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चुनावी लोकतंत्र में धांधली के लिए व्यवस्था में खुल्लम खुल्ला तोड़फोड़

Published By News DeskAuthor: नीलोत्पल बसु, अनुवाद : संजय पराते·19 Sept 2026 12:43 PM (IST)
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चुनावी लोकतंत्र में धांधली के लिए व्यवस्था में खुल्लम खुल्ला तोड़फोड़

हाल ही में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अपनी सोची-समझी चुप्पी तोड़ी है और एक बहुत छोटी-सी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि कुछ नागरिकों को ‘थोड़ी सी परेशानी’ हुईं है, इसके बावजूद, ‘साफ सुथरे चुनाव' कराने के लिए पूरे देश की मतदाता सूचियों को शुद्ध करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ज़रूरी था। इसे इस सदी की सबसे बड़ी कमजोरी माना जा सकता है।

पिछले साल बिहार में एसआईआर के शुरू होने के बाद से, यह न सिर्फ़ चुनावी विवादों में हावी रहा है, बल्कि देश की व्यापक राजनैतिक प्रक्रिया पर भी हावी रहा है। पीछे मुड़कर देखें तो, इस प्रक्रिया की विषय वस्तु के अलावा, स्वतंत्र संवैधानिक निकाय के रूप में चुनाव आयोग की ईमानदारी पर भी शक के बादल मंडरा रहे है। एसआईआर को लागू करते समय, चुनाव आयोग ने कहा था कि इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है और यह 2002-03 में मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए किए गए काम का दुहराव भर है।

चुनाव आयोग सच बोलने से बहुत कतरा रहा है, क्योंकि न तो संदर्भ बिन्दु का चुनाव किया गया और न ही 2002-03 में जिस सटीक पाठ का अनुसरण किया गया था, उसे कभी सार्वजनिक किया गया है। बहरहाल, हाल ही में 2002-03 के एसआईआर के लिए जारी दिशा-निर्देश अब सबके सामने आ गए हैं।

इससे यह साबित होता है कि चुनाव आयोग की बात पूरी तरह से गलत और झूठी है। 2002-03 की एसआईआर की प्रक्रिया में मतदाता सूची बनाने का जो तरीका शुरू से इस्तेमाल किया गया था, उसमें किसी भी मतदाता को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन देने की ज़रूरत नहीं थी। लेकिन 2025 में शुरू की गई प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव किया गया और 11 दस्तावेजों की सूची बनाई गई, जिन्हें मतादाताओं को अपने आवेदन पत्र के साथ देना ज़रूरी था, जिससे मतदाता सूची में उनका नाम शामिल होना पक्का हो जाएं। यह इस बात से अलग था कि उनके नाम 2002-03 से पहले के चुनावों की सूचियों में उनके माता-पिता में से किसी एक के नाम से जुड़े थे। इसका ऐलान करने के बाद कि ऐसे माता-पिता से जुड़े लोगों को कोई और दस्तावेज जमा नहीं करने होंगे, यह एक चाल थी।

एक और बात यह थी कि पूरी तरह से पुनरीक्षण करने के लिए समय सीमा बहुत कम थी। भाजपा-विरोधियों के कड़े प्रतिवाद के बावजूद, चुनाव आयोग ने घमंड और हठधर्मिता के साथ काम किया। यह अब तक चले आ रहे तौर-तरीकों से बिल्कुल उल्टा था। इससे पहले, जब भी चुनाव आयोग ऐसे कड़े कदम उठाने की सोचता था, सभी राजनीतिक दलों की आम सहमति के आधार पर ही काम करता था।

बिहार एसआईआर के परिणामस्वरूप, 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। यह चेतावनी का एक पर्याप्त संकेत था। इसके कारण चुनाव विश्लेषकों और इस विषय के विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से अपनी यह आशंका व्यक्त की थी कि देश भर में 10 करोड़ नामों को मतदाता सूचियों से हटाया जा सकता है। चुनाव आयोग और सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों ने तब इस अनुमान का मजाक उड़ाया था। लेकिन अब मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद, जहां एसआईआर हुआ है (नागालैंड और त्रिपुरा को छोड़कर), यह संख्या वास्तव में 13 करोड़ 37 लाख है। इसमें हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर शामिल नहीं है, जहां एसआईआर होना अभी बाकी है।

8 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने एक तालिका छापी थी। (एसआईआर की मसौदा सूची में आंकड़ों की गड़बड़ियां हैं, इसकी किसी स्वतंत्र एजेंसी एजेंसी से जांच कराने की ज़रूरत है।) असल में इन आंकड़ों से सिर्फ़ दो संभावनाएं बन सकती हैं -- या तो मतदाताओं की गिनती कम हुई है या आबादी की गणना ज़्यादा हो गई है। चूंकि दोनों गिनती सरकारी एजेंसियां करती हैं, इसलिए इसकी सिर्फ़ एक ही व्याख्या हो सकती है कि एसआईआर की मतदाता सूची के मसौदे से ही बड़े पैमाने पर लोगों को बाहर कर दिया गया है।

चूंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज होने की पात्रता संविधान के अनुच्छेद 326 में परिभाषित की गई है, जिसे बाद में 18 साल के नागरिकों को भी मताधिकार देने के लिए संशोधित किया गया है, फिर यह कैसे हो सकता है?

"लोक सभा और प्रत्येक राज्य की विधान सभा के लिए चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे ; अर्थात, जो भारत का नागरिक है और जो उपयुक्त विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत या उसके लिए तय की गई तारीख पर अठारह वर्ष से कम नहीं है और अन्यथा इस संविधान या उपयुक्त विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत गैर-निवास, मानसिक अस्वस्थता, अपराध या भ्रष्ट या अवैध आचरण के आधार पर अयोग्य नहीं है, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी चुनाव में मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार होगा।"

किसी मतदाता की नागरिकता का संदर्भ स्वाभाविक है। चुनाव आयोग के पास मतदाता की नागरिकता तय करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। वह किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए सिर्फ़ गृह मंत्रालय में अधिकारियों से पड़ताल कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट में लंबी चली कानूनी कार्रवाई में, सबसे बड़ी न्यायपालिका ने बिना किसी संदेह के यह बात दोहराई है।

लेकिन फिर भी, मतदाताओं को हटा दिया गया है और एसआईआर की कवायद पक्के तौर पर बहिष्करण की रही है। राज्यवार नतीजों की जांच पड़ताल से यह बात और साफ़ हो गई है। सबसे ज़्यादा विवादास्पद कवायद पश्चिम बंगाल में की गई, जहाँ मैपिंग और शुरुआती मसौदा जारी होने के बाद एक तीसरा चरण जोड़ा गया, जो ‘तार्किक विसंगति’ की रैंडम एल्गोरिदम से चलने वाले अंकन पर आधारित थी। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से, 19 न्यायिक अधिकरण (ट्रिब्यूनल) बनाए गए, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने चुनाव आयोग के बहिष्करण के फ़ैसले के असर की जाँच करने के लिए बनाया था। अंततः, इन ट्रिब्यूनल को 38,10,620 अपीलों की जाँच करनी थी।

शुरू में लगा कि इनमें से ज़्यादातर ऐसे मतदाता होंगे, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। लेकिन अब जो बात सामने आई है, वह यह है कि इनमें से 31 लाख अपीलें ऐसे लोगों की हैं, जिनके नाम पहले मतदाता सूची में शामिल थे, लेकिन बाद मे उन्हें हटा दिया गया है। जिन 82,782 अपीलों की जांच हुई और फैसला हुआ है, उनमें से 91 प्रतिशत लोगों के नाम सूची में बहाल कर दिए गए हैं।

जहां तक नाम खारिज करने की आवेदन पत्रों की बात है, तो सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही नहीं, बल्कि दूसरी जगहों पर भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के आरोप हैं। ये सब मुख्य रूप से भाजपा ने करवाया था और उसने बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) पर प्रपत्र 7 को थोक में जमा करके नाम हटाने का दबाव डाला था। यह संसद द्वारा बनाए गए चुनाव कानूनों का पूरी तरह से उल्लंघन है।

इंडियन एक्सप्रेस के 11 सितंबर के संपादकीय को देखना उपयोगी होगा : “गोड्डा में कम से कम चार बूथों पर, चुनाव अधिकारियों और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच टकराव ने एक परेशान करने वाला पैटर्न सामने लाया है : भाजपा कार्यकर्ताओं ने मसौदा सूची से नाम हटाने के लिए थोक में प्रपत्र 7 जमा किए। मतदाता पंजीयन नियम (रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स), 1960 के तहत, प्रपत्र 7 के जरिए मतदाता सूची में शामिल किए जाने के प्रस्ताव, मौजूदा नाम या उसे हटाने के अनुरोध पर आपत्ति जताई जा सकती है। यहां खतरे की घंटी साफ है – भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा नामों पर थोक में आपत्ति जताने से न सिर्फ प्रक्रियागत उल्लंघन के आरोप लगते हैं, बल्कि वे अल्पसंख्यक मतदाताओं को लक्ष्य करके हटाने की गंभीर चिंता भी पैदा करते हैं। जिन लोगों के नाम हटाने के लिए चिन्हित किया गया था, उनमें से कईयों ने ज़रूरी दस्तावेज़ जमा किए थे, पीढ़ियों से एक ही घर में रह रहे थे, या 2003 की मतदाता सूची में उनके नाम थे।”

“क्योंकि, सभी राज्यों में, एसआईआर का मकसद साफ़-सुथरी सूची बनाना नहीं, बल्कि कमज़ोर मतदाता को परेशान करना और इस प्रक्रिया में, उसे वोट देने से रोकना है। यह उस पर भरोसा नहीं करता, यह उसे अपने को भारतीय नागरिक साबित करने को कहता है, या, ज़्यादा सही कहें तो, नागरिक न होने के आरोप का जवाब देने के लिए कहता है। पूरे देश में, एसआईआर… सबूत का भार मतदाता पर डालता है, ऐसे दस्तावेज़ मांगता है, जिन्हें पाना अक्सर मुश्किल होता है, अवास्तविक समय सीमा तय करता है और ऐसा करके, प्रक्रिया को ही सज़ा बना देता है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निगरानी वाले चुनाव आयोग को यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए।"

लेकिन प्रपत्र 7 का गलत इस्तेमाल सिर्फ़ झारखंड तक ही सीमित नहीं है। उत्तराखंड के बारे में भी ऐसे ही आरोप लगे हैं और ऐसा लगता है कि न सिर्फ़ भाजपा के कार्यकर्ता मतदाता सूची में गलत तरीके से हेराफेरी करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि चुनाव प्राधिकरण, बीएलओ से लेकर इलेक्टोरल रिटर्निंग ऑफिसर (ईआरओ) तक, इन सबकी खुल्लम खुल्ला करतूतों को सरकारी संरक्षण मिल रहा है। इन सबको जोड़ने वाली एक बात यह है कि ऐसी गड़बड़ियों पर चुनाव आयोग साजिशन चुप है।

पश्चिम बंगाल में एसआईआर की कवायद के दौरान एक और बात साफ़ हुई। नामों की बहाली के लिए लगभग 7 लाख आवेदन पत्र आए थे। इनकी छानबीन करने के लिए न्यायिक अधिकरण गठित किए गए थे, जो वैसे भी बहुत ही कम थे और भौगोलिक रूप से कोलकाता में ही केंद्रित थे, (उन ज़िलों में नहीं, जिन्हें न्यायिक समाधान तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए और ज़्यादा फैला हुआ होना चाहिए था)। इन अधिकरणों द्वारा जांच के नतीजे में, 91 प्रतिशत को वापस मतदाता सूची में शामिल करने के लिए उपयुक्त पाया गया। यह तथ्य कि जो लोग मनमाने तार्किक विसंगति के आधार पर न्यायिक निर्णयाधीन की सूची में बने रहे, उन्हें आखिरकार वोट डालने से रोक दिया गया, यह रिकॉर्ड को और भी ज़्यादा खतरनाक बनाता है।

न्यायपालिका की निराशाजनक भूमिका

साफ़ दस्तावेजी और सांख्यिकीय रिकॉर्ड पेश करने और बिहार में इस काम में साफ़ तौर पर गलतियां होने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की कार्रवाई पर रोक लगाने से मना कर दिया है। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि चुनाव आयोग को स्वतंत्र रहने का अधिकार है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 324 में निरुपित किया गया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इस अधिकार को पूरी तरह से लागू करने पर ज़ोर देना गलत है, जबकि इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि चुनाव आयोग ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकार को सुनिश्चित करने पर उतना ध्यान नहीं दिया है। किसी भी संवैधानिक प्राधिकरण के पास ऐसी ताकत नहीं हो सकती, जिससे चुनाव प्रक्रिया में तोड़-फोड़ की जाएं और लोगों को मतदाता सूची से बाहर रखा जाए।

देश और राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए एक और खतरा यह है कि मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा है, जिसमें अल्पसंख्यक, दलित, महिलाएं और गरीब मेहनतकश लोग सबसे ज़्यादा वंचित हैं। यह बात राज्यवार मतदाता सूची के मसौदे और बहिष्करण के खास पैटर्न की जांच के बाद साफ़ हो जाती है। भले ही कोई यह बात मान ले कि वंचित करने की ऐसी कोशिशें सत्ताधारी भाजपा के फ़ायदों के लिए राजनीतिक रूप से सही थीं, लेकिन पहचान से जुड़े खास नतीजे हमारी संवैधानिक भावना और बुनियाद के बिल्कुल ख़िलाफ़ थे। आज इस तरह की भ्रष्ट और हेरफेर वाली प्रक्रिया के साथ, आने वाली जनगणना भी ऐसे बदलावों से भरी हुई है, जो जनगणना को नागरिकता से जुड़े मुद्दों से जोड़ते हुए दिखते हैं। नए तथाकथित जनसांख्यिकी आयोग के गठन से यह प्रक्रिया और भी मुश्किल हो गई है। संवैधानिक योजना के अनुसार, जनगणना की प्रक्रिया चुनाव क्षेत्रों के सीमांकन का आधार बनेगी। ऐसा लगता है कि यह पूरी कोशिश ऐसे चुनाव क्षेत्र बनाने और उन्हें पुनर्गठित करने की है, जो चुनावी तौर पर सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में होंगे।

फंडिंग का नया दोषपूर्ण तरीका

सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनावी बॉन्ड को खारिज करने और उन्हें गैर-कानूनी ठहराने के बाद, कॉर्पोरेट फंडिंग और लेन-देन की खुली चाल साफ-साफ नाकाम हो गई है। लेकिन, राजनैतिक पार्टियों के आय के विस्तृत लेखा की जांच से भाजपा तक फंड पहुंचने के बहुत ज़्यादा गलत तरीके सामने आये है। ऐसी ही फंडिंग की गड़बड़ियों के बीच बीबीसी की एक रिपोर्ट से यह नया खुलासा हुआ है कि राजनैतिक पार्टियों की गैर-कानूनी फंडिंग के ज़रिए और ज्यादा गड़बड़ियों का पूरा-पूरा खतरा है।

पहले ही एक रिपोर्ट आ चुकी है कि वित्त वर्ष 2022-23 में पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनैतिक पार्टियों की आय में 223 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात की 6 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनैतिक पार्टियों ने 2023-24 में लगभग 1,700.78 करोड़ रूपये का चंदा इकट्ठा किया, जो भाजपा को छोड़कर पांच राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय से कम से कम 200 करोड़ रूपये ज़्यादा है। यह तब है, जब इन पार्टियों ने मुश्किल से ही कोई उम्मीदवार खड़े किए थे। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इनमें से पांच गैर-मान्यता प्राप्त राजनैतिक पार्टियां गुजरात की थीं और 2019 और 2024 के बीच उनकी कुल आय 2,316 करोड़ रूपये थी।

बीबीसी ने इनमें से चार पार्टियों का पता लगाया, जिनके मुख्यालय अहमदाबाद में हैं, जबकि दो के मुख्यालय गुजरात के दूसरे हिस्सों में है। इस तरह की अजीबो गरीब फंडिंग की प्रवृत्ति के सबूत से स्वतः ही गलत काम साबित नहीं हो सकता। लेकिन, जो बात मंज़ूर नहीं है, वह यह है कि चुनाव आयोग ने ऐसी राजनैतिक पार्टियों को, जो असल में चुनावों में हिस्सा नहीं लेतीं, को ऐसी अजीब फंडिंग के सवाल को आयकर और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी एजेंसियों को नहीं भेजा। खासकर ईडी ने गलत वित्तीय कामों के लिए हर छोटे से इशारे पर, जिसका संबंध विपक्षी पार्टियों से हो सकता है, तुरंत कार्रवाई करने के लिए बदनामी कमाई है।

ज़्यादा जोश और अक्सर गलत और एकतरफ़ा कामों के चलते चुनावों से ठीक पहले विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्रियों को गिरफ्तार तक किया गया है। लेकिन बीबीसी की रिपोर्ट के बाद भी, किसी भी संबंधित प्राधिकरण की ओर से कोई औपचारिक जवाब नहीं आया है।

चुनाव में धांधली

भारतीय संविधान को स्वीकार करने और 1952 से आम चुनावों के आयोजन के बाद से, भारत ने सबसे बड़े चुनावी लोकतंत्र होने की प्रतिष्ठा अर्जित की है। दुनिया भर से चुनाव अधिकारी उन तरीकों का अध्ययन करने आए थे, जो काफी हद तक अनोखे साबित हुए थे और स्पष्ट विश्वसनीयता के साथ कायम हैं। लेकिन, यह एक गुजरे जमाने की बात लगती है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों की चयन प्रक्रिया के माध्यम से चुनाव आयोग को वस्तुतः एक कार्यकारी शाखा में बदल दिया गया है। सरकार की ऐसी विधायी कार्रवाई के परिणामस्वरूप चुनावों के संचालन की वर्तमान दिशा एक गतिरोध पर पहुंच गई है। इस पर नागरिकों का विश्वास अब कायम नहीं रह सकता।

एक पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया, जिसमें सबके लिए बराबर का मौका हो और एक स्वतंत्र चुनाव आयोग के बिना देश का भविष्य खराब है। विपक्षी पार्टियों को भी स्वतंत्र चुनाव के ज़्यादा भरोसेमंद सबूत की मांग के लिए एकजुट होना होगा। यहां तक कि इसमें चुनाव आयोग के वर्तमान मुखिया को हटाने की मांग भी शामिल की जा सकती है।

(लेखक माकपा पोलिट ब्यूरो के सदस्य, 'पीपुल्स डेमोक्रेसी' के संपादक और पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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