
कपास पर सियासत
विजय की राजनीति अभी अपने शुरुआती दौर में है, लेकिन एक नीतिगत मांग ने उन्हें अचानक राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। विदेशी कपास पर 11% आयात शुल्क हटाने की मांग को लेकर उद्योग, किसान और सरकार — तीनों के हित आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि यह मामला केवल तमिलनाडु की टेक्सटाइल इंडस्ट्री का नहीं, बल्कि देश की कृषि अर्थव्यवस्था और औद्योगिक संतुलन का सवाल बन गया है।
तमिलनाडु देश के सबसे बड़े टेक्सटाइल हब में गिना जाता है। वहां लाखों लोग सूत, कपड़ा और गारमेंट उद्योग से जुड़े हैं। उद्योग जगत का कहना है कि कपास महंगा होने से उत्पादन लागत बढ़ रही है, जिसका असर रोजगार और निर्यात दोनों पर पड़ सकता है। इसी चिंता के बीच मुख्यमंत्री विजय ने केंद्र सरकार से आयात शुल्क हटाने की मांग की है, ताकि विदेशी कपास सस्ती दरों पर उपलब्ध हो सके।
लेकिन दूसरी तरफ कपास उत्पादक राज्यों — खासकर विदर्भ, तेलंगाना और कर्नाटक — के किसान संगठनों ने इस मांग पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि अगर विदेशी कपास बिना शुल्क के आने लगा, तो घरेलू बाजार में भारतीय किसानों की फसल और सस्ती हो जाएगी। पहले ही कई किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम मिलने की शिकायत कर रहे हैं।
यहीं से बहस केवल “महंगा कपास” बनाम “सस्ता आयात” तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सवाल उठने लगता है कि भारत को अपने कृषि हितों और औद्योगिक जरूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए।
कपास का यह विवाद दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था की पुरानी दुविधा को सामने लाता है। उद्योग चाहता है कि कच्चा माल सस्ता मिले ताकि उत्पादन प्रतिस्पर्धी बना रहे, जबकि किसान चाहता है कि उसकी उपज का लाभकारी मूल्य सुरक्षित रहे। दोनों ही पक्ष अपने-अपने स्तर पर गलत नहीं दिखते।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयात पर पूरी तरह निर्भरता बढ़ती है, तो भविष्य में घरेलू उत्पादन कमजोर पड़ सकता है। वहीं उद्योग जगत का कहना है कि यदि लागत लगातार बढ़ती रही, तो भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर वैश्विक बाजार में पिछड़ सकता है।
इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प पहलू विजय की सार्वजनिक छवि भी बन गई है। फिल्मों में सामाजिक मुद्दों और कॉर्पोरेट विरोधी किरदारों के कारण उनसे एक अलग तरह की राजनीति की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्हें अब उन फैसलों का सामना करना पड़ रहा है, जहां हर निर्णय किसी न किसी वर्ग को प्रभावित करता है।
असल चुनौती यही है कि राजनीति पर्दे के संवादों से नहीं, बल्कि विरोधी हितों के बीच संतुलन बनाने से चलती है।
संभव है कि इस मुद्दे का समाधान आयात शुल्क पूरी तरह हटाने या पूरी तरह बनाए रखने के बजाय किसी मध्य रास्ते में हो — जैसे सीमित अवधि की राहत, किसानों के लिए बेहतर MSP व्यवस्था, या टेक्सटाइल सेक्टर को अलग आर्थिक सहायता।
फिलहाल यह बहस एक बात जरूर दिखाती है कि भारत में कृषि और उद्योग अब अलग-अलग दुनिया नहीं रहे। एक फैसले का असर खेत से लेकर फैक्ट्री और बाजार तक दिखाई देता है। और शायद यही किसी भी नई राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा होती है।
Ankit Awasthi





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