
केंद्र सरकार (2024–अब तक) की प्रगति पर रिपोर्ट
2024 में तीसरी बार सत्ता में आई केंद्र सरकार के कामकाज को समझने के लिए उसे केवल एक साल के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि पिछले दो कार्यकालों (2014–19, 2019–24) के साथ जोड़कर देखना जरूरी है। यही समग्र नजरिया बताता है कि नीतियाँ कहाँ तक पहुंचीं, किन क्षेत्रों में निरंतरता रही और कहाँ सुधार की जरूरत बाकी है। यह लेख उसी दृष्टि से एक संतुलित “ऑडिट” की तरह तस्वीर पेश करता है—दावे और जमीन, दोनों को साथ रखकर।
1. आर्थिक प्रदर्शन: स्थिरता बनाम असमानता
तीसरे कार्यकाल के शुरुआती चरण में भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक अस्थिरता के बीच अपेक्षाकृत मजबूत दिखी है। जीडीपी वृद्धि दर 6–7% के आसपास बनी रही, जो कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर है। इंफ्रास्ट्रक्चर—हाईवे, रेल, एयरपोर्ट—पर निवेश लगातार बढ़ा है और “कैपेक्स-ड्रिवन ग्रोथ” मॉडल जारी है।
लेकिन ऑडिट का दूसरा पहलू यह भी है कि रोजगार सृजन की गति इस विकास के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही। शहरी बेरोजगारी और युवाओं में नौकरी की असुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती है। आय असमानता भी बढ़ी है—जहां शीर्ष वर्ग की आय तेजी से बढ़ी, वहीं निचले तबके की क्रय शक्ति पर दबाव बना रहा।
निष्कर्ष: विकास मजबूत है, लेकिन समावेशिता (inclusive growth) अभी अधूरी है।
2. कल्याणकारी योजनाएँ: व्यापक पहुंच, लेकिन गुणवत्ता का सवाल
पिछले दो कार्यकालों की तरह तीसरे कार्यकाल में भी सरकार ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), मुफ्त राशन, उज्ज्वला, आयुष्मान जैसी योजनाओं की निरंतरता बनाए रखी है। इन योजनाओं ने गरीब तबके को एक सुरक्षा कवच दिया है।
हालांकि, कई जगहों पर “लाभ की गुणवत्ता” और “स्थायी समाधान” पर सवाल उठते हैं—जैसे मुफ्त राशन जरूरी है, लेकिन रोजगार और आय बढ़ाने के स्थायी उपाय उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाए।
निष्कर्ष: कवरेज बड़ा है, लेकिन दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता पर और जोर चाहिए।
3. इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी: सबसे मजबूत क्षेत्र
तीनों कार्यकालों में अगर किसी क्षेत्र ने लगातार प्रगति दिखाई है, तो वह है इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल इंडिया।
एक्सप्रेसवे, रेलवे आधुनिकीकरण, सेमी-हाई स्पीड ट्रेन
डिजिटल पेमेंट्स में भारत की वैश्विक पहचान
5G रोलआउट और स्टार्टअप इकोसिस्टम
यह क्षेत्र सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा सकता है, क्योंकि इसका असर अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों पर पड़ता है।
निष्कर्ष: यह सरकार का सबसे “हाई-इम्पैक्ट” और निरंतर सफल सेक्टर रहा है।
4. सामाजिक क्षेत्र: शिक्षा और स्वास्थ्य में मिश्रित तस्वीर
स्वास्थ्य के क्षेत्र में आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने इलाज की पहुंच बढ़ाई है, लेकिन सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता और डॉक्टरों की कमी अब भी चिंता का विषय है।
शिक्षा में नई शिक्षा नीति (NEP) लागू की गई, लेकिन उसके प्रभाव को जमीन पर पूरी तरह दिखने में समय लगेगा। सरकारी स्कूलों और उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता में सुधार असमान है।
निष्कर्ष: नीतियाँ सही दिशा में हैं, लेकिन क्रियान्वयन (implementation) में अंतर दिखता है।
5. लोकतांत्रिक संस्थाएँ और प्रशासन
तीनों कार्यकालों में सरकार ने “मजबूत नेतृत्व” की छवि बनाए रखी है। निर्णय तेजी से लिए गए हैं और बड़े स्तर पर लागू किए गए हैं।
लेकिन आलोचना का पक्ष यह कहता है कि
संस्थाओं की स्वतंत्रता
विपक्ष के साथ संवाद
एजेंसियों के उपयोग
इन पर सवाल उठे हैं।
निष्कर्ष: निर्णय क्षमता मजबूत, लेकिन संस्थागत संतुलन पर बहस जारी।
6. तीनों कार्यकालों की तुलना: कौन सा सबसे जनहितकारी?
2014–19 (पहला कार्यकाल):
बुनियादी सुधार, योजनाओं की शुरुआत, सिस्टम सेटअप
👉 नींव मजबूत करने वाला दौर2019–24 (दूसरा कार्यकाल):
बड़े फैसले (जैसे संरचनात्मक बदलाव), संकट प्रबंधन (कोविड)
👉 निर्णायक और जोखिम लेने वाला दौर2024–अब (तीसरा कार्यकाल):
निरंतरता + इंफ्रास्ट्रक्चर + वैश्विक छवि
👉 स्थिरता और विस्तार का दौर
जनहित के दृष्टिकोण से दूसरा कार्यकाल (2019–24) सबसे प्रभावशाली रहा—क्योंकि उसमें संकट प्रबंधन और बड़े फैसले दोनों शामिल थे।
लेकिन स्थिर विकास और लंबी अवधि के प्रभाव के लिए तीसरा कार्यकाल निर्णायक साबित हो सकता है—अगर यह समावेशी विकास पर फोकस करे।
7. आगे सरकार क्या कर सकती है?
अगर सरकार इस कार्यकाल को वास्तव में “जनहितकारी” बनाना चाहती है, तो उसे कुछ बड़े कदम उठाने होंगे:
🔹 रोजगार पर सीधा फोकस
मैन्युफैक्चरिंग और MSME सेक्टर को मजबूत करना
स्किल डेवलपमेंट को जमीन से जोड़ना
🔹 स्वास्थ्य और शिक्षा में गुणवत्ता सुधार
सरकारी अस्पतालों और स्कूलों को अपग्रेड करना
निजी-सरकारी अंतर को कम करना
🔹 कृषि और ग्रामीण आय
सिर्फ सब्सिडी नहीं, बल्कि वैल्यू एडिशन और मार्केट एक्सेस
टेक्नोलॉजी आधारित खेती
🔹 शहरी जीवन की गुणवत्ता
प्रदूषण, ट्रैफिक, पानी जैसी समस्याओं पर ठोस नीति
🔹 संस्थागत संतुलन
संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना
तीन कार्यकालों के बाद यह साफ है कि सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल सिस्टम और कल्याणकारी योजनाओं में मजबूत पकड़ बनाई है। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है—क्या यह विकास आम आदमी की जिंदगी में स्थायी सुधार ला पाता है या नहीं।
अगर तीसरा कार्यकाल रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन पर ठोस काम कर पाया, तो यह सबसे प्रभावशाली कार्यकाल बन सकता है।
लेकिन अगर फोकस केवल बड़े प्रोजेक्ट्स और छवि निर्माण तक सीमित रहा, तो यह अवसर अधूरा रह जाएगा।
आखिरकार, किसी भी सरकार का असली “ऑडिट” आंकड़ों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में आए बदलाव से तय होता है—और यही कसौटी आगे भी सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।
Ankit Awasthi





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