुप बच्चा “मोबाइल में बिज़ी” नहीं, बल्कि मदद की तलाश में भी हो सकता है। वहीं, सरकार और टेक कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे कंटेंट कंट्रोल, उम्र-आधारित सीमाएँ और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े चेतावनी तंत्र को गंभीरता से लागू करें।
सुझाव के साथ अंत
आभासी दुनिया से भागना संभव नहीं, लेकिन उसमें डूब जाना भी ज़रूरी नहीं। संतुलन ही समाधान है—डिजिटल समय की सीमा तय करना, वास्तविक रिश्तों को प्राथमिकता देना और समय-समय पर खुद से यह पूछना कि क्या हम स्क्रीन के मालिक हैं या स्क्रीन हमें चला रही है। अगर इस सवाल का जवाब ईमानदारी से ढूंढ लिया जाए, तो यह जाल टूट सकता है—और तकनीक फिर से हमारी सहयोगी बन सकती है, शासक नहीं।
Ankit Awasthi
लेखक 6 साल से पत्रकारिता में है, उनसे संपर्क करने या अपने लेख भेजने और लगवाने के लिए मेल पर संपर्क कर सकते है, awasthiankit579@gmail.com साथ ही अन्य जगह जहाँ लेखक लिखते है उसके लिंक नीचे दिए गये है |
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