
अपना नायक खोजता सिनेमा खुद खो तो नहीं गया है !
हिंदी सिनेमा का वर्तमान दौर एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। कभी समाज की धड़कनों से अपने नायक गढ़ने वाला यह माध्यम आज अपने ही अतीत, मिथकों और सफल फार्मूलों की ओर बार-बार लौटता नजर आता है। दो भागों में फिल्म बनाने का जो चलन Gangs of Wasseypur जैसी फिल्मों से मुख्यधारा में मजबूत हुआ, वह अब केवल एक क्रिएटिव निर्णय नहीं रह गया, बल्कि एक आर्थिक रणनीति बन चुका है। आज किसी भी बड़ी फिल्म को दो या तीन हिस्सों में बांटना केवल कहानी की मांग नहीं, बल्कि कमाई को अधिकतम करने की योजना का हिस्सा बन गया है।
इस प्रवृत्ति को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि अब सिनेमा का मूल्यांकन उसके शिल्प, संवेदना या सामाजिक प्रभाव से पहले उसकी बॉक्स ऑफिस कमाई के आधार पर किया जाता है। एक फिल्म सफल है या नहीं, यह इस बात से तय होता है कि उसने कितने करोड़ कमाए, न कि उसने किस तरह की कहानी कही। यही कारण है कि निर्माता जोखिम लेने से बचते हैं और पहले से सफल फार्मूलों—फ्रेंचाइज़, रीमेक और मिथकीय कथाओं—पर दांव लगाना सुरक्षित मानते हैं। हाल के वर्षों में Baahubali: The Beginning और KGF: Chapter 1 जैसी फिल्मों की अपार सफलता ने यह स्थापित कर दिया कि भव्यता, विस्तार और सीक्वल की संभावना ही आज के बाजार की सबसे बड़ी मांग है।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा नुकसान “नायक” का हुआ है। हिंदी सिनेमा का नायक कभी समाज के बीच से निकलता था—वह आम आदमी की आकांक्षाओं, संघर्षों और विरोधाभासों का प्रतिनिधि होता था। Deewaar का विजय या Rang De Basanti के युवा पात्र केवल काल्पनिक चरित्र नहीं थे, बल्कि अपने समय के सामाजिक मनोविज्ञान का प्रतिबिंब थे। आज का सिनेमा उस नायक को गढ़ने में असमर्थ दिखता है, क्योंकि वह समाज की जटिलताओं से संवाद करने के बजाय उनसे बचने की कोशिश कर रहा है।
यही कारण है कि आज मिथकों की ओर लौटने का चलन तेज हुआ है। पौराणिक कथाएँ सुरक्षित हैं—वे पहले से लोकप्रिय हैं, विवाद की संभावना कम है और दर्शकों के बीच उनकी स्वीकार्यता तय है। इसी तरह रीमेक और फ्रेंचाइज़ भी एक तरह का “सुरक्षित निवेश” बन चुके हैं, जहाँ कहानी पहले से परखी हुई होती है। दूसरी ओर, नए नायक को गढ़ने के लिए जिस सामाजिक समझ, जोखिम और रचनात्मक साहस की जरूरत होती है, वह कम होता जा रहा है।
संगीत के क्षेत्र में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। पुराने गानों के रीमिक्स लगातार बन रहे हैं, क्योंकि वे पहले से हिट हैं और उनकी पहचान बनी हुई है। लेकिन नए गीत, जो समय की आत्मा को पकड़ सकें, अपेक्षाकृत कम बन पा रहे हैं। यह केवल संगीत की समस्या नहीं, बल्कि रचनात्मकता के व्यापक संकट का संकेत है।
इस परिदृश्य में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या सिनेमा अपने मूल उद्देश्य से भटक रहा है? क्या वह केवल एक उद्योग बनकर रह गया है, जहाँ लाभ ही अंतिम लक्ष्य है? यदि सिनेमा समाज से अपने नायक नहीं खोज पाएगा, तो वह केवल भव्य दृश्यों और दोहराई गई कहानियों का संग्रह बनकर रह जाएगा।
स्पष्ट है कि आज के दौर में सिनेमा के पास तकनीक है, संसाधन हैं, बाजार है—लेकिन शायद वह सबसे जरूरी चीज खो रहा है: अपने समय का सच्चा नायक। जब तक यह नायक समाज के बीच से निकलकर पर्दे पर नहीं आएगा, तब तक मिथक, रीमेक और फ्रेंचाइज़ ही इस खालीपन को भरते रहेंगे।
Ankit Awasthi





Leave A Comment
Don’t worry ! Your email address will not be published. Required fields are marked (*).