लखनऊ से आई रिपोर्ट में शोर को लेकर चौकाने वाला खुलासा !
“ऊर्जा, फ्रीक्वेंसी और कंपन से ब्रह्मांड को समझो”—यह बात भले ही दार्शनिक लगे, लेकिन आज भारत के शहरों में यह एक खतरनाक सच्चाई बन चुकी है। जिस ध्वनि को हम उत्सव, शक्ति और अभिव्यक्ति का प्रतीक मानते हैं, वही धीरे-धीरे एक ऐसी अदृश्य महामारी में बदल रही है, जो बिना शोर किए लोगों की जान ले रही है। बिहार के एक युवा की शादी के मंच पर अचानक मौत हो जाना या वाराणसी में नाचते हुए किसी व्यक्ति का गिर पड़ना—ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि उस गहराते संकट की झलक हैं, जिसे हम अब भी गंभीरता से लेने को तैयार नहीं हैं।
भारत में ध्वनि प्रदूषण अब सिर्फ कानों तक सीमित समस्या नहीं रहा, यह सीधे दिल, दिमाग और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है। लखनऊ के King George's Medical University की एक रिसर्च में यह साफ सामने आया कि लगातार शोर के बीच रहने वाले लोगों में एंजायटी, डिप्रेशन और उच्च रक्तचाप की दर कहीं अधिक है। ऑटो चालकों पर किए गए अध्ययन में लगभग 40% लोगों में मध्यम स्तर की चिंता और 40% से ज्यादा में डिप्रेशन के लक्षण मिले—जबकि अपेक्षाकृत शांत माहौल में रहने वाले लोगों में यह आंकड़े काफी कम थे। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि उस अदृश्य दबाव का प्रमाण है जो शोर हमारे शरीर पर डाल रहा है।
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, तेज आवाज शरीर में तनाव हार्मोन—कॉर्टिसोल और एड्रेनालिन—को बढ़ा देती है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यही कारण है कि लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। World Health Organization के मानकों के मुताबिक 53 डेसिबल से अधिक का ट्रैफिक शोर भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है, जबकि भारत के बड़े शहरों में यह स्तर अक्सर 80 डेसिबल से ऊपर पहुंच जाता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट में मुरादाबाद जैसे शहरों में 110 डेसिबल से अधिक शोर दर्ज किया गया—जो किसी औद्योगिक मशीन के बराबर है। सोचिए, जिस वातावरण में इंसान को सांस लेनी है, वही अगर लगातार मशीन जैसी आवाज पैदा कर रहा हो, तो शरीर कितने दिन तक उसका सामना कर पाएगा?
लेकिन इस पूरे संकट में सबसे चिंताजनक पहलू है—हमारी सामाजिक और प्रशासनिक लापरवाही। शादियों, धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और राजनीतिक रैलियों में लाउडस्पीकर का जिस तरह से इस्तेमाल हो रहा है, वह किसी नियम या संवेदनशीलता को नहीं मानता। रात के समय 45 डेसिबल की सीमा तय है, लेकिन हकीकत यह है कि आधी रात तक DJ और लाउडस्पीकर पूरी क्षमता से बजते रहते हैं। यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।
हमने शोर को “उत्सव” का पर्याय बना दिया है, जहां जितनी तेज आवाज, उतनी ज्यादा भव्यता मानी जाती है। लेकिन यह भव्यता किस कीमत पर आ रही है, यह सवाल कोई नहीं पूछता। क्या एक शादी या धार्मिक आयोजन किसी की नींद, मानसिक शांति या यहां तक कि उसकी जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मानक स्पष्ट हैं—आवासीय क्षेत्रों में दिन में 55 और रात में 45 डेसिबल की सीमा—but इनका पालन शायद ही कहीं होता है। समस्या यह भी है कि ध्वनि प्रदूषण “दिखता” नहीं है, इसलिए इसे लेकर जनदबाव भी नहीं बनता। वायु प्रदूषण पर बहस होती है, मास्क पहने जाते हैं, लेकिन शोर के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं दिखता, जबकि CME जैसी संस्थाओं के अनुसार हर साल हजारों मौतें सीधे तौर पर इससे जुड़ी होती हैं।
युवाओं पर इसका असर और भी खतरनाक है। हाल के सर्वे बताते हैं कि महानगरों में रहने वाले छात्रों में एंजायटी और डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, और इसके पीछे लगातार शोर और अव्यवस्थित शहरी जीवन एक बड़ा कारण है। जब दिमाग को कभी शांति ही नहीं मिलेगी, तो वह संतुलन कैसे बनाए रखेगा?
यह स्थिति हमें एक असहज सच्चाई के सामने खड़ा करती है—हम विकास के नाम पर एक ऐसा वातावरण बना रहे हैं, जहां इंसान की बुनियादी जरूरत “शांति” ही खत्म होती जा रही है। सड़कें, गाड़ियां, निर्माण और भीड़—इन सबके बीच लाउडस्पीकर का अनियंत्रित उपयोग इस संकट को और गहरा कर रहा है।
लेकिन उम्मीद की गुंजाइश अभी भी है। जरूरत है कि ध्वनि प्रदूषण को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितनी वायु या जल प्रदूषण को दी जाती है। सख्त नियम, उनका पालन, और सबसे जरूरी—सामाजिक जागरूकता। जब तक लोग खुद यह नहीं समझेंगे कि शोर सिर्फ “आवाज” नहीं, बल्कि एक स्वास्थ्य खतरा है, तब तक कोई कानून कारगर नहीं होगा।
शायद अब समय आ गया है कि हम यह सवाल खुद से पूछें—क्या हम सच में सुन पा रहे हैं, या शोर इतना बढ़ गया है कि वह हमारी समझ, हमारी सेहत और हमारी संवेदनशीलता—सबको दबा चुका है?
Ankit Awasthi





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