
गली गली चोर है - व्यंग्य विशेष
कहते हैं चोरी पाप है। पर लगता है कि इंसान ने इस पाप को भी कला बना दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर चोर का अपना-अपना विभाग है।
कोई बिजली चुराता है, कोई राशन।
कोई टैक्स चुराता है, कोई समय।
कोई मेहनत का श्रेय चुराता है, कोई जनता का भरोसा।
कोई परीक्षा में नकल चुराता है, कोई भाषण में दूसरे के विचार।
कोई ईमान चुराता है, कोई संविधान की भावना।
अर्धकुंभ के दौरान कथित फर्जी कोविड प्रमाणपत्र बनाने वाले गिरोहों के पकड़े जाने की खबरें आई थीं। उस समय लगा कि चोरी अब केवल जेब या तिजोरी तक सीमित नहीं रही; अब ईमान, व्यवस्था और विश्वास भी चोरी होने लगे हैं।
यहीं से एक सवाल जन्म लेता है—क्या चोरी केवल वह है जो रात के अंधेरे में ताला तोड़कर की जाती है? या वह भी चोरी है जो दिनदहाड़े व्यवस्था, नैतिकता और समाज के भरोसे को खोखला करती है?
दुकानदारों में भी कुछ ऐसे मिल जाते हैं जो तराजू से ग्राम चुराते हैं, बिल से पैसा चुराते हैं और गुणवत्ता से भरोसा। फिर शाम को भगवान के सामने अगरबत्ती भी पूरी श्रद्धा से जलाते हैं।
राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं। यहाँ कभी दल नेता चुरा लेते हैं, कभी नेता दल बदल लेते हैं। जनता सोचती रह जाती है कि वोट किसे दिया था और निकला कौन! आजकल विचारधारा भी ऐसी है कि मौका मिले तो पार्टी बदलो, कुर्सी बची रहे तो सिद्धांत बाद में देखे जाएंगे।
दफ्तर में कामचोर हैं, सड़क पर नियमचोर हैं, सोशल मीडिया पर कंटेंट चोर हैं, ठेकेदारी में माल चोर हैं, फाइलों में कमीशन चोर हैं और भाषणों में वादा चोर हैं।
सबसे बड़े चोर वे हैं जो विश्वास चुरा लेते हैं। जेब कटे तो कुछ रुपये जाते हैं, भरोसा कटे तो पूरा समाज गरीब हो जाता है।
चंदे की चोरी पर हंगामा होता है, होना भी चाहिए। लेकिन अगर सचमुच चोरी खत्म करनी है तो सिर्फ ताला मजबूत करने से काम नहीं चलेगा। क्योंकि असली चोर अक्सर ताले के बाहर नहीं, इंसान के भीतर बैठा होता है।
इस देश में चोरियों की सूची इतनी लंबी है कि नया मंत्रालय खोलना पड़े—'चोरी एवं विविध प्रतिभा मंत्रालय'। वहाँ विभाग होंगे—बिजली चोरी प्रकोष्ठ, राशन गबन अनुभाग, समय चोरी निदेशालय, वादा प्रबंधन बोर्ड, ईमान पुनर्वास केंद्र और दल-बदल समन्वय प्राधिकरण।
जब तक मनुष्य अपने भीतर बैठे छोटे-से चोर को नहीं हराएगा, तब तक हर नई सुबह सिर्फ चोर बदलेगी, चोरी नहीं।
ईमानदार होना कठिन है, क्योंकि चोरी सिर्फ तिजोरी से नहीं होती—नीयत से भी होती है।
अंकित अवस्थी





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