
उपन्यास की आड़ में इतिहास से खिलवाड़ - बावनी इमली
उपन्यास मतलब भाव प्रधान भावनात्मक प्रभाव डालने वाला काल्पनिक चित्रण, जो कि उचित भी है हर तरह के पाठक हर तरह की पसंद और उस पाठक वर्ग के लेखक और लेखक को प्रकाशित करने वाले प्रकाशक....
यहाँ तक सब ठीक है, मगर इतिहास के साथ कल्पना का मिश्रण मेरी नज़र में जायज नहीं है|
आइए बताता हूँ क्यों
कुछ साल पहले आई विकास नारायण राय की किताब 'भगत सिंह से दोस्ती' के अंतिम पन्नों में दर्ज एक चिट्ठी थी, जो वीरांगना दुर्गा भाभी को भगत सिंह ने लिखी थी|
बेहद मार्मिक और दार्शनिक चिट्ठी जिसे पढ़ आपको लगेगा कि इस चिट्ठी के बहाने भगत सिंह ने अपना कलेजा खोल कर रख दिया हो, मगर सच ये नहीं था....
कई वर्ष गुज़र गए, फिर एक पत्रिका के संपादन के दौरान चल रहे शोध में पता चला, भगत सिंह आल राइटिंग में कहीं भी भगत सिंह व दुर्गा भाभी के बीच कोई पत्र संवाद ही नहीं हुआ...
इंटरनेट की दुनिया में स्रोत खोजने की कोशिश की तो देखा उस ही किताब के हवाले से कुछ अच्छी वेबसाइटों ने वो ही सेम पत्र छाप रखा था...
प्रमाणिकता के लिए जिज्ञासावश ख्यातिलब्ध लेखक से पूछा तो, जवाब मिला " नहीं... नहीं... दरसल वो पुस्तक तो संपादित ही है, मगर वो पत्र मैंने ही उपन्यास शैली में भगत सिंह की तरफ से लिख दिया था| उसको आप ना ही छापें तो बेहतर "
मैंने उनसे भी कहा कि लिख देते कि 'ये पत्र काल्पनिक पत्र है' और दोस्तों इतिहास के बड़े चेहरों के बीच अपनी कल्पना से पत्र संवाद करा देना मेरी नज़र में साहित्यिक अपराध है|
यह स्थिति तब नहीं रह जाती जब ये स्पष्ट होता है कि ये उपन्यास है, प्रकाशक साफ लिख दें कि ये उपन्यास है ताकि आम पाठक भ्रमित ना हों | मगर अतीत को साहित्यिकता व भावुकता से परोस कर हम अच्छे उपन्यासकार तो बन सकते हैं, क्योंकि हमारे पास इतिहास में दबी कहानी है| मगर हम कहीं ना कहीं किरदार के साथ तब न्याय नहीं कर रहे होते...
दूसरा उदाहरण पिछले दिनों मेरे शहर के एक व्यक्ति ने 1857 के क्रांतिकारी इतिहास पर एक किताब लिखी, आकर्षक कवर पेज पर "उपन्यास" का कहीं जिक्र नहीं जैसे अक्सर रिपोर्ट, शोध, कहानी आदि होता है बिना किताब खोले आप जान नहीं सकते कि सामग्री क्या है, पाठक भ्रम कि स्थिति में रहेगा... और विषय अत्यंत रोचक था पुस्तक का नाम था "1857 के क्रांतिनायक अजीमुल्ला खाँ" मगर ये समझ नहीं आया कि कितनी हकीकत कितना फसाना... क्योंकि भाई उपन्यास है|
उसे भावुकता में बहने के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए, हकीकत समझने के लिए तो बिल्कुल भी नहीं...
मैंने अधिकांशत: आज़ादी पर उपन्यास लिखने वालों को, कोई तारीखी त्रुटि से बचने के लिए उपन्यास की आड़ लेते देखा है कि अरे साहब ये तो उपन्यास है इसमें डाटा और फैक्ट मत ढूंढिए.....बात है भी एकदम सही... मगर मेरा सवाल है कि जैसे हड्डी के डॉक्टर - दाँतों के ईलाज पर लेक्चर नहीं देते वैसे ही गंभीर कल्पना शक्ति रख मानसिकता झकझोर दे सकने वाले उपन्यासकार राष्ट्र, अतीत और इतिहास संबंधित शोध आधारित संवेदनशील मुद्दों को अपना विषय क्यों बनाने लगे हैं ?
इतिहास में दबी कहानियों का सानिध्य ले रहे तमाम उपन्यासकारों की कल्पनाशीलता में क्या कोई कमी आ गई है ?
प्रमाणित स्रोत का दर्ज होना उपन्यास में कतई जरूरी नहीं क्योंकि भाई कल्पना का खेल है| मगर कल्पना के कारीगरों द्वारा इतिहास के संवेदनशील मुद्दों को अपना विषय क्यों बनाना पड़ रहा है ?
वे बनाएं और जरूर बनाएं स्वागत है मगर जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व के साथ क्योंकि राष्ट्र, धर्म और इतिहास के अनसुलझे या अधूरे पहलुओं पर लिखना पुण्य का काम है, मगर उपन्यास की आड़ में कुछ भी लिख देना और टोके जाने पर काल्पनिक कलम को ढाल की तरह इस्तेमाल करना बेहद अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण है|
ऐसे ही इतिहास के पन्नों में कहीं दबी रह गई 1857 की एक जीवंत कहानी को उपन्यास रूप देकर हाल ही में चर्चित लेखक @Bhagwant Anmol ने भी जाने अंजाने कुछ ऐसा ही किया, 153 पन्नों की 300 ₹ की राजपाल प्रकाशन से छपी उनकी किताब फ़तेहपुर जिले के जिन गुमनाम नायकों को समर्पित है, उनका नाम उल्लेखित करना भी उचित नहीं समझा जबकि अंत पेजों पर पूर्व प्रकाशित पुस्तकों का विवरण डालने की पर्याप्त जगह है|
फिर कह दूँ, उपन्यास लेखन की कोई जरुरी शर्त नहीं है कि सूची विवरण आदि का उल्लेख किया जाए मगर मेरी वैचारिक पीड़ा ये है कि ऐसे विषयों के साथ ही ऐसा क्यों ? मानो जैसे जिस मरीज के टूटे पैर को सर्जरी कि आवश्यकता है, उसके माथे पर मरहम लगा कर उपचार का दावा किया जा रहा हो |
कवर पेज तो मार्केटिंग का हिस्सा होता ही है, ठीक यूँ ही पुस्तक बावनी इमली के शानदार कवर पर भी भारी पेड़ पर लटकी लाशों का दृश्य देखने को मिलता है| अब अधिकांश पुस्तकों का कवर पेज भी यूट्यूबिया थमनेल की तरह एक धोखा ही है| शुरुवाती दौर में मैं भी कवर मात्र से लोभान्वित हो कर कई किताबें ले आता था, मगर कवर जितनी गंभीर सामग्री अंदर ना पा कर असंतोष का भाव रहता था इसलिए अब पुस्तक खरीदने से पहले कवर और इंडेक्स का तुलनात्मक विश्लेषण कर लेता हूँ| मगर उपन्यास में तो कोई अनुक्रम भी तो नहीं होता... बेनाम पाठों के टुकड़ों बटी एक कहानी होती है| उसका मूल्यांकन भी आप उससे गुजर कर ही कर सकते हैं| मतलब रिश्ते में आ कर साथ वक्त गुज़ार कर समझो पुस्तक कैसी है, दोस्ती हेतु प्री-डिस्कशन का कोई मौका ही नहीं...
पुस्तक 'बावनी ईमली' भी इतिहास में कल्पना का मिश्रण है| ये समझना मुश्किल होता है कि कल्पना कहाँ शुरू हो रही और इतिहास कहाँ ख़त्म हो रहा... लेखक बहुत युवा और काबिल होने के साथ पर्याप्त परिपक्व हैं इससे पूर्व भी उनकी कई किताबों ने पाठकों के मन भीतर अच्छी पैठ बनाई है मगर इस पुस्तक के कवर व प्रचार ने जितनी उत्सुकता और उत्साह पैदा किया, सामग्री ने उतना ही निराश किया |
हालांकि लेखक ने कहीं भी इतिहासकार होने का दावा नहीं किया मगर मुख्य पृष्ठ पर ही दो बार इतिहास शब्द का जिक्र मिलता है|
एक पंक्ति -- 1857 की क्रान्ति का ऐसा नरसंहार जो ''इतिहास'' के पन्नों में कहीं दबा रह गया
और दूसरी अनंत विजय की टिप्पणी में कि "बावनी इमली घटना के बिना 1857 स्वाधीनता संग्राम का इतिहास पूरा नहीं हो सकता है"
उपन्यास के पैमाने पर पुस्तक कितनी सफल है, ये विश्लेषण का विषय हो सकता है, मगर मेरा सवाल ये है कि उपन्यास की सामग्री बेचने वालों को इतिहास का बाजार क्यों चाहिए ?
शायद ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इतिहास विध - आलसी हो चुके हैं|
फिर भी मुझे खुशी हुई कि 1857 क्रांति के स्थानीय इतिहास को लेखक भगवंत ने उकेरा, वे स्वयं भी उसी मिट्टी से ताल्लुक रखते हैं मगर ऐसे गंभीर विषय को शोध दृष्टि से लाते तो ज्यादा अच्छा होता, ये विषय की माँग भी थी और उनकी कलम उपन्यास की ही है तो भी इस तरह इतिहास का तड़का लगाने से उन्हें बचना चाहिए था |
मेरी लेखक से कोई निजी आपत्ति नहीं, मगर मेरी शिकायत और दर्द लेखन की माँग कर रहे गंभीर विषयों में कल्पना का मिश्रण कर उपन्यास बनाने की नई परिपाटी से है|
यदि कानपुर कमिश्नर की हत्या हो जाए तो ऐसे में शोध, सवाल, खोज, रिपोर्ट आदि की आवश्यकता पहले होगी - उसमें कल्पना डाल कर उपन्यास लिखना कितना जायज़ मेरी छोटी समझ से परे है... मगर मेरी असहमति है।
अब अंतिम विवेचना उपन्यास शैली में दर्ज कहानी की भी....
कहानी की शुरूवात ईस्ट इंडिया कंपनी की भारी लगान के जरिए भारतीय रियासतों और किसानों के शोषणकारी विलय नीति से होती है| फतेहपुर का दोआबा क्षेत्र को केंद्र में है तो वहीं मंगल पांडे के प्रयासों की पहुँच भी गाँव तक है|
अपनी कविताओं से जोश भरने वाले वीर आल्हा गायक और योद्धा के रूप में जोधा सिंह अटैय्या को चित्रित किया गया है।
उनके पिता ठाकुर अमर सिंह एक न्यायप्रिय जमींदार हैं, जो अंग्रेजों के सामने बेबस हैं| जबकि कहानी में भावुक पक्ष को डालने के लिए लेखक ने जोधा सिंह की प्रेमिका को कई बार प्रस्तुत किया है| पुस्तक में जगह-जगह 'आल्हा' की पंक्तियों का उपयोग कथानक को ग्रामीण संस्कृति से जोड़ता है|
पात्रों के संवादों में आजादी की तड़प झलकती है मगर प्रेम जो एक अनंत तत्व है, शायद आज़ादी के दीवानों के किरदार में प्रेम प्रसंग आम पाठक पचा ना पाएं |
अच्छी बात ये भी कि ये पुस्तक उन नायकों को सम्मान देती है जिन्हें बड़े इतिहासकारों ने भुला दिया। फतेहपुर जैसे छोटे जिले के योगदान को रेखांकित करना अपने आप में उपलब्धि जैसा है| लोग अक्सर प्रदेश और राष्ट्र की बात करते नहीं थकते मगर अपने जिले और गाँव के गौरव के बारे में न्यूनतम जानते हैं...
ये उन लेखकों के अस्तित्व पर सवाल जैसा है कि जो विषय आपने छोड़ा उसे एक उपन्यासकार ने पकड़ा, पकड़ कर क्या किया कितना अच्छा लिखा वो अलग बात है मगर ऐसे विषय को लेखक ने छुआ, इसलिए लेखक का सामाजिक प्रोत्साहन और अभिनन्दन.... एक पक्ष ये भी है कि इतिहास की मुख्यधारा की किताबों ने इस विषय को ढंग से सामने लाया होता तो शायद किसी उपन्यासकार को फिर इस पर कलम चलाने की जरूरत ही ना पड़ती....मगर ऐसे विषयों पर जब कुछ दृश्यों में अधिक नाटकीयता देखने को मिलती है तो शुद्ध इतिहास प्रेमियों का दर्द भी जायज़ हो जाता है|
नकारात्मक बिन्दु ये कि पुस्तक का विषय विस्तार की माँग करता है जबकि 153 पन्नों में इतने बड़े संघर्ष को समेटने के कारण कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ियाँ बहुत तेजी से गुजर जाती हैं।
सकारात्मक बिन्दु ये है कि जो लोग 1857 की क्रांति को केवल दिल्ली, मेरठ या झाँसी तक ही समझते हैं, उन्हें पता चलता है कि भारत के गाँवों - गलियों में बहने वाले खून की दास्ताँ का एहसास होता है।
यह समीक्षक के निजी विचार है जिनके पिता स्वयं क्रन्तिकारी है, गया प्रसाद कटियार |
अंकित अवस्थी





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