
उदारीकरण के 35 साल बाद भी शिक्षा क्यों पीछे है?
लेखक: अंकित अवस्थी
1991 में भारत ने आर्थिक सुधारों का रास्ता चुना था। लाइसेंस-परमिट राज को ढीला किया गया, निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खुले, विदेशी निवेश आया, बाजार का विस्तार हुआ और भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनती चली गई।
तीन दशक से अधिक समय बाद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है। भारत की आर्थिक वृद्धि ने करोड़ों लोगों को पहले की तुलना में बेहतर अवसर दिए हैं। विश्व बैंक के अनुसार 2000 से 2024 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की औसत वृद्धि दर लगभग 6.3 प्रतिशत रही और 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने के लिए अगले दो दशकों में लगभग 7.8 प्रतिशत की औसत वृद्धि की जरूरत होगी।
लेकिन यहीं एक असहज सवाल पैदा होता है।
क्या आर्थिक विकास की रफ्तार ने भारतीय नागरिक की क्षमताओं को भी उसी अनुपात में बढ़ाया है?
अगर उत्तर पूरी तरह हां है, तो फिर आज भी शिक्षा के बुनियादी सवाल हमारे सामने क्यों खड़े हैं?
क्यों किसी सरकारी शिक्षण संस्थान में छात्राओं के लिए पर्याप्त और कार्यशील शौचालय सुनिश्चित करना चुनौती बन जाता है? क्यों स्कूल में बच्चे वर्षों बिताने के बाद भी अपेक्षित स्तर पर पढ़ना नहीं सीख पाते? क्यों उच्च शिक्षा का विस्तार संख्या में तो हुआ, लेकिन गुणवत्ता, शोध, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की बहस अभी भी अधूरी है?
और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—अगर विकास का अंतिम उद्देश्य मनुष्य की क्षमता बढ़ाना है, तो हमने विकास को आंकड़ों में तो मापा, लेकिन इंसान की क्षमता में कितना मापा?
1991 के बाद भारत ने बाजार को तो बदला, लेकिन शिक्षा को क्यों नहीं?
उदारीकरण का मूल उद्देश्य सिर्फ विदेशी पूंजी लाना नहीं था। उसका व्यापक उद्देश्य था—उत्पादकता बढ़ाना, प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, रोजगार पैदा करना और भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक सक्षम बनाना।
लेकिन किसी भी अर्थव्यवस्था की दीर्घकालीन उत्पादकता केवल कारखानों, सड़कों, बंदरगाहों और डिजिटल नेटवर्क से नहीं बनती।
सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा इंसान होता है।
एक अशिक्षित या कमजोर शिक्षा प्राप्त आबादी अत्याधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए वही समस्या पैदा करती है जो खराब सड़क परिवहन व्यवस्था के लिए पैदा करती है।
विश्व बैंक 'Learning Poverty' को इस आधार पर मापता है कि क्या बच्चा लगभग 10 वर्ष की उम्र तक किसी सरल पाठ को पढ़कर समझ सकता है। इसका अर्थ साफ है—सिर्फ स्कूल में नामांकन विकास का प्रमाण नहीं है; स्कूल में जाकर वास्तव में सीखना विकास का प्रमाण है। (World Bank)
यही वह जगह है जहां भारत की कहानी विरोधाभासी दिखाई देती है।
हमने स्कूलों की संख्या बढ़ाई।
नामांकन बढ़ाया।
उच्च शिक्षा में संस्थानों की संख्या बढ़ाई।
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का विस्तार किया।
लेकिन सवाल अभी भी है—
क्या हमने सीखने की गुणवत्ता को उतनी प्राथमिकता दी जितनी प्रवेश को?
'Education for All' से 'Education That Works' तक कब पहुंचेंगे?
भारत ने दशकों से 'शिक्षा सबके लिए' की बात की है। अधिकार आधारित शिक्षा का ढांचा बना। सर्व शिक्षा अभियान से लेकर शिक्षा का अधिकार कानून और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तक कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
फिर भी शिक्षा की समस्या केवल यह नहीं है कि बच्चा स्कूल जा रहा है या नहीं।
समस्या यह है कि—
वह स्कूल में जाकर सीख क्या रहा है?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बुनियादी सुविधाओं में काफी सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए UDISE+ के पास 2023-24 के लिए स्कूलों में कार्यशील शौचालयों और छात्राओं के लिए कार्यशील शौचालयों का प्रबंधन-वार डेटा उपलब्ध है। (Data.gov.in)
इस उपलब्धि को नकारना गलत होगा।
लेकिन उपलब्धि और लक्ष्य में अंतर भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
जब 2026 में भी किसी राज्य के उच्च शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिए अलग योजना बनानी पड़ रही हो कि हर कॉलेज में कम से कम एक कार्यशील छात्रा शौचालय हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हमने शिक्षा के विस्तार के साथ उसके न्यूनतम मानवीय मानकों को कितना संस्थागत बनाया। ओडिशा में 2026 में इसी प्रकार की पहल सामने आई, जहां 760 कॉलेजों में छात्राओं के लिए कार्यशील शौचालय सुनिश्चित करने की योजना बनाई गई।
यह केवल शौचालय का प्रश्न नहीं है।
यह गरिमा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा में निरंतर भागीदारी का प्रश्न है।
जिस छात्रा को कॉलेज में बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है, उससे हम विश्वस्तरीय शिक्षा, उच्च शोध और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
भारत की सबसे बड़ी शिक्षा समस्या 'स्कूल में जाना' नहीं, 'सीखना' है
यही वह बिंदु है जहां भारत को अपनी सफलता की भाषा बदलने की जरूरत है।
नामांकन प्रतिशत अच्छा होना पर्याप्त नहीं है।
डिग्री लेने वालों की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है।
कॉलेजों की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है।
यदि एक स्नातक युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते समय बुनियादी भाषा, गणित, विश्लेषण, डिजिटल कौशल और समस्या-समाधान की क्षमता में कमजोर है, तो अर्थव्यवस्था के लिए उसकी डिग्री उतनी उपयोगी नहीं जितनी कागज पर दिखाई देती है।
विश्व बैंक का मानव पूंजी संबंधी शोध भी इसी दिशा की ओर संकेत करता है—स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़े मानव पूंजी के घाटे भविष्य की आय और आर्थिक क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। (World Bank)
इसलिए भारत की शिक्षा बहस को 'कितने बच्चे स्कूल गए' से आगे जाकर 'कितने बच्चे वास्तव में सीख पाए' पर आना होगा।
आर्थिक सुधारों की एक अधूरी कहानी
1991 के सुधारों की आलोचना करना आसान है।
लेकिन यह भी तथ्य है कि उन्हीं सुधारों ने भारत की आर्थिक क्षमता को काफी बदला।
आज भारत के पास मजबूत सेवा क्षेत्र है।
आईटी उद्योग है।
वैश्विक कंपनियां हैं।
स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र है।
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना है।
बड़ा घरेलू बाजार है।
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत की आवाज पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली है।
इसलिए समस्या उदारीकरण की अवधारणा में नहीं है।
समस्या यह है कि आर्थिक उदारीकरण के साथ सामाजिक क्षेत्र में वैसी ही गहराई और निरंतरता नहीं आई।
बाजार ने उन क्षेत्रों में तेजी से निवेश किया जहां प्रतिफल स्पष्ट था।
लेकिन सरकारी शिक्षा का काम बाजार से अलग है।
बाजार पूछता है—इसमें लाभ कितना है?
राज्य को पूछना चाहिए—इससे नागरिक की क्षमता कितनी बढ़ेगी?
यही अंतर सार्वजनिक शिक्षा को महत्वपूर्ण बनाता है।
निजी शिक्षा बढ़ी, लेकिन इससे सरकारी शिक्षा की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती
भारत में निजी स्कूल और निजी उच्च शिक्षा संस्थान बढ़े।
मध्यवर्ग ने बेहतर शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र का सहारा लिया।
यह बाजार की मांग का स्वाभाविक परिणाम था।
लेकिन इसके साथ एक खतरनाक सामाजिक विभाजन भी पैदा हो सकता है।
एक भारत वह है जहां माता-पिता अपने बच्चे की शिक्षा के लिए निजी स्कूल, कोचिंग, डिजिटल डिवाइस और अतिरिक्त संसाधन खरीद सकते हैं।
दूसरा भारत वह है जहां सरकारी स्कूल या कॉलेज ही एकमात्र विकल्प है।
अगर सरकारी शिक्षा कमजोर होती है तो गरीब परिवार के बच्चे की प्रतिस्पर्धा पहले ही दिन कमजोर हो जाती है।
फिर हम समान अवसर की बात कैसे कर सकते हैं?
शिक्षा में असमानता अंततः आय में असमानता को स्थायी बना देती है।
उच्च शिक्षा में संख्या बढ़ी, लेकिन क्या गुणवत्ता भी उतनी बढ़ी?
उच्च शिक्षा में भारत ने निश्चित रूप से विस्तार किया है।
AISHE 2021-22 के अनुसार उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात 28.4 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। यह उपलब्धि छोटी नहीं है।
लेकिन भारत की जनसांख्यिकीय वास्तविकता को देखते हुए इसे अंतिम लक्ष्य भी नहीं माना जा सकता।
आज भारत के सामने तीन अलग-अलग समस्याएं एक साथ हैं—
पहली—पहुंच।
हर युवा तक उच्च शिक्षा पहुंचाना।
दूसरी—गुणवत्ता।
उसे ऐसी शिक्षा देना जो सिर्फ परीक्षा और डिग्री तक सीमित न हो।
तीसरी—रोजगार।
शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच वास्तविक संबंध बनाना।
अगर इन तीनों में से एक भी कमजोर है तो डिग्री का सामाजिक मूल्य घटने लगता है।
'विश्वगुरु' बनने से पहले विश्वस्तरीय नागरिक संस्थाएं बनानी होंगी
भारत को विश्वगुरु कहने में कोई समस्या नहीं है, यदि यह एक आकांक्षा है।
समस्या तब पैदा होती है जब यह आत्ममूल्यांकन का विकल्प बन जाए।
विश्वगुरु बनने का अर्थ केवल प्राचीन ज्ञान पर गर्व करना नहीं है।
उसका अर्थ होगा—
ऐसे स्कूल जहां बच्चे पढ़ना सीखें।
ऐसे कॉलेज जहां छात्राओं को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष न करना पड़े।
ऐसे विश्वविद्यालय जहां शोध हो।
ऐसे शिक्षक जिन्हें सम्मान, प्रशिक्षण और संसाधन मिले।
ऐसी परीक्षाएं जिनमें रटने के बजाय सोचने की क्षमता मापी जाए।
ऐसी अर्थव्यवस्था जहां डिग्री रोजगार में बदल सके।
और ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था जहां नागरिक को अपनी गरिमा के लिए निजी विकल्प खरीदने की मजबूरी न हो।
विश्वगुरु का पहला प्रमाण भाषण नहीं, संस्थान होते हैं।
विदेशी Travel Advisory को विकास का अंतिम प्रमाण मानना भी गलत होगा
भारत के बारे में विदेशी सरकारों की travel advisories का उल्लेख अक्सर राष्ट्रीय गौरव के सवाल से जोड़ दिया जाता है।
लेकिन इसे भी तथ्यात्मक रूप से समझना चाहिए।
उदाहरण के लिए ब्रिटेन की मौजूदा भारत यात्रा सलाह में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के लिए यात्रा से बचने की चेतावनी है, जिसमें भारत-पाकिस्तान सीमा के 10 किलोमीटर के भीतर का क्षेत्र और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से शामिल हैं। (GOV.UK)
इसका अर्थ यह नहीं कि 'विदेशी भारत को असुरक्षित देश मानते हैं' और न ही यह भारत की पूरी तस्वीर है।
लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि सुरक्षा, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, आपदा प्रबंधन और नागरिक सुविधाओं से जुड़ी चिंताएं अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के अनुभव और किसी देश की वैश्विक छवि को प्रभावित करती हैं।
इसलिए किसी travel advisory को राष्ट्र के अपमान की तरह देखने के बजाय उसे नीति संकेतक की तरह पढ़ना अधिक समझदारी होगी।
असली सवाल यह है कि GDP बढ़ने के बाद नागरिक कितना बदला?
GDP जरूरी है।
लेकिन GDP अंतिम लक्ष्य नहीं है।
यदि अर्थव्यवस्था 7-8 प्रतिशत की गति से बढ़ती है लेकिन बच्चे बुनियादी पढ़ने की क्षमता हासिल नहीं कर पाते, युवा रोजगार योग्य कौशल से वंचित रहते हैं और सरकारी संस्थानों में न्यूनतम सुविधाओं का अभाव बना रहता है, तो विकास का मॉडल अधूरा है।
दुनिया के सामने भारत की सबसे बड़ी चुनौती अब केवल गरीबी कम करना नहीं है।
मानव क्षमता को बड़े पैमाने पर बढ़ाना है।
विश्व बैंक का हालिया मानव पूंजी अध्ययन भी चेतावनी देता है कि कई निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में सीखने के परिणामों में पिछले डेढ़ दशक में प्रगति बेहद सीमित रही है और कुछ मामलों में स्थिति खराब हुई है। (World Bank)
भारत को इसी जाल से बाहर निकलना होगा।
तो रास्ता क्या है?
भारत को शिक्षा पर केवल घोषणाएं नहीं, दीर्घकालीन राष्ट्रीय निवेश अनुशासन चाहिए।
NEP 2020 ने शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को GDP के 6 प्रतिशत तक ले जाने की महत्वाकांक्षा रखी थी। यह लक्ष्य केवल बजट की एक पंक्ति नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा नीति का वित्तीय आधार होना चाहिए।
लेकिन पैसा अकेला समाधान भी नहीं है।
हमें पांच स्तरों पर काम करना होगा—
पहला—Foundational Learning
कक्षा 3 तक पढ़ना, लिखना और बुनियादी गणित हर बच्चे का अधिकार बने।
दूसरा—Teacher Quality
शिक्षक भर्ती के साथ प्रशिक्षण, जवाबदेही और पेशेवर विकास को समान महत्व मिले।
तीसरा—Basic Infrastructure
शौचालय, पानी, बिजली, इंटरनेट, पुस्तकालय और प्रयोगशाला को 'अतिरिक्त सुविधा' नहीं बल्कि शिक्षा की मूल शर्त माना जाए।
चौथा—Higher Education Reform
कॉलेजों की संख्या बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उनकी गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध और रोजगार परिणामों की स्वतंत्र समीक्षा हो।
पांचवां—Outcome-based Funding
सरकार को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कितने स्कूल बने।
यह देखना चाहिए कि—
कितने बच्चों ने पढ़ना सीखा?
कितने बच्चों ने गणित सीखा?
कितने स्नातक रोजगार योग्य बने?
कितने कॉलेजों में पर्याप्त शिक्षक हैं?
कितने संस्थानों में छात्राओं के लिए वास्तव में कार्यशील सुविधाएं हैं?
यानी सरकार को खर्च का नहीं, परिणाम का हिसाब देना होगा।
1991 का सुधार अधूरा नहीं था, लेकिन उसका अगला अध्याय अधूरा है
भारत को उदारीकरण के बाद की उपलब्धियों को कम करके नहीं आंकना चाहिए।
लेकिन उपलब्धियों को स्वीकार करना और कमियों पर सवाल उठाना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
बल्कि परिपक्व राष्ट्र वही है जो दोनों कर सके।
1991 ने भारत को बाजार की नई ऊर्जा दी।
अब 2026 के भारत को मानव पूंजी की नई ऊर्जा चाहिए।
अगले 25 वर्षों में भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक बन सकता है।
लेकिन यह यात्रा केवल एक्सप्रेसवे, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, स्टार्टअप और GDP से पूरी नहीं होगी।
उसका असली आधार वह बच्चा होगा जो सरकारी स्कूल में बैठकर पहली बार किताब पढ़ रहा है।
वह लड़की होगी जो बिना किसी असुविधा और भय के कॉलेज जा सके।
वह शिक्षक होगा जिसके पास पढ़ाने के लिए समय, प्रशिक्षण और संसाधन हों।
वह स्नातक होगा जिसकी डिग्री नौकरी के दरवाजे पर बेकार कागज न बन जाए।
और वह नागरिक होगा जिसे अपने देश पर गर्व करने के लिए प्रचार की नहीं, अपने रोजमर्रा के जीवन में बेहतर संस्थानों की जरूरत होगी।
इसलिए आज भारत के सामने प्रश्न यह नहीं है कि हम विश्वगुरु हैं या नहीं।
प्रश्न इससे कहीं अधिक बुनियादी है—
क्या हम अपने हर बच्चे को इतना सक्षम बना पाए हैं कि वह उस विश्व का नागरिक बन सके जिसका नेतृत्व करने का दावा हम करते हैं?
अगर उत्तर अभी 'पूरी तरह हां' नहीं है, तो राष्ट्रवाद का सबसे सार्थक रूप यही होगा कि हम नारों से कुछ समय निकालकर स्कूल की उस कक्षा में पहुंचें जहां एक बच्चा अभी भी 'क' से 'किताब' पढ़ना सीख रहा है।
क्योंकि विश्वगुरु बनने की शुरुआत विश्वस्तरीय नागरिक बनाने से होती है।
और विश्वस्तरीय नागरिक भाषणों से नहीं,
शिक्षा से बनते हैं।





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