सहारा ग्रुप के पीएफ घोटाले में ट्रस्टियों पर एफआईआर का आदेश, ढिलाई पर लखनऊ पुलिस को कोर्ट की फटकार
लखनऊ। सहारा ग्रुप के हजारों कर्मचारियों के भविष्य निधि (पीएफ) की गाढ़ी कमाई में गबन के गंभीर मामले में अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन और उसकी सहयोगी कंपनियों में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन से लगातार पीएफ की कटौती करने के बावजूद उसे कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के खाते में जमा न करने के मामले में अदालत ने लखनऊ पुलिस को सहारा ग्रुप के पीएफ ट्रस्टियों के खिलाफ तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय ज्ञानेंद्र कुमार की अदालत ने प्रकीर्ण वाद संख्या- 1931/2026 (ई.पी.एफ.ओ. बनाम ओम प्रकाश श्रीवास्तव व अन्य) पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने मामले में हीलाहवाली करने पर लखनऊ पुलिस को सख्त फटकार लगाई और संबंधित थाना प्रभारी को निर्देश दिया कि वे प्रार्थना पत्र में वर्णित तथ्यों के आधार पर सुसंगत धाराओं में प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत कर नियमानुसार जांच शुरू करें तथा 1 सप्ताह के भीतर न्यायालय को सूचित करें।
क्या है पूरा मामला?
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के प्रवर्तन अधिकारी को सहारा ग्रुप की कंपनियों (जैसे सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन) में कार्यरत कर्मचारियों—अनुराग मिश्रा, दिनेश श्रीवास्तव, कलानिधि मिश्रा समेत अन्य—की ओर से शिकायतें प्राप्त हुई थीं। शिकायतों में आरोप लगाया गया कि नियोक्ता द्वारा कर्मचारियों के वेतन से हर महीने नियमित रूप से पीएफ अंशदान काटा जाता रहा, लेकिन इस राशि को ईपीएफओ के पास जमा न करके आपराधिक मंशा से गबन और दुरुपयोग किया गया।
विभाग द्वारा सहारा प्रबंधन से 07 फरवरी 2026 और 11 मार्च 2026 को पत्र भेजकर स्पष्टीकरण मांगा गया था, किंतु सहारा ग्रुप की ओर से न तो बकाया राशि जमा की गई और न ही कोई संतोषजनक जवाब दिया गया। विभागीय स्तर पर हुई जांच के अनुसार, सहारा ग्रुप पर कर्मचारियों का करीब 10 साल का पीएफ बकाया है, जिसकी कुल राशि 1200 करोड़ रुपये से भी अधिक आंकी गई है। हालांकि, ईपीएफओ के कड़े रुख के बाद सहारा की ओर से केवल 14 महीने का अंशदान जमा कराया गया था।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
ईपीएफओ अधिकारियों का आरोप है कि उन्होंने इस गंभीर वित्तीय अपराध के संबंध में 09 दिसंबर 2025 को थाना अलीगंज (लखनऊ) और 18 मार्च 2026 को पुलिस आयुक्त, लखनऊ को औपचारिक शिकायत भेजी थी। क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त अश्वनी कुमार ने इस सिलसिले में उच्च पुलिस अधिकारियों से मुलाकात भी की, लेकिन कई आश्वासनों के बावजूद पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया।
प्रकरण में यह बात भी सामने आई कि पुलिस ने ईपीएफओ को मौखिक रूप से सूचित किया था कि शासन स्तर के एक वरिष्ठ अधिकारी एफआईआर दर्ज करने के पक्ष में नहीं हैं। पुलिस द्वारा टालमटोल किए जाने और थाना अलीगंज से "कोई अभियोग पंजीकृत न होने" की आख्या प्राप्त होने के बाद ईपीएफओ को अदालत की शरण लेनी पड़ी।
अदालत का सख्त रुख और आदेश
प्रभावित पीएफ अंशधारकों के पक्षकार वरिष्ठ अधिवक्ता केके पाण्डेय ने बताया कि अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) सहपठित धारा 175(3) के तहत दाखिल प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए माना कि मामला प्रथम दृष्टया भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(2) और 316(5) के अंतर्गत आपराधिक न्यासभंग (Criminal Breach of Trust) का एक संज्ञेय और गंभीर अपराध है। बहस के उपरांत न्यायाधीश ज्ञानेन्द्र कुमार ने अलीगंज थानाध्यक्ष को सख्त आदेश देते हुए कहा कि ओम प्रकाश श्रीवास्तव व अन्य पीएफ ट्रस्टियों के खिलाफ सुसंगत कानूनी धाराओं में मामला दर्ज कर गहन विवेचना की जाए। अदालत के इस सख्त कदम के बाद अब माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में सहारा ग्रुप के जिम्मेदार अधिकारियों और ट्रस्टियों पर आपराधिक शिकंजा कसना तय है, जिससे वर्षों से अपने हक की गाढ़ी कमाई का इंतजार कर रहे कर्मचारियों में न्याय की उम्मीद जगी है।
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