
कहानी - प्रोफ़ेसर
काशीपुर एक ऐसा शहर है जो हर साल थोड़ा और पुराना हो जाता है। उसकी गलियाँ वही हैं, मगर उनमें अब रौनक कम और धूल ज़्यादा दिखती है। पुराने मकान अपनी सीलन में इतिहास को सहेजे हुए हैं, और लोगों के चेहरे जैसे किसी बीते युग की छाया में खोए हुए। इन्हीं गलियों में एक पीला-सा दोमंज़िला मकान है — जिसमें प्रोफ़ेसर विवेक शर्मा रहते हैं। कभी इस मकान में विचारों की बहसें हुआ करती थीं, चाय की प्यालियों से तर्क छलकते थे, और दीवारों पर किताबों की छाया पड़ती थी। अब वहीं एक अकेला आदमी रहता है, जो हर सुबह दो कप चाय बनाता है — एक अपने लिए, और एक उस स्त्री के लिए जो सात साल पहले ये घर छोड़ गई थी, बिना कोई शोर किए। नीरा, विवेक की पत्नी, वर्षों तक उनके साथ रही — किताबों की भीड़ में, व्याख्यानों की गूंज में, और एक ऐसे घर में जहाँ हर कोना सोचता था, मगर कोई भी महसूस नहीं करता था। एक दिन नीरा ने बस इतना पूछा था — “क्या तुम्हारे जीवन में मैं भी कोई विचारधारा हूँ, या केवल एक बाधा?” और उसके कुछ दिन बाद वह चुपचाप चली गई। विवेक ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। शायद उन्होंने सोचा कि ये सिर्फ़ भावुकता है, और भावनाओं से जीतना उन्हें हमेशा आता रहा है।
विवेक एक आदर्शवादी प्रोफ़ेसर रहे हैं। उन्होंने अपने जीवन का हर वर्ष किताबों, विचारधाराओं, तर्कों और छात्रों के साथ बिताया है। उनकी भाषा में प्रखरता थी, सोच में आग, और आँखों में उस युग का सपना जिसे वे रचते थे — एक विवेकशील भारत। पर यह भी सच था कि उनकी दुनिया में सहमति के लिए बहुत कम जगह थी, और असहमति के लिए कोई नहीं। उनका बेटा श्रेय, जो कभी उनकी तरह कविताएँ लिखता था, अब एक मल्टीनेशनल कंपनी में बैठा डेटा विश्लेषण करता है। एक समय था जब वह अपने पिता के कमरे में आकर डायरी की कोई नई कविता पढ़कर सुनाता था। पर एक दिन विवेक ने उस पर टिप्पणी कर दी — “ये पंक्तियाँ अभी कच्ची हैं, जीवन पढ़ो पहले।” श्रेय ने धीरे से डायरी बंद की थी और फिर कभी कुछ नहीं सुनाया। विवेक की कक्षा में एक छात्र था — आलोक। गाँव से आया था, पर आँखों में बिजली थी। वह उनका सम्मान करता था, पर अंधानुकरण नहीं करता। उसकी सबसे बड़ी ‘गलती’ यही थी कि वह सवाल करता था — राष्ट्र पर, आस्था पर, प्रगतिशीलता पर। और विवेक, जिनकी दुनिया तर्कों की गढ़ी हुई इमारत थी, उस छात्र की सरल लेकिन साहसी जिज्ञासा से भीतर से काँप जाते थे।
जब आलोक ने अपने शोध विषय के लिए ‘गांधी और सावरकर के विचारों की तुलनात्मक पड़ताल’ का प्रस्ताव रखा, विवेक ने उसे ठुकरा दिया। उन्होंने कहा, “तुम्हारे विचार असंगत हैं, इनसे विभाग की साख को ठेस पहुँच सकती है।” तीन सप्ताह बाद, उसकी फेलोशिप रद्द कर दी गई। विवेक को तब संतोष हुआ था, जैसा किसी ने मन से काँटा निकाल दिया हो। पर वो काँटा वहीं रह गया था — धीरे-धीरे चुभता हुआ, साँसों में, नींदों में, और उन चुप्पियों में जो अब उनके जीवन का स्थायी भाव बन चुकी थीं। सेवानिवृत्ति का दिन आया। विश्वविद्यालय में समारोह रखा गया — “प्रोफेसर शर्मा का आख़िरी व्याख्यान।” पूरा हॉल भरा हुआ था। मंच पर फूल, पीछे बैनर — “ज्ञान ही मुक्ति है।” विवेक खड़े हुए। माइक के सामने चश्मा ठीक किया, रजिस्टर खोला, और फिर जैसे समय थम गया। पीछे से एक आवाज़ आई — “सर, क्या आज आप वो कहेंगे जो आपने कभी खुद से भी नहीं कहा?” वो आवाज़ जानी-पहचानी थी। आलोक।
हॉल में जैसे साँसें रुक गईं। विवेक ने उस रजिस्टर को बंद कर दिया, जैसे अपने पुराने सारे तर्कों पर एक पत्थर रख दिया हो। उन्होंने बिना कोई भाषण दिए बोलना शुरू किया — “मैंने जीवनभर बोलना सीखा, सुनना नहीं। मैंने रिश्तों को विचारों की चश्मे से देखा — पत्नी की भावनाओं को ‘भावुकता’, बेटे की कविताओं को ‘अपरिपक्वता’, और छात्रों की जिज्ञासा को ‘विद्रोह’ मान लिया। मैंने प्रेम को तर्क से तौला, और हार को कभी स्वीकार नहीं किया। मैं सब पर भारी पड़ा, पर अब समझ आता है — मैंने खुद को ही खो दिया।” उन्होंने मंच से उतरकर बैनर की ओर देखा — “ज्ञान ही मुक्ति है।” अपनी जेब से एक काला पेन निकाला और उसमें से एक शब्द काट दिया।
अब बैनर पर सिर्फ़ लिखा था —
“सुनना ही मुक्ति है।”
भीड़ चुप थी, जैसे किसी मंदिर में कोई घंटी बिना आवाज़ के बज गई हो। उन्होंने एक पल मंच से नीचे की भीड़ को देखा — वे चेहरे जो कभी उनके छात्र थे, जो कभी उनकी बातों पर सिर हिलाते थे, और कभी खामोशी से तर्कों में गुम हो जाते थे। आज उन चेहरों में एक अजीब सा संतुलन था — आदर और प्रश्न के बीच झूलता हुआ। उनकी आँखें हल्की सी नम थीं, लेकिन आवाज़ में स्थिरता थी। उन्होंने कहा नहीं कि उन्हें अफ़सोस है, न ही कोई क्षमा माँगी। पर उनकी चुप्पी में एक पूरा जीवन दफ़न था — ऐसा जीवन जो अब फिर से शुरू नहीं हो सकता, बस देखा जा सकता है। जब वे मंच से नीचे उतरे, हर कदम उनके भीतर के पत्थरों को हिला रहा था। जैसे कोई विचार, पहली बार विचार नहीं बल्कि एक अनुभव बन रहा हो — स्पर्श की तरह, पीड़ा की तरह, या शायद एक खोए हुए संबंध की तरह। बाहर निकलते हुए आलोक उनके पास आया। विवेक ने अपनी जेब से एक तस्वीर निकाली — नीरा, श्रेय और खुद की। तीनों मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन तस्वीर में भी विवेक किताब में झाँक रहे थे।
वो तस्वीर आलोक को थमाते हुए बोले —
“ये मेरी सबसे बड़ी गलती की तस्वीर है — जहाँ मैं सबके बीच था, लेकिन किसी के साथ नहीं था।”
Ankit Awasthi





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