KGMU में STF रिपोर्ट से मची हलचल, 13 डॉक्टरों की भूमिका की होगी जांच; छह सदस्यीय कमेटी गठित

लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण और महिला कर्मचारियों के उत्पीड़न से जुड़े मामले ने अब प्रशासनिक स्तर पर नया मोड़ ले लिया है। उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच रिपोर्ट में करीब 13 डॉक्टरों की भूमिका का उल्लेख होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस मामले में 6 नवंबर को हुई कार्यपरिषद की विशेष बैठक में छह सदस्यीय अनुशासनात्मक जांच समिति गठित करने का फैसला लिया गया।
समिति STF की रिपोर्ट, उससे जुड़े दस्तावेजों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करेगी। संबंधित शिक्षकों और कर्मचारियों का पक्ष भी सुना जाएगा। जांच के बाद ही यह तय होगा कि किन लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। यानी फिलहाल 13 डॉक्टरों को दोषी ठहराने या सभी पर एक जैसी कार्रवाई का फैसला नहीं हुआ है।
छह सदस्यीय कमेटी करेगी आरोपों और साक्ष्यों की पड़ताल
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद की अध्यक्षता में हुई कार्यपरिषद की बैठक में STF की रिपोर्ट पर विस्तार से चर्चा की गई। KGMU के नियमों के अनुसार गठित होने वाली समिति में कुलपति, कुलसचिव, विश्वविद्यालय के दो वरिष्ठ कार्यरत शिक्षक और दो स्वतंत्र सदस्य शामिल होंगे। स्वतंत्र सदस्यों के लिए वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इनमें सेवानिवृत्त वरिष्ठ IPS अधिकारियों को शामिल करने पर भी विचार है।
समिति को केवल STF की टिप्पणियों के आधार पर निर्णय नहीं लेना है, बल्कि रिपोर्ट के साथ उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और संबंधित पक्षों के जवाबों की भी समीक्षा करनी होगी। कुछ शिक्षकों और कर्मचारियों ने रिपोर्ट में अपना नाम या भूमिका गलत तरीके से शामिल किए जाने पर आपत्ति भी दर्ज कराई है। कार्यपरिषद ने इन आपत्तियों को नियमानुसार जांच के लिए संबंधित समितियों के सामने रखने का निर्णय लिया है।

13 डॉक्टरों की भूमिका पर उठे सवाल
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, STF की सात पन्नों की रिपोर्ट में करीब 13 डॉक्टरों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। इनमें विश्वविद्यालय के कुछ वरिष्ठ शिक्षक और ऐसे डॉक्टर भी शामिल बताए गए हैं, जो अब दूसरे संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं। रिपोर्ट में कुछ विभागों में महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य महिला कर्मचारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार, मानसिक उत्पीड़न और धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने जैसी शिकायतों का जिक्र है।
रिपोर्ट में यह आरोप भी सामने आया है कि कुछ जिम्मेदार लोगों ने शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं की और कथित आरोपियों को संरक्षण देने की कोशिश की। कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं को करियर प्रभावित करने या नौकरी से जुड़े नुकसान की धमकी दिए जाने की बात भी जांच रिपोर्ट में बताई गई है। इन सभी आरोपों की स्वतंत्र विभागीय जांच अभी बाकी है।
डॉ. रमीज की गिरफ्तारी से शुरू हुई थी बड़ी जांच
इस पूरे मामले की शुरुआत KGMU के पैथोलॉजी विभाग में जूनियर रेजिडेंट रहे डॉ. रमीजुद्दीन नायक उर्फ रमीज से जुड़े मामले से हुई थी। 9 जनवरी 2026 को उन्हें गिरफ्तार किया गया था। एक महिला रेजिडेंट डॉक्टर ने उन पर यौन शोषण और धर्मांतरण के लिए दबाव डालने के आरोप लगाए थे। इस संबंध में लखनऊ के चौक थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था।
इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में कथित तौर पर धर्मांतरण से जुड़े बड़े नेटवर्क की आशंका जताई गई। मामला केवल एक डॉक्टर तक सीमित न रहे, इसलिए STF को व्यापक जांच सौंपी गई। जांच के दौरान अलग-अलग विभागों की महिला कर्मचारियों और रेजिडेंट डॉक्टरों की शिकायतों को भी शामिल किया गया।
सरकार ने 30 अक्टूबर को KGMU से मांगी थी कार्रवाई की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश सरकार के चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 अक्टूबर को KGMU प्रशासन को पत्र भेजकर STF रिपोर्ट में नामित डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया था। संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी की ओर से जारी पत्र में KGMU अधिनियम, 2002 और विश्वविद्यालय की परिनियमावली, 2011 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करने तथा उसकी विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजने को कहा गया था।
सरकार ने STF की रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को उपलब्ध कराई थी। इसके बाद कार्यपरिषद की विशेष बैठक बुलाई गई और अब अनुशासनात्मक समिति के गठन का निर्णय सामने आया है।

विभागाध्यक्ष और प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर भी पड़ सकता है असर
इस मामले में कुछ डॉक्टर विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष या अन्य प्रशासनिक पदों पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। ऐसे में जांच के दौरान उनकी मौजूदा जिम्मेदारियों को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। मीडिया रिपोर्टों में संबंधित डॉक्टरों को प्रशासनिक पदों से हटाए जाने की संभावना जताई गई है, लेकिन इस संबंध में अंतिम निर्णय जांच और विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार ही होगा।
KGMU प्रशासन के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है—एक तरफ शिकायतों और STF रिपोर्ट में दर्ज आरोपों की निष्पक्ष जांच, दूसरी तरफ संस्थान की शैक्षणिक और चिकित्सा सेवाओं को प्रभावित होने से बचाना। छह सदस्यीय समिति की जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा कि किन डॉक्टरों या कर्मचारियों की भूमिका नियमों के विरुद्ध पाई जाती है।
फिलहाल KGMU में 13 डॉक्टरों से जुड़ा मामला जांच के अगले चरण में पहुंच गया है। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन पर निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई का दबाव है, लेकिन अंतिम निष्कर्ष आने से पहले किसी भी संबंधित व्यक्ति को दोषी मानना उचित नहीं होगा।
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