
मंडी से मॉल तक: सस्ती फसल, महंगी रोटी !
जरा एक पल के लिए ठहरकर सोचिए। खेत में किसान अपना गेहूं बेचने जाता है, तो उसे तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक नहीं मिल पाता। कई जगहों पर वह मजबूरी में कम दाम पर फसल बेच देता है। दूसरी तरफ, शहर में वही गेहूं जब आटे के पैकेट में आपके किचन तक पहुंचता है, तो उसकी कीमत में कोई खास कमी नजर नहीं आती। सवाल सीधा है—अगर कच्चा माल सस्ता हुआ, तो तैयार माल महंगा क्यों बना हुआ है?
ताजा आंकड़े इस विरोधाभास को और साफ कर देते हैं। जनवरी 2025 से अप्रैल 2026 के बीच गेहूं के दाम करीब 5 रुपये प्रति किलो तक गिर गए। यह गिरावट मामूली नहीं है। बाजार के सामान्य नियम कहते हैं कि कच्चे माल की कीमत घटे तो उसका असर अंतिम उत्पाद पर भी दिखना चाहिए। लेकिन आटे के दाम में गिरावट नाममात्र की रही—कुछ पैसों की। यानी खेत में जो सस्ता हुआ, वह थाली तक पहुंचते-पहुंचते फिर महंगा कैसे हो गया?
इस पूरी कहानी में तीन किरदार हैं—किसान, प्रोसेसिंग/मिल सेक्टर और उपभोक्ता। हैरानी की बात यह है कि नुकसान पहले और आखिरी किरदार के हिस्से आता है, जबकि बीच की कड़ी अक्सर सुरक्षित और फायदे में दिखती है।
अब यह समझना जरूरी है कि गेहूं से आटा बनने तक की प्रक्रिया में कुछ वास्तविक लागतें जुड़ती हैं—जैसे मिलिंग (पीसाई), पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट, स्टोरेज, ब्रांडिंग, रिटेल मार्जिन और टैक्स। ये सब मिलकर कीमत बढ़ाते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन लागतों के नाम पर जो अंतर बन रहा है, वह जायज है या उसमें कहीं “अतिरिक्त मुनाफा” भी छिपा हुआ है?
यहीं से कहानी का असली एंगल शुरू होता है—फार्म टू फोर्क गैप, यानी खेत से थाली तक कीमत का सफर। अगर इस सफर को पारदर्शी तरीके से तोड़ा जाए, तो साफ दिखेगा कि हर स्तर पर कितना मूल्य जुड़ रहा है और कहां मार्जिन असामान्य हो रहा है। आज यही पारदर्शिता सबसे ज्यादा गायब है।
दूसरा बड़ा सवाल MSP और बाजार के रिश्ते का है। कागज पर MSP किसान की सुरक्षा के लिए है, लेकिन हकीकत यह है कि हर किसान अपनी पूरी उपज MSP पर नहीं बेच पाता। सरकारी खरीद सीमित होती है, और बड़ी मात्रा में अनाज खुले बाजार में कम कीमत पर चला जाता है। यानी किसान का “सुरक्षा कवच” व्यवहार में कमजोर पड़ जाता है।
तीसरा पहलू उपभोक्ता का है। आम आदमी यह मानकर चलता है कि अगर किसान को कम मिल रहा है, तो उसे सस्ता मिलना चाहिए। लेकिन बाजार में ब्रांडेड आटा और लोकल चक्की के आटे के बीच भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है। पैकेजिंग, ब्रांड वैल्यू और मार्केटिंग के नाम पर एक प्रीमियम वसूला जाता है, जो हर बार वास्तविक लागत से मेल खाए, यह जरूरी नहीं।
नीतिगत स्तर पर भी एक विरोधाभास साफ दिखता है। जब गेहूं के दाम बढ़ते हैं, तो सरकार स्टॉक लिमिट, निर्यात पर रोक जैसे कदम उठाकर बाजार को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। लेकिन जब कीमतें MSP से नीचे गिरती हैं, तो वही सख्ती दिखाई नहीं देती। यानी महंगाई काबू करने के नाम पर हस्तक्षेप तो है, लेकिन कीमतों के संतुलन में नहीं।
यही वह जगह है जहां नियामक भूमिका पर सवाल उठते हैं। क्या कीमतों की निगरानी सिर्फ आंकड़े इकट्ठा करने तक सीमित है, या फिर जरूरत पड़ने पर बाजार की असमानताओं पर नकेल कसने की भी जिम्मेदारी है? अगर उपभोक्ता को राहत नहीं मिल रही और किसान को उचित मूल्य नहीं, तो फिर यह अंतर आखिर किसके पक्ष में जा रहा है?
इस पूरे परिदृश्य को “लूट” कहना आसान है, लेकिन इसे समझना ज्यादा जरूरी है। यह सीधा-सीधा संकेत है कि आपूर्ति श्रृंखला में कहीं न कहीं संतुलन बिगड़ा हुआ है—या तो पारदर्शिता की कमी है, या प्रतिस्पर्धा की, या फिर नीति और क्रियान्वयन के बीच दूरी है।
समाधान क्या हो सकता है?
कीमतों की पूरी वैल्यू चेन का सार्वजनिक और नियमित ऑडिट
MSP खरीद की पहुंच बढ़ाना
मिलिंग और रिटेल सेक्टर में मार्जिन की निगरानी
लोकल प्रोसेसिंग यूनिट्स को बढ़ावा, ताकि बीच की कड़ी छोटी हो
उपभोक्ताओं के लिए स्पष्ट मूल्य सूचना
यह मुद्दा सिर्फ किसान या उपभोक्ता का नहीं है—यह भरोसे का है। जब खेत में मेहनत करने वाला और रोटी खरीदने वाला, दोनों ही खुद को ठगा हुआ महसूस करें, तो समस्या आर्थिक से ज्यादा नैतिक हो जाती है।
Ankit Awasthi





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