
पूर्वोत्तर की तरफ उदासीनता और आन्तरिक सुरक्षा
भारत का पूर्वोत्तर हमेशा से भौगोलिक दूरी का नहीं, बल्कि मानसिक दूरी का शिकार रहा है, और मणिपुर की हालिया हिंसा ने इस सच्चाई को एक बार फिर उजागर कर दिया है। इतिहास पर नजर डालें तो औपनिवेशिक दौर में इस क्षेत्र को “एक्सक्लूडेड एरिया” की तरह देखा गया, और दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी वह सोच पूरी तरह बदली नहीं। असम आंदोलन से लेकर नगालैंड, मणिपुर और बोडो क्षेत्रों के संघर्ष तक, पूर्वोत्तर लगातार पहचान, संसाधन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवालों से जूझता रहा है। लेकिन राष्ट्रीय विमर्श में इन मुद्दों की जगह हमेशा सीमित रही। यही वजह है कि जब मणिपुर में 2023 के बाद से सैकड़ों लोगों की जान जाती है, हजारों घर जलते हैं और करीब 60 हजार लोग विस्थापित होते हैं, तब भी यह संकट कुछ समय की सुर्खियों के बाद मुख्यधारा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लगभग गायब हो जाता है। यह सिर्फ मीडिया की चूक नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक प्राथमिकता का संकेत है, जहां दिल्ली-मुंबई की घटनाएं “राष्ट्रीय मुद्दा” बन जाती हैं, जबकि पूर्वोत्तर की त्रासदी धीरे-धीरे सामान्य बना दी जाती है।
मणिपुर की हिंसा को अगर सतही नजर से देखा जाए तो यह जातीय संघर्ष भर लगता है, लेकिन असल में यह प्रशासनिक विफलता, सामाजिक अविश्वास और लंबे समय से जमा असंतोष का विस्फोट है। यही पैटर्न हमें असम में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में भी दिखता है, जहां अफवाह, पहचान और भीड़ का उन्माद मिलकर कानून को पीछे छोड़ देता है। यह केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि उस सामाजिक दूरी का परिणाम है, जो देश के भीतर ही कुछ समुदायों को “दूसरा” बना देती है। देहरादून जैसी जगहों पर पूर्वोत्तर के लोगों के साथ हुई हिंसा और नस्लीय टिप्पणियां इस बात का प्रमाण हैं कि यह दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक भी है।
स्थिति को और गंभीर बनाता है पूर्वोत्तर का रणनीतिक महत्व। यह क्षेत्र सिर्फ सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा की पहली दीवार भी है। चीन के साथ सीमा विवाद, म्यांमार की अस्थिरता और बांग्लादेश के साथ खुला संपर्क इसे बेहद संवेदनशील बनाते हैं। ऐसे में मणिपुर जैसे राज्यों में अस्थिरता का बने रहना केवल एक आंतरिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती है। इतिहास गवाह है कि बाहरी ताकतें हमेशा ऐसे क्षेत्रों में सक्रिय होती हैं, जहां पहले से असंतोष और विभाजन मौजूद हो। वे चिंगारी को आग में बदलने का मौका तलाशती हैं, और अगर अंदरूनी व्यवस्था कमजोर हो, तो यह खतरा और बढ़ जाता है।
नोएडा में मजदूरों की हालिया हिंसा और पूर्वोत्तर के जातीय संघर्ष भले ही अलग दिखते हों, लेकिन दोनों एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं—भारत की आंतरिक सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि समाज के भीतर भी तय होती है। जब राज्य समय पर संवाद स्थापित नहीं कर पाता, जब विकास असमान होता है और जब नागरिकों के बीच भरोसा कमजोर पड़ता है, तब कोई भी संकट तेजी से फैल सकता है। ऐसे में केवल सुरक्षा बलों की तैनाती समाधान नहीं हो सकती; जरूरत है विश्वास बहाली की, निरंतर राजनीतिक संवाद की और ऐसी नीतियों की जो लोगों को महसूस कराएं कि वे इस देश के “हाशिये” पर नहीं, बल्कि केंद्र में हैं।
विडंबना यह है कि जिस पूर्वोत्तर को अक्सर समस्या के रूप में देखा जाता है, वही भारत की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है—समृद्ध जनजातीय संस्कृति, अद्भुत जैव विविधता, अनोखा खान-पान और पर्यटन की अपार क्षमता। लेकिन जब तक उसे बराबरी का ध्यान और सम्मान नहीं मिलेगा, यह संभावना पूरी तरह सामने नहीं आ पाएगी। मणिपुर की आग हमें सिर्फ एक राज्य की विफलता नहीं दिखा रही, बल्कि यह पूरे देश के दृष्टिकोण पर सवाल खड़ा कर रही है। अगर हम अब भी नहीं समझे, तो यह चुप्पी आगे चलकर और गहरे संकटों को जन्म दे सकती है। पूर्वोत्तर को केवल संकट के समय याद करना बंद करना होगा—क्योंकि देश का कोई भी कोना अगर लगातार अनसुना रह जाए, तो वह अंततः पूरे देश की कमजोरी बन जाता है।
Ankit Awasthi





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