
नल है, जल नहीं — जल जीवन मिशन की असली कहानी
राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले का खरवाड़ा गांव। आजाद भारत की 79वीं वर्षगांठ के करीब भी यहां के करीब 15 आदिवासी परिवार 3 से 5 किलोमीटर दूर पहाड़ियों से गधों पर बर्तन लादकर पानी ला रहे हैं। महिलाएं और बच्चे पथरीले रास्तों पर घंटों पैदल चलते हैं। विडंबना यह है कि पास ही जल जीवन मिशन की टंकी बनी है — बस पाइपलाइन का कनेक्शन बस्ती तक नहीं पहुंचा। यह महज एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस सच्चाई का आईना है जो सरकारी आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को बेनकाब करती है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जल जीवन मिशन (JJM) की शुरुआत की थी। लक्ष्य था — 2024 तक देश के हर ग्रामीण घर में नल से जल। कुल बजट रखा गया 3.6 लाख करोड़ रुपये, जिसमें 2.08 लाख करोड़ केंद्र सरकार को देने थे।
सरकारी दावों के अनुसार मिशन की शुरुआत में देश में केवल 3.23 करोड़ ग्रामीण घरों में नल कनेक्शन थे। मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 15.83 करोड़ तक पहुंच गई है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने हाल ही में राज्यसभा में यह आंकड़े पेश किए।
लेकिन असल सवाल यह है — क्या नल कनेक्शन होने का मतलब पानी मिलना है?
असली तस्वीर: नल है, जल नहीं
नेशनल सैंपल सर्वे के 79वें राउंड के अनुसार, देश में करीब 90 प्रतिशत ग्रामीण घरों में नल कनेक्शन होने के बावजूद केवल 39 प्रतिशत परिवार ही इसे अपने पीने के पानी का मुख्य स्रोत मानते हैं। यानी 61 प्रतिशत परिवारों के लिए नल कनेक्शन सिर्फ दीवार पर लगी एक लोहे की नली भर है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे बड़े राज्यों में यह उपयोग दर मात्र 6 से 30 प्रतिशत के बीच है। अनियमित जल आपूर्ति, कम पानी का दबाव, घटिया पाइपलाइन और बंद पड़े ट्रीटमेंट प्लांट — यही वजह हैं कि करोड़ों घरों में नल तो पहुंचे, लेकिन पानी नहीं।
मिशन की समय-सीमा भी खिसक चुकी है। वित्त मंत्री ने हाल ही में 2024 की समयसीमा को बढ़ाकर 2028 कर दिया है। अभी भी करीब 3 करोड़ घर जोड़े जाने बाकी हैं।
भ्रष्टाचार: जनता का पानी कहां गया?
जल जीवन मिशन की असफलता की सबसे बड़ी वजह भ्रष्टाचार है — और इसका सबसे बड़ा उदाहरण राजस्थान है।
राजस्थान एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की SIT जांच में सामने आया कि फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए करीब 960 करोड़ रुपये के टेंडर हासिल किए गए। इस घोटाले में पूर्व मंत्री महेश जोशी, रिटायर्ड IAS अधिकारी सुबोध अग्रवाल समेत अब तक 10 से अधिक आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं। जांच में डिजिटल साक्ष्य के तौर पर ईमेल ट्रेल मिले जो ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत साबित करते हैं। राजस्थान के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने खुद माना है कि घोटाले के बाद अधिकारी निष्क्रिय हो गए और पेयजल योजनाएं ठप पड़ गईं।
यह अकेली घटना नहीं है। केंद्र सरकार ने जब 287 अधिकारियों की टीम भेजकर जांच कराई तो 17,000 से अधिक शिकायतें मिलीं। मणिपुर, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में भी कागजों पर पानी पहुंचाने के मामले सामने आए। पश्चिम बंगाल में अभी तक केवल 56.38 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक ही पाइप पानी पहुंचा है और केंद्र ने राज्य से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी है।
जड़ की समस्या: पाइप बिछाओ, स्रोत भूल जाओ
संसदीय स्थायी समिति ने पहले ही चेतावनी दी थी — बिना स्थायी जल स्रोतों के संरक्षण के यह मिशन टिकाऊ नहीं होगा। और वही हुआ।
मिशन का पूरा फोकस नल कनेक्शन की गिनती पर रहा। तालाब, नदी और भूजल संरक्षण को उतनी प्राथमिकता नहीं मिली। नतीजा — कई इलाकों में ट्यूबवेल सूख गए, ट्रीटमेंट प्लांट बंद हो गए और नल तो लगे लेकिन पानी का स्रोत ही खत्म हो गया।
दूसरी बड़ी समस्या है रखरखाव। ग्राम पंचायतों के पास न तकनीक है और न बजट। पाइपलाइन टूटती है, पंप खराब होते हैं — लेकिन मरम्मत नहीं होती। यही वजह है कि खरवाड़ा जैसे गांव में टंकी बनी है लेकिन कनेक्शन नहीं है। फॉरेस्ट क्लीयरेंस का बहाना है, टैंकर की अनियमितता है — और ग्रामीण वादों से थक चुके हैं।
असली सवाल
15.83 करोड़ नल कनेक्शन की तुलना में केवल 39 प्रतिशत उपयोग — यह आंकड़ा बताता है कि मिशन की सफलता सिर्फ संख्याओं में मापी गई, जीवन में नहीं। जब तक नल कनेक्शन को "फंक्शनल" नहीं बनाया जाता, जब तक जल स्रोत संरक्षित नहीं होते और जब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगती — खरवाड़ा जैसे हजारों गांव पानी के लिए पहाड़ चढ़ते रहेंगे।
"नल है, जल नहीं" — यही इस मिशन की सबसे बड़ी विफलता की कहानी है।
स्रोत: National Sample Survey 79th Round | Policy Circle | The Print Hindi | TV9 Hindi | Rajya Sabha Proceedings March 2026 | Business Standard Analysis
Ankit Awasthi





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