
सड़क पर बढ़ती अराजकता: आखिर भारत कब सीखेगा सुरक्षित चलना?
उत्तर भारत की सड़कें आज सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, बल्कि बढ़ती अधीरता, आक्रामकता और अव्यवस्था का आईना बन चुकी हैं। सुबह घर से निकलिए तो हर मोड़ पर कोई न कोई जल्दबाजी में दिख जाएगा। कोई गलत दिशा से बाइक घुसा रहा है, कोई नो-एंट्री तोड़ रहा है, कोई हाईवे को रेसिंग ट्रैक समझ रहा है और कोई मामूली ओवरटेक पर मारपीट पर उतारू हो जाता है। सड़क अब सिर्फ रास्ता नहीं रही, कई जगह वह गुस्से, दबाव और अव्यवस्थित मानसिकता का सार्वजनिक मंच बन चुकी है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के बांदा में हुई दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यही सवाल उठाया। नो-एंट्री क्षेत्र में भारी वाहनों की आवाजाही के बीच हुई दुर्घटना में एक वाहन में सवार लगभग पूरा परिवार खत्म हो गया। हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय हुआ, जांच के आदेश हुए, मुआवजे की घोषणा हुई और फिर धीरे-धीरे मामला खबरों से गायब होने लगा। लेकिन असली समस्या वहीं की वहीं रह गई — आखिर इतनी तकनीक, इतने कानून और इतने अभियानों के बाद भी भारत की सड़कें सुरक्षित क्यों नहीं हो पा रहीं?
सच यह है कि भारत में सड़क दुर्घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। वे लगभग रोजमर्रा की घटना बन चुकी हैं। हर दिन सैकड़ों लोग सड़क हादसों में मर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या युवाओं की होती है। यानी देश अपनी सबसे ऊर्जावान आबादी को सड़कों पर खो रहा है। दुखद यह भी है कि समाज ने इन मौतों को लगभग सामान्य मान लिया है। कुछ घंटे शोर होता है, सोशल मीडिया पर गुस्सा निकलता है, फिर अगली घटना पुरानी को ढंक देती है।
समस्या सिर्फ खराब सड़कें नहीं हैं। समस्या सड़क पर हमारा सामूहिक व्यवहार भी है। भारत में ट्रैफिक नियमों को अब भी कई लोग “अनिवार्य अनुशासन” नहीं, बल्कि “मौका मिलने पर तोड़ देने वाली चीज” मानते हैं। हेलमेट को बोझ समझा जाता है, सीट बेल्ट को औपचारिकता और स्पीड को स्टेटस। कई युवाओं के लिए तेज गाड़ी चलाना रोमांच और ताकत का प्रदर्शन बन चुका है। सोशल मीडिया की रील संस्कृति ने इस मानसिकता को और हवा दी है। सड़क पर स्टंट करते वीडियो लाखों व्यूज बटोरते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपा खतरा शायद ही कोई देखता है।
तकनीक जरूर आई है। ई-चालान, कैमरे, फास्टैग, एक्सप्रेसवे और डिजिटल मॉनिटरिंग बढ़ी है। लेकिन तकनीक वहां सीमित हो जाती है जहां मानसिकता बदलने से इनकार कर दे। अगर कोई व्यक्ति कैमरे से बचने के लिए हेलमेट पहनता है, सुरक्षा के लिए नहीं, तो यह बदलाव अधूरा है। यही वजह है कि कानून सख्त होने के बावजूद हादसे कम नहीं हो रहे।
कुछ समय पहले जब सड़क दुर्घटनाओं और हिट-एंड-रन मामलों को लेकर सख्त कानूनी प्रावधान आए तो देशभर में ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल देखने को मिली। हाल के महीनों में भी परिवहन क्षेत्र समय-समय पर विरोध करता रहा है। इससे यह साफ होता है कि केवल कठोर कानून बना देना समाधान नहीं है। सरकार और परिवहन क्षेत्र के बीच लगातार संवाद जरूरी है। ट्रक ड्राइवरों की वास्तविक परिस्थितियां भी समझनी होंगी। कई ड्राइवर 12-14 घंटे तक लगातार वाहन चलाते हैं। नींद की कमी, दबाव में डिलीवरी, खराब सड़कें और आराम की अपर्याप्त व्यवस्था भी हादसों की बड़ी वजह हैं।
भारत में परिवहन व्यवस्था को सिर्फ दंड आधारित मॉडल से नहीं चलाया जा सकता। जिस तरह सरकार ने एथेनॉल मिश्रण नीति में लोगों और कंपनियों को विकल्प आधारित रास्ता दिया, उसी तरह सड़क सुरक्षा में भी कुछ मानवीय और व्यावहारिक मॉडल विकसित करने होंगे। उदाहरण के लिए लंबी दूरी के ड्राइवरों के लिए अनिवार्य विश्राम केंद्र बनाए जा सकते हैं। बार-बार नियम तोड़ने वालों के लिए सिर्फ जुर्माना नहीं, अनिवार्य ट्रेनिंग और मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग जैसी व्यवस्था भी हो सकती है। सड़क सुरक्षा को स्कूल स्तर से शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा ताकि अगली पीढ़ी नियमों को बोझ नहीं, जिम्मेदारी समझे।
दुनिया के कई देशों ने यह करके दिखाया है। स्वीडन ने “विजन जीरो” मॉडल अपनाया, जिसमें लक्ष्य रखा गया कि सड़क पर किसी इंसान की मौत स्वीकार्य नहीं हो सकती। वहां सड़कें इस तरह डिजाइन की गईं कि इंसानी गलती होने पर भी जान बच सके। जापान में सड़क अनुशासन सामाजिक संस्कृति का हिस्सा है। नीदरलैंड ने शहरों को कारों से ज्यादा इंसानों और साइकिलों के लिए डिजाइन किया। इन देशों ने सिर्फ सड़कें चौड़ी नहीं कीं, बल्कि लोगों की सोच बदली।
भारत में अक्सर विकास का मतलब सिर्फ एक्सप्रेसवे और फ्लाईओवर मान लिया जाता है। लेकिन सड़क सुरक्षा सिर्फ सीमेंट और डामर से नहीं आती। वह अनुशासन, धैर्य और जिम्मेदारी से आती है। अगर समाज जल्दबाजी, गुस्से और नियम तोड़ने को “चालाकी” समझता रहेगा तो कोई तकनीक, कोई कैमरा और कोई कानून पूरी तरह सफल नहीं हो पाएगा।
आज जरूरत सिर्फ नए हाईवे बनाने की नहीं, बल्कि सड़क पर इंसान की कीमत समझने की है। क्योंकि हर सड़क दुर्घटना सिर्फ एक खबर नहीं होती। उसके पीछे किसी बच्चे का पिता, किसी मां का बेटा, किसी परिवार का भविष्य खत्म हो जाता है। मुआवजा कभी किसी जिंदगी की भरपाई नहीं कर सकता।
भारत अगर सच में विकसित देश बनना चाहता है तो उसे अपनी सड़क संस्कृति बदलनी होगी। वरना सड़कें भले चमकती रहें, लेकिन उन पर बिखरता खून विकास के हर दावे पर सवाल उठाता रहेगा।
Ankit Awasthi





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