पिघलते हिमालय की चेतावनी: ग्लेशियरों का संकट, जंगलों का विनाश और विकास के नाम पर प्रकृति की कीमत

जलवायु परिवर्तन कोई राजनीतिक प्रचार नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों से दर्ज होती वास्तविकता है। सवाल यह है कि जब हिमालय की बर्फ तेजी से घट रही है, जंगलों पर दबाव बढ़ रहा है और मौसम का मिजाज बदल रहा है, तब हमारी विकास नीतियाँ कितनी बदल रही हैं?
भारत में जलवायु परिवर्तन पर चर्चा अक्सर गर्मी बढ़ने, बारिश अनियमित होने और कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा पड़ने तक सीमित रह जाती है। लेकिन एक बड़ा संकट हमारी आँखों के सामने धीरे-धीरे आकार ले रहा है—हिमालय के ग्लेशियरों का सिकुड़ना।
इस संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सितंबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बाद रॉयटर्स ने हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से नुकसान और संभावित जल संकट को लेकर वैज्ञानिक चेतावनी पर रिपोर्ट की। अगस्त 2026 में नेपाल के भोटेकोशी–त्रिशूली क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने भी यह याद दिलाया कि हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर, पहाड़ी ढलान, झीलें और नदियाँ कितनी संवेदनशील व्यवस्था का हिस्सा हैं। सवाल केवल बर्फ के पिघलने का नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों के भविष्य का है जिनका जीवन इन पहाड़ों से निकलने वाली नदियों पर निर्भर है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन खतरों के बारे में वैज्ञानिक चेतावनियाँ वर्षों से मौजूद हैं, लेकिन निगरानी और आपदा से पहले चेतावनी देने वाली व्यवस्थाएँ अभी भी व्यापक स्तर पर पर्याप्त नहीं हैं। क्या हम किसी बड़ी त्रासदी के बाद ही अपनी प्राथमिकताएँ तय करेंगे?
हिमालय की बर्फ पिघलना अब अनुमान नहीं, दर्ज किया गया वैज्ञानिक तथ्य है
18 मार्च 2026 को अंतरराष्ट्रीय संस्था ICIMOD (International Centre for Integrated Mountain Development) ने हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों पर नई रिपोर्ट जारी की। इसके निष्कर्षों के अनुसार, वर्ष 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र के ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल लगभग 12 प्रतिशत घटा और अनुमानित बर्फ भंडार में लगभग 9 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।
रिपोर्ट का एक और गंभीर निष्कर्ष यह है कि वर्ष 2000 के बाद ग्लेशियरों से बर्फ का नुकसान पहले की तुलना में लगभग दोगुनी गति से हुआ है। 1975 के बाद कुछ स्थानों पर ग्लेशियरों की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है।
यह कोई छोटा भौगोलिक बदलाव नहीं है। हिंदूकुश हिमालय को एशिया का जल-भंडार कहा जाता है। यहाँ से निकलने वाली नदी प्रणालियाँ भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन सहित कई देशों के करोड़ों लोगों की कृषि, पेयजल, ऊर्जा और आजीविका से जुड़ी हैं।
इस रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पक्ष निगरानी की कमजोरी भी है। ICIMOD के अनुसार, 38 निगरानी वाले ग्लेशियरों में से केवल सात विश्व ग्लेशियर निगरानी सेवा (WGMS) के वैश्विक मानकों के अनुरूप नियमित निगरानी की कसौटी पर खरे उतरते हैं। सिक्किम, जांस्कर और कराकोरम जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी निगरानी का अंतर बना हुआ है।
यानी संकट का एक हिस्सा यह भी है कि हम जिस प्राकृतिक व्यवस्था में तेजी से बदलाव देख रहे हैं, उसके हर हिस्से की पर्याप्त जानकारी हमारे पास नहीं है।
नेपाल की चेतावनी भारत के लिए भी खतरे की घंटी
नेपाल में ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों का संकट भारत से अलग नहीं है। हिमालय की नदियाँ राजनीतिक सीमाओं को नहीं पहचानतीं। नेपाल में किसी ग्लेशियल झील के टूटने या पहाड़ी ढलान पर अस्थिरता पैदा होने का असर नीचे की नदी घाटियों और सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच सकता है।
अगस्त 2026 में नेपाल के भोटेकोशी–त्रिशूली क्षेत्र में आई बाढ़ पर Nature India में प्रकाशित टिप्पणी ने शुरुआती चेतावनी प्रणालियों की कमी पर सवाल उठाए। इसमें बताया गया कि कुछ संवेदनशील स्थानों पर बाढ़ की लहर पहुँचने से पहले उपलब्ध चेतावनी का समय केवल पाँच से तीस मिनट तक हो सकता है। ऐसे हालात में समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना बेहद कठिन हो जाता है।
हिमालय क्षेत्र में 200 से अधिक ग्लेशियल झीलों को बहुत अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। लेकिन केवल झीलों की संख्या जानना पर्याप्त नहीं है। यह जानना जरूरी है कि कौन-सी झील कितनी तेजी से बढ़ रही है, उसके आसपास की बर्फ और चट्टानों की स्थिति क्या है तथा नीचे बसे गाँवों तक चेतावनी पहुँचाने की व्यवस्था कितनी सक्षम है।
भारत के लिए यह चेतावनी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में ग्लेशियरों, हिमनद झीलों और पहाड़ी नदियों का बड़ा नेटवर्क है।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने 31 जुलाई 2025 को संसद में बताया था कि हिंदूकुश हिमालय के ग्लेशियरों के पीछे हटने की औसत दर लगभग 14.9 मीटर प्रति वर्ष है। अलग-अलग नदी घाटियों में यह दर अलग रही। 1975 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी ग्लेशियरों में बर्फ के समतुल्य द्रव्यमान का संचयी नुकसान लगभग 26 मीटर जल-समतुल्य बताया गया।
यहाँ एक वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है: ग्लेशियर का पीछे हटना, उसकी मोटाई घटना और उसके कुल बर्फ-द्रव्यमान में कमी—तीनों संबंधित हैं, लेकिन एक ही माप नहीं हैं। इसलिए इन आँकड़ों को मिलाकर कोई एक औसत निकालना उचित नहीं होगा।
क्या ग्लोबल वार्मिंग वास्तव में हो रही है या यह भी कोई प्रचार है?
जलवायु परिवर्तन को लेकर कभी-कभी यह तर्क दिया जाता है कि पृथ्वी पर मौसम हमेशा बदलता रहा है, इसलिए आज की गर्मी या ग्लेशियरों का पिघलना भी प्राकृतिक चक्र का हिस्सा हो सकता है। इस तर्क में आधा सच है। पृथ्वी की जलवायु में प्राकृतिक बदलाव हमेशा होते रहे हैं। लेकिन आज का वैज्ञानिक प्रश्न यह है कि वर्तमान तेजी से हो रही गर्मी के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?
IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट का निष्कर्ष स्पष्ट है—मानवीय गतिविधियों ने वातावरण, महासागरों और भूमि को गर्म किया है। औद्योगिक गतिविधियों, जीवाश्म ईंधन के जलने, भूमि उपयोग में बदलाव और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने जलवायु प्रणाली को प्रभावित किया है।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मार्च 2026 में संसद में दिए गए जवाब में अपने ही वैज्ञानिक आकलन का हवाला देते हुए बताया कि 1901 से 2018 के बीच भारत के सतही वायु तापमान में लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज हुई। उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के समुद्री सतह तापमान में 1951 से 2015 के बीच लगभग 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई।
सरकार के उसी जवाब में यह भी कहा गया कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियों से जुड़े ग्रीनहाउस गैसों और भूमि उपयोग में बदलाव के स्पष्ट संकेत मिले हैं। मध्य भारत, उत्तर भारत और पश्चिमी हिमालय में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में बदलाव भी दर्ज किया गया है।
इसलिए ग्लोबल वार्मिंग को किसी राजनीतिक दल, पर्यावरण संगठन या उद्योग-विरोधी लॉबी का बनाया हुआ मुद्दा बताना वैज्ञानिक प्रमाणों की अनदेखी होगी।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर बाढ़, हर सूखा या हर चक्रवात का अकेला कारण जलवायु परिवर्तन है। किसी विशेष आपदा के पीछे स्थानीय भूगोल, बारिश की तीव्रता, निर्माण गतिविधियाँ, जल निकासी और अन्य प्राकृतिक कारण भी होते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन इन घटनाओं की पृष्ठभूमि और जोखिम को बदल सकता है।
यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है—न अतिशयोक्ति, न इनकार।
एक कानून, सभी नागरिक: UCC लागू होने पर बदलेंगे शादी, तलाक और संपत्ति से जुड़े नियम
जंगलों का सवाल: केवल पेड़ गिनना पर्याप्त नहीं
ग्लेशियरों के साथ जंगलों की स्थिति पर भी गंभीर चर्चा जरूरी है। जंगल केवल लकड़ी या हरियाली का स्रोत नहीं हैं। वे कार्बन को अवशोषित करते हैं, मिट्टी को बाँधते हैं, जलचक्र को प्रभावित करते हैं, जैव विविधता को सहारा देते हैं और स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं।
अप्रैल 2026 में जारी Global Forest Watch के 2025 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में 2025 के दौरान लगभग 1.40 लाख हेक्टेयर प्राकृतिक वन क्षेत्र का नुकसान दर्ज किया गया। इसी प्लेटफॉर्म के दीर्घकालिक आँकड़े बताते हैं कि 2001 से 2025 के बीच भारत में लगभग 24 लाख हेक्टेयर वृक्ष-आवरण का नुकसान दर्ज हुआ।
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है। Tree cover loss का अर्थ हमेशा स्थायी वनों की कटाई नहीं होता। इसमें आग, बीमारी, तूफान, कटाई और अन्य कारणों से पेड़ों के आवरण का नुकसान भी शामिल हो सकता है। इसलिए इसे सीधे स्थायी वनों की कटाई का आँकड़ा कहना सही नहीं होगा।
दूसरी ओर, भारत सरकार की Forest Survey of India की India State of Forest Report 2023 में देश का कुल वन और वृक्ष आवरण 25.17 प्रतिशत बताया गया। 2021 की तुलना में इसमें 1,445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई।
तो क्या दोनों रिपोर्ट एक-दूसरे का खंडन करती हैं?
जरूरी नहीं। दोनों की परिभाषाएँ, मापन की विधियाँ और आँकड़ों की गणना अलग हैं। सरकारी रिपोर्ट वन और वृक्ष आवरण के राष्ट्रीय आकलन को देखती है, जबकि Global Forest Watch उपग्रहों से प्राप्त वृक्ष-आवरण में होने वाले बदलावों को मापता है। एक रिपोर्ट में कुल क्षेत्रफल बढ़ना और दूसरी में कुछ स्थानों पर वृक्ष-आवरण का नुकसान दर्ज होना एक साथ संभव है।
लेकिन इस बहस का असली सवाल इससे आगे है—क्या नए लगाए गए पेड़ पुराने प्राकृतिक जंगलों की पारिस्थितिक भूमिका निभा सकते हैं?
एक औद्योगिक क्षेत्र के किनारे लगाए गए पौधे और हजारों वर्षों में विकसित हुए प्राकृतिक जंगल को समान नहीं माना जा सकता। प्राकृतिक जंगल में पेड़ों के साथ मिट्टी, जलस्रोत, सूक्ष्म जीव, वन्यजीव और स्थानीय पारिस्थितिकी का जटिल संबंध होता है। इसलिए वन संरक्षण का मूल्यांकन केवल लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि प्राकृतिक जंगलों की गुणवत्ता, जैव विविधता और निरंतरता से होना चाहिए।
अल नीनो: मौसम के बदलते समीकरणों में एक और महत्वपूर्ण कारक
जलवायु परिवर्तन की चर्चा में अल नीनो का जिक्र भी जरूरी है। अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्री सतह के तापमान के सामान्य से अधिक होने की एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों के तापमान और वर्षा के पैटर्न पर पड़ता है।
भारत में अल नीनो को अक्सर कमजोर मानसून की आशंका से जोड़ा जाता है। हालांकि यह संबंध हर साल एक जैसा नहीं होता। भारतीय मानसून पर हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole), समुद्री तापमान, स्थानीय मौसमी प्रणालियों और अन्य कई कारकों का भी प्रभाव रहता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी अपने पूर्वानुमान में बताया कि अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है और अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान इसके और तीव्र होने की संभावना है। WMO के पूर्वानुमान में दिसंबर के आसपास इसके चरम पर पहुँचने की आशंका भी व्यक्त की गई।
भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने जुलाई 2026 में संसद में बताया था कि भारतीय मानसून के दौरान अल नीनो की स्थितियाँ विकसित हुई थीं और जुलाई में वे कमजोर से मध्यम स्तर तक पहुँची थीं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका वास्तविक प्रभाव समुद्र और वायुमंडल की संयुक्त परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
यहाँ एक अंतर समझना आवश्यक है: अल नीनो स्वयं मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग नहीं है। यह प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता का हिस्सा है। लेकिन पहले से गर्म होती पृथ्वी पर अल नीनो जैसी घटनाएँ तापमान और वर्षा के जोखिम को और जटिल बना सकती हैं।
इसलिए अल नीनो को लेकर भय फैलाने के बजाय वैज्ञानिक पूर्वानुमान, कृषि तैयारी, जल प्रबंधन और मौसम संबंधी चेतावनियों पर ध्यान देना जरूरी है।
विकास का मॉडल और पूंजीवाद की पर्यावरणीय कीमत
अब इस पूरे संकट का सबसे असुविधाजनक सवाल सामने आता है—क्या हमारी आर्थिक व्यवस्था प्रकृति की कीमत पर उपभोग और उत्पादन बढ़ाने को प्राथमिकता दे रही है?
आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अधिक उत्पादन, अधिक बिक्री, अधिक खपत और लगातार आर्थिक विस्तार पर आधारित है। इसमें रोजगार, निवेश, तकनीक और जीवन स्तर सुधारने की संभावनाएँ भी हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब उत्पादन और उपभोग से होने वाली पर्यावरणीय क्षति का वास्तविक खर्च बाजार की कीमत में शामिल नहीं होता।
उदाहरण के लिए, किसी उद्योग को कोयला जलाकर सस्ती बिजली मिल सकती है, लेकिन उससे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों का नुकसान किसी दूसरे क्षेत्र के किसान, तटीय समुदाय या हिमालयी आबादी को उठाना पड़ सकता है। किसी परियोजना से तत्काल राजस्व और रोजगार पैदा हो सकता है, लेकिन उसके कारण जंगल, जलस्रोत या प्राकृतिक ढलान को नुकसान पहुँचे तो उसकी दीर्घकालिक कीमत समाज चुकाता है।
अर्थशास्त्र में इसे Negative Externality यानी नकारात्मक बाह्य प्रभाव कहा जाता है। इसका मतलब है कि किसी आर्थिक गतिविधि का पूरा सामाजिक और पर्यावरणीय खर्च उस वस्तु या सेवा की बाजार कीमत में शामिल नहीं होता।
अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न ने अपनी चर्चित Stern Review में जलवायु परिवर्तन को दुनिया की सबसे बड़ी बाजार विफलताओं में से एक बताया था। उनका तर्क था कि बाजार अपने आप पर्यावरणीय नुकसान की वास्तविक कीमत नहीं जोड़ता, इसलिए सरकारों और संस्थाओं को नीतिगत हस्तक्षेप करना पड़ता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर पर्यावरणीय समस्या का कारण केवल पूंजीवाद है या आर्थिक विकास रोक देना ही समाधान है। बल्कि सवाल यह है कि विकास किस तरह का हो रहा है, उसका लाभ किसे मिल रहा है और पर्यावरणीय नुकसान कौन उठा रहा है?
यदि किसी परियोजना का लाभ कुछ कंपनियों और उपभोक्ताओं को मिले, जबकि उसकी पर्यावरणीय कीमत स्थानीय समुदायों, जंगलों और आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़े, तो उस विकास मॉडल की समीक्षा आवश्यक है।
प्रकृति को केवल कच्चे माल का भंडार मानने वाली अर्थव्यवस्था अंततः अपनी ही उत्पादन व्यवस्था के आधार को कमजोर करती है।
क्या सरकार और वैज्ञानिक पर्याप्त काम कर रहे हैं?
यह कहना गलत होगा कि भारत में वैज्ञानिक या सरकारी संस्थाएँ जलवायु परिवर्तन पर बिल्कुल काम नहीं कर रहीं। भारत में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, विभिन्न विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और हिमालयी संस्थाओं द्वारा ग्लेशियरों, वर्षा, तापमान और आपदा जोखिमों पर अध्ययन किए जा रहे हैं।
सरकार ने संसद में ग्लेशियर निगरानी के लिए कई संस्थानों के काम का विवरण भी दिया है। Forest Survey of India नियमित वन आकलन करता है। मौसम विभाग पूर्वानुमान और चेतावनी जारी करता है। लेकिन इन पहलों की मौजूदगी और उनकी पर्याप्तता दो अलग प्रश्न हैं।
ICIMOD की 2026 रिपोर्ट में सीमित ग्लेशियर निगरानी और कई क्षेत्रों में डेटा की कमी को रेखांकित किया गया है। नेपाल की बाढ़ पर Nature India की टिप्पणी ने भी शुरुआती चेतावनी व्यवस्था के विस्तार की जरूरत बताई है।
इसलिए असली आलोचना यह नहीं होनी चाहिए कि वैज्ञानिक कुछ नहीं कर रहे। बल्कि यह होनी चाहिए कि वैज्ञानिक चेतावनियों को सरकारी नीतियों, स्थानीय प्रशासन और विकास परियोजनाओं तक कितनी गंभीरता से पहुँचाया जा रहा है?
क्या हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी परियोजनाओं की मंजूरी देते समय जलवायु जोखिम का पर्याप्त आकलन होता है? क्या संवेदनशील ग्लेशियल झीलों के आसपास स्वचालित निगरानी और अलार्म सिस्टम हैं? क्या स्थानीय लोगों को यह जानकारी है कि आपात स्थिति में किस दिशा में जाना है? क्या वन भूमि के उपयोग में बदलाव का वास्तविक पारिस्थितिक प्रभाव सार्वजनिक किया जाता है?
ये सवाल किसी एक सरकार के नहीं, बल्कि भारत की पूरी विकास व्यवस्था के हैं।
ISRO की बड़ी कामयाबी: अंतरिक्ष में पहुंचा NVS-03, अब भारत को रास्ता दिखाएगा अपना स्वदेशी NavIC
अब क्या बदलना चाहिए?
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में घोषणाएँ करना पर्याप्त नहीं होगा। भारत जैसे विशाल और विविध देश को अपने स्थानीय भूगोल के अनुसार ठोस कदम उठाने होंगे।
1. हिमालयी ग्लेशियरों की नियमित निगरानी: भारतीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाकर अधिक ग्लेशियरों पर दीर्घकालिक निगरानी स्थापित की जाए। उपग्रह, रिमोट सेंसिंग और जमीनी मापन को एक साथ इस्तेमाल किया जाए।
2. ग्लेशियल झीलों की शुरुआती चेतावनी: संवेदनशील झीलों के आसपास सेंसर, कैमरे, जलस्तर मापन और स्वचालित अलर्ट सिस्टम लगाए जाएँ। नीचे बसे गाँवों तक समय रहते सूचना पहुँचाने की व्यवस्था हो।
3. जंगलों की गुणवत्ता को प्राथमिकता: केवल पौधारोपण के आँकड़े नहीं, बल्कि प्राकृतिक जंगलों की स्थिति, जैव विविधता और पारिस्थितिक निरंतरता को संरक्षण का आधार बनाया जाए।
4. विकास परियोजनाओं का ईमानदार पर्यावरणीय आकलन: सड़क, बांध, खनन, पर्यटन और औद्योगिक परियोजनाओं में जलवायु जोखिम, भूस्खलन और जलस्रोतों पर पड़ने वाले प्रभाव को गंभीरता से शामिल किया जाए। आकलन की रिपोर्ट सार्वजनिक और जवाबदेह हो।
5. जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना: नवीकरणीय ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ औद्योगिक तकनीक में निवेश बढ़ाया जाए। ऊर्जा संक्रमण के दौरान गरीब और श्रमिक वर्ग पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े, इसका ध्यान रखा जाए।
6. जलवायु अनुकूल कृषि और जल प्रबंधन: बदलते वर्षा पैटर्न को देखते हुए जल संचयन, सिंचाई दक्षता, स्थानीय फसल विविधता और मौसम आधारित कृषि सलाह को मजबूत किया जाए।
7. स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना: हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव को नीतियों में स्थान दिया जाए। आपदा के समय सबसे पहले जोखिम स्थानीय आबादी उठाती है, इसलिए उनकी भागीदारी अनिवार्य होनी चाहिए।
सवाल भविष्य का नहीं, वर्तमान का है
हिमालय की बर्फ किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं पिघलती। जंगल किसी चुनावी घोषणा से सुरक्षित नहीं होते। अल नीनो किसी सरकार की आलोचना या समर्थन नहीं करता। प्रकृति अपने नियमों के अनुसार प्रतिक्रिया देती है और मनुष्य की गतिविधियाँ उन नियमों के बीच संतुलन को प्रभावित करती हैं।
इस संकट को केवल पर्यावरण प्रेमियों की चिंता समझना सबसे बड़ी भूल होगी। यह पेयजल, खेती, ऊर्जा, सड़क, पर्यटन, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का भी प्रश्न है।
भारत की विकास यात्रा जरूरी है, लेकिन विकास का अर्थ प्राकृतिक संसाधनों को बिना सीमा खर्च करना नहीं हो सकता। आर्थिक प्रगति का मूल्यांकन केवल GDP, निवेश और निर्माण परियोजनाओं से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि हमने आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना सुरक्षित जल, स्वच्छ हवा, उपजाऊ मिट्टी और प्राकृतिक संतुलन छोड़ा है।
यदि आज ग्लेशियरों की चेतावनी को केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों तक सीमित रखा गया, जंगलों के नुकसान को आंकड़ों की बहस बना दिया गया और पर्यावरणीय कीमत को विकास की अनिवार्य लागत मान लिया गया, तो भविष्य में इसकी कीमत कहीं अधिक चुकानी पड़ सकती है।
जलवायु परिवर्तन पर बहस अब यह नहीं होनी चाहिए कि यह सच है या प्रचार। वैज्ञानिक प्रमाण इस सवाल का जवाब दे चुके हैं। असली बहस यह होनी चाहिए कि हम इस वास्तविकता के अनुरूप अपनी अर्थव्यवस्था, राजनीति और विकास की प्राथमिकताओं को कब बदलेंगे।
अर्थशास्त्री निकोलस स्टर्न के विचार का सार यही है कि जलवायु परिवर्तन बाजार की ऐसी विफलता है जिसकी कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ सकती है। इसलिए प्रकृति की रक्षा आर्थिक विकास के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक अस्तित्व की शर्त है।
लेखक के बारे में
Ankit Awasthi
श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें →
संबंधित लेख

एक कानून, सभी नागरिक: UCC लागू होने पर बदलेंगे शादी, तलाक और संपत्ति से जुड़े नियम

पत्रकार से बने हजारों करोड़ के कारोबारी, आरके सिन्हा के निधन से शोक की लहर

भारत: धर्म, कारोबार और आर्थिक सुधारों के बीच फंसा उद्यमी

लखनऊ में MLC चुनाव की मतगणना शुरू, 29 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला आज
टॉप रीड्स

खादी कारीगरों की समस्याओं के समाधान के लिए केंद्र सरकार ने उठाए कदम: जीतन राम मांझी

बेमौसम बारिश से किसानों की फसल बर्बाद, सांसद रमाशंकर राजभर ने मांगा मुआवजा

यूपी में तीसरी बार सरकार बनाओ, UCC लागू करेंगे… अमित शाह ने 2027 के लिए भरी हुंकार, 312 सीटों का लक्ष्य

मिशन शक्ति 6.0 के तहत महिलाओं को मिला सुरक्षा का संदेश

लखनऊ में बनेगा देश का सबसे बड़ा एंटरटेनमेंट पार्क, 2,000 करोड़ रुपये होंगे खर्च

पत्रकार से बने हजारों करोड़ के कारोबारी, आरके सिन्हा के निधन से शोक की लहर

भारत: धर्म, कारोबार और आर्थिक सुधारों के बीच फंसा उद्यमी




Leave a Comment
Don't worry! Your email address will not be published. Required fields are marked (*).