बसपा से निष्कासित हुए पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्रा 'अंटू', भाजपा में शामिल होने से पहले मायावती ने की कार्रवाई
लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने पार्टी में अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों का हवाला देते हुए पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत मिश्रा 'अंटू' को बसपा से निष्कासित कर दिया है। बसपा सरकार के दौरान ताकतवर मंत्रियों में शुमार रहे अनंत मिश्रा के खिलाफ यह कार्रवाई उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने की चर्चाओं और तैयारियों के बीच की गई है।
बसपा शासनकाल में रहे बेहद प्रभावशाली
उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार के कार्यकाल के दौरान अनंत मिश्रा 'अंटू' पार्टी के प्रमुख चेहरा और तत्कालीन सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में एक बेहद प्रभावशाली प्रशासनिक भूमिका में रहे थे। उस दौर में स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कई घटनाक्रमों और विभागीय फैसलों को लेकर वे लगातार राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बने रहे। बसपा के भीतर भी उनकी गिनती मायावती के बेहद करीबी और कद्दावर नेताओं में की जाती थी।
पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप
पार्टी सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ समय से अनंत मिश्रा की बसपा की रणनीतिक गतिविधियों से दूरी और विरोधी दल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ बढ़ती नजदीकियों की खबरें सामने आ रही थीं। बसपा नेतृत्व का मानना था कि पार्टी में रहते हुए दूसरे राजनीतिक दल से संपर्क साधना और संगठनात्मक नियमों की अनदेखी करना अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
भाजपा में जाने की अटकलों पर मुहर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा से निष्कासन के इस कदम के बाद अनंत मिश्रा 'अंटू' के भारतीय जनता पार्टी में आधिकारिक रूप से शामिल होने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण वोट बैंक और अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए वे अब भाजपा के मंच से अपनी नई राजनीतिक पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं।
चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा असर
अनंत मिश्रा का बसपा से बाहर होना और भाजपा की ओर रुख करना प्रदेश के सियासी समीकरणों के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय तक बसपा के मुख्य रणनीतिकारों में शामिल रहे अंटू मिश्रा के अलग होने से जहां बसपा को अपने पुराने काडर को सहेजने में चुनौती मिलेगी, वहीं भाजपा को उनके लंबे प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव का फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
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