
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026: सत्ता की जंग
पश्चिम बंगाल में 2026 में होने वाला विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है, बल्कि यह चुनाव राज्य की राजनीतिक दिशा, सामाजिक संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों की अग्निपरीक्षा बनता जा रहा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, राजनीतिक तापमान तेज़ी से चढ़ रहा है और राज्य की राजनीति धीरे-धीरे एक उच्च ध्रुवीकरण के दौर में प्रवेश कर चुकी है।
मौजूदा संकेत बताते हैं कि यह चुनाव विकास बनाम पहचान, कल्याण बनाम राष्ट्रवाद, और क्षेत्रीय अस्मिता बनाम केंद्रीय प्रभाव की बहुआयामी लड़ाई में तब्दील हो चुका है।
सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस: कल्याण मॉडल और क्षेत्रीय अस्मिता पर दांव
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मुख्य फोकस कल्याणकारी योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा और बंगाली पहचान को केंद्र में रखकर मतदाताओं से जुड़ाव बनाए रखने पर है।
पिछले एक दशक में राज्य सरकार ने महिलाओं, छात्रों, किसानों और कमजोर वर्गों के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। इनमें लक्ष्मी भंडार, स्वास्थ्य साथी, कृषक बंधु, कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाएं प्रमुख हैं। TMC का दावा है कि इन कार्यक्रमों से राज्य में गरीबी, कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं में उल्लेखनीय कमी आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इन योजनाओं का सीधा असर मतदाता व्यवहार पर पड़ा है, जिससे पार्टी की जमीनी पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है।
इसके साथ ही TMC चुनावी विमर्श को “बंगाल की अस्मिता बनाम बाहरी हस्तक्षेप” के रूप में गढ़ रही है। पार्टी नेतृत्व लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि राज्य की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक संतुलन की रक्षा के लिए क्षेत्रीय नेतृत्व आवश्यक है।
भाजपा: राष्ट्रवाद, सुरक्षा और सामाजिक ध्रुवीकरण की रणनीति
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 2021 के बाद बंगाल में अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में जुटी रही है। पार्टी का मुख्य चुनावी एजेंडा राष्ट्रीय सुरक्षा, अवैध घुसपैठ, मतदाता सूची की शुद्धता, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर केंद्रित है।
भाजपा का मानना है कि सीमावर्ती जिलों में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ और फर्जी दस्तावेज़ों की समस्या व्यापक है, जिसका सीधा असर राज्य की जनसांख्यिकी और चुनावी निष्पक्षता पर पड़ता है। इसी आधार पर पार्टी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है।
इसके साथ-साथ भाजपा सांस्कृतिक असुरक्षा और धार्मिक पहचान को लेकर भी मतदाताओं को लामबंद करने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह रणनीति पार्टी को शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में लाभ पहुंचा सकती है, लेकिन ग्रामीण बंगाल में इसका प्रभाव सीमित बना हुआ है।
भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल स्थिर राज्य नेतृत्व का अभाव, अंदरूनी गुटबाजी और संगठनात्मक अनुशासन मानी जा रही है।
कांग्रेस और वाम मोर्चा: अस्तित्व बचाने की लड़ाई
कांग्रेस और वाम मोर्चा, जो कभी बंगाल की राजनीति के केंद्र में थे, अब हाशिए पर खड़े दिखाई देते हैं। दोनों दलों का जनाधार लगातार सिमटता गया है और संगठनात्मक ढांचा कमजोर पड़ा है।
वाम मोर्चा ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की है, जबकि कांग्रेस स्पष्ट रणनीति के अभाव में संघर्ष करती नजर आ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन दलों के सामने सत्ता नहीं, बल्कि प्रासंगिक बने रहने की चुनौती अधिक बड़ी है।
चुनावी विमर्श: विकास से पहचान की ओर झुकाव
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रोजगार, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और निवेश जैसे विकास के मुद्दे धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में जा रहे हैं, जबकि उनकी जगह धार्मिक पहचान, सुरक्षा और सांस्कृतिक विमर्श प्रमुख हो रहे हैं।
राज्य में बढ़ता ध्रुवीकरण संकेत देता है कि 2026 का चुनाव तार्किक बहस से अधिक भावनात्मक अपीलों पर आधारित हो सकता है। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श के लिए एक गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 केवल सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना और सामाजिक दिशा का निर्धारण करेगा।
यह चुनाव तय करेगा कि बंगाल की राजनीति कल्याण आधारित शासन और क्षेत्रीय अस्मिता के मॉडल पर आगे बढ़ेगी, या राष्ट्रवाद और पहचान आधारित राजनीति को नया केंद्र मिलेगा।
आखिरकार फैसला मतदाता के हाथ में है —
कि वह भावनात्मक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता देता है या रोजगार, शिक्षा और समावेशी विकास को।
Ankit Awasthi
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