बिजली संकट से निपटने की बड़ी तैयारी, मोदी कैबिनेट ने ₹14,500 करोड़ की ऊर्जा भंडारण योजना पर लगाई मुहर

2031 तक 92 गीगावॉट-घंटे की नई स्टोरेज क्षमता बनाने का लक्ष्य, बैटरी से लेकर पानी के जरिए बिजली जमा करने वाली परियोजनाओं को मिलेगा सरकारी सहयोग
नई दिल्ली। देश में सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इन स्रोतों से हर समय एक समान बिजली नहीं मिल पाती। दिन में बनने वाली अतिरिक्त बिजली को सुरक्षित रखकर जरूरत के समय इस्तेमाल करना ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी चुनौती है। इसी समस्या का समाधान तलाशते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14,500 करोड़ रुपये की वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) योजना को मंजूरी दी है। इसके जरिए देश में बड़े स्तर पर ऊर्जा भंडारण प्रणाली विकसित की जाएगी।
सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2030-31 तक कुल 92 गीगावॉट-घंटे (GWh) की नई ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण क्षमता तैयार करने का है। इस योजना के तहत लगभग 97,600 करोड़ रुपये का कुल निवेश आने की उम्मीद है। सरकारी वित्तीय सहायता से ऐसी परियोजनाओं को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने में मदद मिलेगी, जिनकी शुरुआती लागत काफी अधिक होती है।
92 GWh क्षमता में तीन तरह की परियोजनाएं होंगी शामिल
कैबिनेट की मंजूरी के मुताबिक प्रस्तावित ऊर्जा भंडारण क्षमता को तीन हिस्सों में विकसित किया जाएगा।
60 GWh: पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज परियोजनाएं।
30 GWh: बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS)।
2 GWh: अन्य उभरती ऊर्जा भंडारण तकनीकें।
पंप्ड हाइड्रो परियोजनाओं में अतिरिक्त बिजली का इस्तेमाल करके पानी को ऊंचाई पर स्थित जलाशय में पहुंचाया जाता है। बिजली की मांग बढ़ने पर पानी को नीचे छोड़कर टरबाइन के माध्यम से दोबारा बिजली बनाई जाती है। वहीं बैटरी स्टोरेज सिस्टम में अतिरिक्त बिजली को बैटरियों में जमा करके जरूरत के समय ग्रिड में भेजा जा सकता है।

पांच साल तक मिलेगी सरकारी वित्तीय सहायता
इस योजना का क्रियान्वयन वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक किया जाएगा। 14,500 करोड़ रुपये की VGF सहायता का मकसद परियोजनाओं की शुरुआती लागत और वित्तीय जोखिम को कम करना है, ताकि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के निवेशक ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं में आगे आ सकें।
परियोजनाओं के लिए क्षमता का आवंटन टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा। बैटरी और पंप्ड हाइड्रो परियोजनाओं में बिजली वितरण कंपनियां VGF सहायता की पात्र होंगी। वैकल्पिक भंडारण तकनीकों की परियोजनाओं में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाएं भाग ले सकेंगी।
बैटरी निर्माण में स्वदेशी कंपनियों को मिलेगा बढ़ावा
योजना का एक महत्वपूर्ण पहलू घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करना है। इसके तहत बैटरी एनर्जी स्टोरेज परियोजनाओं में न्यूनतम 40 प्रतिशत घरेलू सामग्री की अनिवार्यता रखी गई है। इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और भारत में बैटरी तथा उससे जुड़े उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देना है।
इससे देश में ऊर्जा भंडारण से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने और भारतीय उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।

2031-32 तक 411 GWh भंडारण क्षमता की जरूरत
सरकार के आकलन के मुताबिक वर्ष 2031-32 तक भारत को लगभग 411 GWh ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण क्षमता की आवश्यकता होगी। नई योजना के तहत विकसित होने वाली 92 GWh क्षमता मौजूदा ग्रिड-स्तरीय भंडारण क्षमता के मुकाबले लगभग 170 प्रतिशत के बराबर नई क्षमता जोड़ने में मदद करेगी।
इसका सीधा उद्देश्य यह है कि दिन में सौर ऊर्जा से बनने वाली अतिरिक्त बिजली को शाम और रात के समय भी इस्तेमाल किया जा सके। इससे बिजली ग्रिड को संतुलित रखने, नवीकरणीय ऊर्जा की बर्बादी कम करने और चौबीसों घंटे बिजली आपूर्ति को अधिक भरोसेमंद बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
आम उपभोक्ताओं को क्या होगा फायदा?
इस योजना का लाभ केवल बिजली उत्पादन कंपनियों तक सीमित नहीं रहने की उम्मीद है। ऊर्जा भंडारण क्षमता बढ़ने से बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलेगी। खासकर शाम के समय, जब सौर ऊर्जा उत्पादन घट जाता है और बिजली की मांग बढ़ सकती है, तब स्टोर की गई बिजली उपयोगी होगी।
हालांकि, इस फैसले से बिजली बिल तुरंत कम होने की गारंटी नहीं है। इसका वास्तविक असर परियोजनाओं के निर्माण, लागत, बिजली खरीद समझौतों और वितरण व्यवस्था में सुधार पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, ₹14,500 करोड़ की यह योजना भारत को नवीकरणीय ऊर्जा के साथ-साथ उसे सुरक्षित रखने और जरूरत के समय इस्तेमाल करने की क्षमता देने की दिशा में बड़ा कदम है।
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