
क्या लखनऊ के वैज्ञानिकों ने खोज लिया पराली का इलाज?
हर साल फसल कटाई के बाद खेतों में बची पराली और डंठलों का सवाल किसानों के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो जाता है। धान, मक्का, गेहूं और गन्ने जैसी फसलों के अवशेषों को हटाने में समय, मेहनत और खर्च — तीनों लगते हैं। मजबूरी में कई किसान पराली जलाने का रास्ता चुनते हैं, जिसका असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहता बल्कि शहरों तक जहरीला धुआं फैल जाता है। अब इस समस्या के समाधान की दिशा में Central Soil Salinity Research Institute के वैज्ञानिकों ने एक नई उम्मीद जगाई है।
संस्थान के वैज्ञानिकों ने वर्षों की रिसर्च के बाद एक विशेष जैविक लिक्विड तैयार किया है, जिसे “Halo Care” नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह घोल खेतों में पड़े फसल अवशेषों को बेहद कम समय में सड़ाकर जैविक खाद में बदल सकता है। अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो पराली जलाने की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
संस्थान से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार यह लिक्विड एक खास प्रकार के फंगस आधारित मिश्रण पर तैयार किया गया है। इसे विकसित करने में करीब तीन वर्षों तक लगातार प्रयोग और परीक्षण किए गए। सामान्य परिस्थितियों में खेतों में बची पराली को पूरी तरह गलकर खाद बनने में दो से तीन महीने तक लग जाते हैं, लेकिन “Halo Care” के इस्तेमाल से यही प्रक्रिया लगभग तीन हफ्तों में पूरी हो सकती है।
मुख्य वैज्ञानिक Sanjay Arora के मुताबिक लैब और खेतों में किए गए ट्रायल में यह तकनीक पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक प्रभावी साबित हुई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह घोल फसल अवशेषों को तेजी से मिट्टी में मिलाने में मदद करता है, जिससे खेत की उर्वरता पर भी सकारात्मक असर देखा गया।
इस तकनीक की एक बड़ी खासियत इसकी कम लागत बताई जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार एक लीटर लिक्विड की कीमत लगभग 150 रुपये रखी गई है। इसे 200 लीटर पानी में मिलाकर एक एकड़ खेत में छिड़का जा सकता है। यानी बहुत कम खर्च में किसान खेत के कचरे को जैविक खाद में बदल सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह मॉडल व्यापक स्तर पर लागू होता है, तो किसानों की लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है।
इससे तैयार होने वाली खाद मिट्टी की सेहत सुधारने में भी उपयोगी मानी जा रही है। लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से कई इलाकों में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। ऐसे में जैविक खाद का इस्तेमाल खेतों में कार्बन की मात्रा बढ़ाने और मिट्टी की संरचना मजबूत करने में मदद कर सकता है। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि इससे फसलों की पैदावार में भी सुधार देखा गया है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह तकनीक केवल धान की पराली तक सीमित नहीं है। गेहूं की नरई, मक्का के डंठल और गन्ने के पत्तों पर भी इसके प्रभावी परिणाम सामने आए हैं। यानी एक ही समाधान कई फसलों के अवशेष प्रबंधन में उपयोगी साबित हो सकता है।
पराली जलाने की समस्या लंबे समय से पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंता का विषय रही है। खासकर उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान खेतों से उठने वाला धुआं वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। इससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है और शहरों में स्मॉग की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में अगर किसानों को सस्ता और आसान विकल्प मिलता है, तो यह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम माना जा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रोडक्ट के पेटेंट की प्रक्रिया जारी है और भविष्य में इसे कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है। यदि यह तकनीक जमीनी स्तर पर सफलतापूर्वक लागू होती है, तो यह खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में ऐसी तकनीकों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है, जो खेती की लागत कम करें, मिट्टी को स्वस्थ रखें और प्रदूषण घटाने में मदद करें। “Halo Care” जैसी पहलें यह संकेत देती हैं कि आधुनिक विज्ञान और कृषि अगर साथ मिलकर काम करें, तो खेती की कई पुरानी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है।
Ankit Awasthi





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