मुजफ्फरनगर दंगों की याद फिर ताजा, यूपी के कई जिलों में लगे पोस्टर

मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर यूपी के कई जिलों में लगे पोस्टर
पोस्टरों पर लिखा- ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे’, फिर चर्चा में आया 2013 का दंगा
लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में लगे पोस्टर
दंगों में 60 से अधिक लोगों की गई थी जान, 50 हजार से ज्यादा लोगों को छोड़ना पड़ा था घर
दंगों के बीच सैफई महोत्सव को लेकर भी घिरी थी अखिलेश सरकार, विपक्ष ने उठाए थे सवाल
कुछ जिलों में पोस्टर लगाने को लेकर सपा कार्यकर्ताओं से झड़प, गरमाई सियासत
लखनऊ। मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी पर रविवार को प्रदेश के कई जिलों में लगाए गए पोस्टरों ने एक बार फिर 2013 की हिंसा और तत्कालीन सपा सरकार की भूमिका को राजनीतिक चर्चा में ला दिया है। लखनऊ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, सहारनपुर और शामली समेत कई शहरों में लगे पोस्टरों पर बड़े अक्षरों में लिखा गया है, ‘न भूले थे, न भूले हैं, न भूलेंगे।’
पोस्टर लगाए जाने के दौरान कुछ जिलों में विवाद की स्थिति भी बनी। पोस्टरों का विरोध करने पहुंचे सपा कार्यकर्ताओं और इन्हें लगाने वाले लोगों के बीच कहासुनी और झड़प की बात सामने आई है। इसके बाद स्थानीय स्तर पर पुलिस को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। पोस्टरों और उनके विरोध ने दंगों की बरसी पर प्रदेश का राजनीतिक माहौल गरमा दिया है।
7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी, जबकि 50 हजार से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। हालात इतने बिगड़ गए थे कि हिंसा पर नियंत्रण के लिए सेना की मदद लेनी पड़ी थी।
उस समय प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार थी। कानून-व्यवस्था संभालने और समय रहते हिंसा रोकने में नाकामी को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठे थे। सपा सरकार पर दंगाइयों को राजनीतिक संरक्षण देने के आरोप भी लगे थे, जिन्हें पार्टी खारिज करती रही है।
दंगों के बाद राहत शिविरों और विस्थापित परिवारों की स्थिति को लेकर भी तत्कालीन सरकार विपक्ष के निशाने पर रही थी। वहीं, उस दौर में सैफई महोत्सव को लेकर भी अखिलेश सरकार की आलोचना हुई थी। विपक्ष ने इसे दंगा पीड़ितों के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता से जोड़कर सवाल उठाए थे।
अब 13 साल बाद दंगों की बरसी पर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में लगे पोस्टरों और उन्हें लेकर हुई झड़पों ने मुजफ्फरनगर दंगों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
लेखक के बारे में
Syed Fiza Khatoon
सैयद फ़िज़ा खातून ‘विजुअल लाइव’ की तकनीकी एवं डिजिटल टीम की महत्वपूर्ण सदस्य हैं। वर्ष 2014 में स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद से उन्होंने मीडिया के तकनीकी और डिजिटल कार्यों में अपनी दक्षता विकसित की है। न्यूज के लेआउट और प्रस्तुतीकरण, कंटेंट के डिजिटल प्रसारण तथा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर खबरों के अपडेट में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। खबर को बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने से लेकर उसके डिजिटल वितरण तक वह जिम्मेदारियों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करती हैं। सौम्य और मिलनसार स्वभाव के साथ नई तकनीकों और बदलते डिजिटल मीडिया को सीखने की निरंतर ललक उनकी कार्यशैली की खास पहचान है। टीम के साथ बेहतर समन्वय बनाकर काम करना और हर कार्य में कुछ नया सीखना उनकी पेशेवर सोच को दर्शाता है। डिजिटल पत्रकारिता के तेजी से बदलते दौर में तकनीकी समझ और रचनात्मक सोच के साथ सटीक, आकर्षक और प्रभावी न्यूज प्रस्तुतीकरण* में उनका योगदान ‘विजुअल लाइव’ की डिजिटल टीम को मजबूती प्रदान करता है। Syed Fiza Khatoon की सभी खबरें देखें →
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