
भारतीय एथलेटिक्स को मिला नया सितारा - गुरविंदर सिंह
भारतीय एथलेटिक्स लंबे समय से जिस पल का इंतजार कर रहा था, वह आखिरकार Gurindervir Singh ने रांची में ला दिया।
फेडरेशन कप एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गुरिंदरवीर सिंह ने पुरुषों की 100 मीटर दौड़ सिर्फ 10.09 सेकेंड में पूरी कर नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना दिया। इसके साथ ही वह 100 मीटर स्पर्धा में 10.10 सेकेंड से कम समय निकालने वाले पहले भारतीय पुरुष धावक बन गए।
यह सिर्फ एक टाइमिंग नहीं थी।
यह उस सोच पर चोट थी जो दशकों से भारतीय एथलेटिक्स के ऊपर मंडराती रही—
“भारतीय स्प्रिंटर्स दुनिया के सबसे तेज धावकों की बराबरी नहीं कर सकते।”
रांची के Birsa Munda Athletics Stadium में हुए फाइनल में 24 वर्षीय गुरिंदरवीर ने जिस आत्मविश्वास से दौड़ लगाई, उसने भारतीय ट्रैक एंड फील्ड को नया उत्साह दे दिया। दिलचस्प बात यह रही कि रिकॉर्ड टूटने का सिलसिला पूरे दिन चलता रहा। पहले सेमीफाइनल में गुरिंदरवीर ने रिकॉर्ड तोड़ा, फिर Animesh Kujur ने उससे बेहतर समय निकाल दिया। लेकिन फाइनल में गुरिंदरवीर ने सबको पीछे छोड़ते हुए इतिहास अपने नाम कर लिया।
इतिहास बनने के बाद उनका बयान भी उतना ही महत्वपूर्ण था जितनी उनकी दौड़।
उन्होंने कहा कि उन्हें अक्सर बताया जाता था कि भारतीयों की बॉडी टाइप 100 मीटर दौड़ के लिए नहीं बनी। लेकिन वह इस सोच को गलत साबित करना चाहते थे।
यह बयान सिर्फ खेल का नहीं, मानसिकता का बयान था।
लेकिन सवाल सिर्फ एक रिकॉर्ड का नहीं है
भारत जैसे देश में जहां 140 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं, वहां विश्व स्तरीय एथलीटों की संख्या अब भी बेहद सीमित क्यों है?
क्यों हर बड़ी उपलब्धि “चमत्कार” लगती है?
क्यों आज भी अधिकांश खेल क्रिकेट की छाया में दबे रहते हैं?
यह सवाल गुरिंदरवीर सिंह की उपलब्धि से कहीं बड़ा है।
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है।
कमी है व्यवस्था, संसाधन और खेल संस्कृति की।
देश के हजारों छोटे शहरों और गांवों में ऐसे युवा मिल जाएंगे जिनकी स्पीड, स्टैमिना या शारीरिक क्षमता असाधारण होती है। लेकिन उनमें से अधिकतर कभी ट्रैक तक पहुंच ही नहीं पाते।
क्योंकि खेल यहां अब भी “करियर” नहीं, “जोखिम” माना जाता है।
विश्व स्तरीय खिलाड़ी बनाने के लिए सिर्फ जज्बा काफी नहीं
दुनिया के बड़े खेल राष्ट्र सिर्फ प्रतिभा के भरोसे नहीं चलते।
वे खेल विज्ञान, पोषण, मानसिक प्रशिक्षण, रिकवरी सिस्टम और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों खर्च करते हैं।
भारत में आज भी बहुत से खिलाड़ी—
खराब ट्रैकों पर अभ्यास करते हैं,
सीमित डाइट पर खेलते हैं,
और आर्थिक असुरक्षा के बीच अपने सपनों को बचाने की कोशिश करते हैं।
यही कारण है कि जो खिलाड़ी विश्व स्तर तक पहुंच भी जाते हैं, उन्हें अक्सर विदेशों में जाकर ट्रेनिंग करनी पड़ती है।
भारत के ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट Abhinav Bindra खुद कह चुके हैं कि उनके समय में भारत में ट्रेनिंग “Plan B” हुआ करती थी और बेहतर सुविधाओं के लिए उन्हें लंबे समय तक जर्मनी में ट्रेनिंग करनी पड़ी। (The Times of India)
यह सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं थी।
यह भारतीय खेल व्यवस्था की वास्तविकता थी।
कई एथलीट अपने खर्च पर विदेश जाकर ट्रेनिंग लेते हैं।
कई परिवार जमीन बेचते हैं।
कई खिलाड़ी नौकरी और अभ्यास के बीच संतुलन बनाते-बनाते टूट जाते हैं।
और जो सफल हो जाते हैं, वही खबर बनते हैं।
बाकी हजारों संघर्ष आंकड़ों में भी दर्ज नहीं होते।
क्रिकेट बनाम खेल संस्कृति
भारत में समस्या क्रिकेट से प्यार नहीं है।
समस्या यह है कि बाकी खेलों के लिए समान सम्मान और संरचना नहीं बन पाई।
जब तक कोई खिलाड़ी ओलंपिक मेडल न जीत ले, तब तक उसे पहचान नहीं मिलती।
कई बार खिलाड़ी विश्वस्तरीय प्रदर्शन करने के बाद भी आर्थिक संघर्ष में जीते रहते हैं।
हमारे यहां खेल को अक्सर “रिजल्ट” से मापा जाता है, प्रक्रिया से नहीं।
अगर मेडल आया तो खिलाड़ी “राष्ट्रीय गौरव” बन जाता है।
अगर नहीं आया तो उसे भुला दिया जाता है।
यह दृष्टिकोण बदलना होगा।
खेल सिर्फ व्यापार नहीं होना चाहिए
आज खेलों में पैसा बढ़ा है, लीग बढ़ी हैं, ब्रांडिंग बढ़ी है।
यह जरूरी भी है।
लेकिन अगर खेल सिर्फ विज्ञापन, टीआरपी और बाजार का माध्यम बनकर रह गया तो खेल भावना कमजोर पड़ जाएगी।
एक देश की असली खेल संस्कृति तब बनती है जब बच्चे मेडल के लिए नहीं, खेल के आनंद के लिए मैदान में उतरते हैं।
जब हारने वाले खिलाड़ी का भी सम्मान हो।
जब स्कूलों में खेल पीरियड सिर्फ औपचारिकता न हो।
जब छोटे शहरों के खिलाड़ियों को भी बड़े सपने देखने का अधिकार मिले।
गुरिंदरवीर की दौड़ एक संकेत है
Gurindervir Singh और Animesh Kujur की उपलब्धि सिर्फ रिकॉर्ड बुक की खबर नहीं है।
यह संकेत है कि अगर सही वातावरण मिले तो भारतीय एथलेटिक्स भी दुनिया की रफ्तार पकड़ सकता है।
उसी दिन Vishal Thennarasu Kayalvizhi ने 400 मीटर में 45 सेकेंड की दीवार तोड़ी। यह बताता है कि बदलाव की संभावनाएं मौजूद हैं।
अब जरूरत सिर्फ खिलाड़ियों की नहीं, पूरे खेल पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने की है।
क्योंकि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं होते।
वे समाज का आत्मविश्वास बनाते हैं।
और शायद भारत को अब यही सीखना होगा—
खिलाड़ियों को “इवेंट” की तरह नहीं,
“राष्ट्रीय निवेश” की तरह देखना।
Ankit Awasthi





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