एक हमले से बदली दुनिया और तीन युद्धों के बीच फंसी वैश्विक व्यवस्था

7 अक्टूबर के तीन साल बाद: एक हमले से बदली दुनिया और तीन युद्धों के बीच फंसी वैश्विक व्यवस्था
तीन साल पहले 7 अक्टूबर की सुबह इजरायल के दक्षिणी हिस्से में शुरू हुई हिंसा शायद उस समय किसी को यह अंदाजा नहीं दे रही थी कि उसका असर केवल इजरायल और गाजा की सीमा तक सीमित नहीं रहेगा। हमास के हमले में करीब 1,200 लोग मारे गए और 251 लोगों को बंधक बनाया गया। इसके बाद शुरू हुए इजरायली सैन्य अभियान ने गाजा को बड़े पैमाने पर तबाही, विस्थापन और मानवीय संकट में बदल दिया। तीन साल बाद भी इस संघर्ष की राजनीतिक और मानवीय कीमत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
7 अक्टूबर 2026 की तीसरी बरसी पर इजरायल में लोग मृतकों को याद कर रहे हैं और गाजा में विस्थापित परिवार उस जिंदगी को याद कर रहे हैं जो युद्ध से पहले थी। यही इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना है—एक ही तारीख दो समाजों के लिए दो अलग-अलग स्मृतियां लेकर आती है: इजरायल के लिए हमले, हत्याओं और बंधकों की स्मृति; फिलिस्तीनियों के लिए उसके बाद शुरू हुई तबाही, विस्थापन और खोए हुए घरों की स्मृति।
लेकिन तीन साल बाद इस कहानी को केवल इजरायल और फिलिस्तीन के बीच की कहानी मानना मुश्किल है।
7 अक्टूबर ने मध्य-पूर्व के पुराने संघर्ष को एक ऐसे क्षेत्रीय संकट में बदल दिया, जिसकी लहरें तेल, समुद्री व्यापार, कूटनीति, हथियारों और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच गईं।
और आज दुनिया केवल इस युद्ध को नहीं देख रही। यूक्रेन में रूस का युद्ध जारी है और अमेरिका तथा ईरान के बीच संघर्ष ने ऊर्जा और समुद्री व्यापार को एक अलग संकट में डाल दिया है।
दुनिया के नक्शे पर तीन अलग-अलग जगहों पर चल रहे ये संघर्ष वास्तव में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
गाजा से शुरू हुई आग कितनी दूर तक पहुंची?
2023 में हमास के हमले के बाद इजरायल का जवाब मुख्यतः गाजा पर केंद्रित था। लेकिन समय के साथ संघर्ष का दायरा बढ़ता गया। लेबनान, सीरिया, यमन और ईरान से जुड़े मोर्चे इस व्यापक पश्चिम एशियाई तनाव का हिस्सा बनने लगे।
गाजा में 2025 के संघर्षविराम के बावजूद हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। Reuters के अनुसार इजरायल अब भी गाजा के लगभग दो-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण रखता है और हाल के दिनों में भी इजरायली हमलों की खबरें आई हैं। गाजा में युद्ध से हुई मौतों का आंकड़ा 74,000 से ऊपर बताया गया है, जबकि बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हैं।
इसका मतलब यह है कि युद्ध का सबसे बड़ा असर सिर्फ उस दिन नहीं होता जब बम गिरते हैं।
असर उसके बाद शुरू होता है।
घर नहीं रहता तो परिवार विस्थापित होता है। स्कूल बंद होता है तो बच्चों की एक पीढ़ी प्रभावित होती है। अस्पताल नष्ट होते हैं तो स्वास्थ्य व्यवस्था वर्षों पीछे चली जाती है। व्यापार बंद होता है तो रोजगार खत्म होता है। और जब लाखों लोग लंबे समय तक विस्थापित रहते हैं तो संकट केवल मानवीय नहीं, राजनीतिक भी बन जाता है।
यही कारण है कि 7 अक्टूबर की बरसी आज केवल अतीत की याद नहीं है। यह इस सवाल की भी याद है कि युद्ध खत्म होने के बाद शांति वास्तव में कैसी दिखेगी?
लेकिन असली वैश्विक झटका तेल और समुद्र से आया
मध्य-पूर्व के इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील बिंदु है ऊर्जा।
दुनिया का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आने वाले तेल पर निर्भर है। इसलिए जब ईरान-अमेरिका युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ा तो बाजार ने तुरंत प्रतिक्रिया दी।
7 अक्टूबर तक स्थिति इतनी तनावपूर्ण है कि समुद्री सुरक्षा से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार 28 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच होर्मुज़ के आसपास तेल, LNG और LPG टैंकरों पर कम-से-कम 12 हमले, हमले की कोशिशें या गंभीर घटनाएं दर्ज की गईं—ईरान युद्ध शुरू होने के बाद किसी एक सप्ताह में यह सबसे ज्यादा संख्या बताई गई है। भारत ने भी बताया है कि एक तेल टैंकर पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल लगने से 12 चालक दल सदस्य घायल हुए, जिनमें भारतीय नागरिक शामिल थे।
यह खबर भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
क्योंकि होर्मुज़ में तनाव का मतलब केवल किसी दूसरे देश की समुद्री सुरक्षा नहीं है।
इसका मतलब है—
तेल महंगा हो सकता है।
तेल महंगा हुआ तो परिवहन महंगा होगा।
परिवहन महंगा हुआ तो सामान महंगा होगा।
महंगाई बढ़ी तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों पर सख्ती कर सकता है।
और अंततः इसका असर EMI से लेकर रसोई के बजट तक पहुंच सकता है।
यानी मध्य-पूर्व में चलने वाला युद्ध भारत में बैठे उस परिवार की आर्थिक समस्या बन सकता है जिसने युद्ध की कोई शुरुआत नहीं की।
अमेरिका-ईरान युद्ध: बातचीत की खिड़की या एक और लंबा संघर्ष?
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध अब केवल मिसाइलों और परमाणु कार्यक्रम का संघर्ष नहीं रह गया है। इसका सबसे संवेदनशील मोर्चा होर्मुज़ है।
ईरान की ओर से 7 अक्टूबर को यह संकेत आया कि वह उन समुद्री रास्तों को बंद कर सकता है जिन्हें वह अवैध मानता है। दूसरी ओर अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जलडमरूमध्य पर ईरान का नियंत्रण पहले जैसा नहीं रहा और तेल का प्रवाह युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंच चुका है।
यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।
एक तरफ युद्ध चल रहा है।
दूसरी तरफ कूटनीति के संकेत भी समय-समय पर दिखाई देते हैं।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने ईरान से उसके यूरेनियम संवर्धन की क्षमता में 'meaningful' कमी की मांग की है। यानी वाशिंगटन की मांग अब भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर केंद्रित है, लेकिन बातचीत की संभावना पूरी तरह बंद नहीं हुई है।
समस्या यह है कि दोनों पक्षों की न्यूनतम स्वीकार्य शर्तों के बीच दूरी अभी भी बड़ी है।
इसलिए फिलहाल सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि यह युद्ध तत्काल निर्णायक अंत की तरफ बढ़ता हुआ दिखाई नहीं देता; बल्कि सैन्य दबाव और बातचीत की कोशिश दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
और जितना लंबा यह संघर्ष चलेगा, उतना ही बड़ा जोखिम तेल और समुद्री व्यापार के लिए होगा।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन ने भी ईरान युद्ध के कारण वैश्विक तेल भंडार पर दबाव को देखते हुए अपने तेल मूल्य अनुमानों में बढ़ोतरी की है।
रूस-यूक्रेन: पांचवां नहीं, चौथा साल और युद्ध अभी भी जिंदा
उधर यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को एक अलग तरह का सबक दिया है।
यह ऐसा युद्ध बन चुका है जिसमें किसी एक निर्णायक लड़ाई से परिणाम तय नहीं हो रहा। ड्रोन, मिसाइल, लंबी दूरी के हमले, ऊर्जा और औद्योगिक बुनियादी ढांचे पर प्रहार तथा जमीन पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने की कोशिश—युद्ध की यही तस्वीर बनी हुई है।
7 अक्टूबर को रूस ने यूक्रेन पर मिसाइलों और ड्रोन की बड़ी लहर से हमला किया। यूक्रेनी अधिकारियों के अनुसार कम-से-कम 15 लोगों की मौत हुई और रिहायशी तथा औद्योगिक ढांचे को नुकसान पहुंचा। राजधानी कीव सहित कई इलाकों में हमले हुए।
यह घटना बताती है कि युद्ध किसी निर्णायक राजनीतिक समझौते की तरफ बढ़ने के बजाय अभी भी सैन्य दबाव के दौर में है।
हाल के महीनों में पूर्वी यूक्रेन, खासकर डोनेत्स्क क्षेत्र में लड़ाई पर ध्यान रहा है। Reuters के अनुसार रूस की सैन्य बढ़त और यूक्रेन की रक्षा दोनों के बीच आने वाले महीनों में भी भारी लड़ाई की आशंका बनी हुई है।
लेकिन यूक्रेन युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता अब उसकी लंबाई है।
तीन साल से ज्यादा समय बाद भी दोनों पक्ष सैन्य क्षमता, क्षेत्रीय नियंत्रण और राजनीतिक शर्तों को लेकर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं दिखाई देते।
इसका अर्थ यह है कि शांति वार्ता का सवाल केवल 'युद्ध बंद करें या नहीं' का सवाल नहीं रह गया।
सवाल है—
किस सीमा पर युद्ध रुकेगा?
कौन-सा इलाका किसके नियंत्रण में रहेगा?
सुरक्षा गारंटी कौन देगा?
यूक्रेन की भविष्य की सैन्य स्थिति क्या होगी?
रूस की सुरक्षा संबंधी मांगों का क्या होगा?
और यूरोप अपनी सुरक्षा व्यवस्था को किस तरह बदलेगा?
इन प्रश्नों का उत्तर न मिलने तक युद्ध के खत्म होने की घोषणा करना कठिन है।
तीन युद्ध, तीन अलग-अलग असर
अगर इन तीनों संघर्षों को एक साथ देखा जाए तो इनके प्रभाव भी अलग हैं।
गाजा का युद्ध दुनिया के सामने मानवीय संकट और मध्य-पूर्व की राजनीतिक व्यवस्था का सवाल रखता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, NATO-रूस संबंधों और वैश्विक हथियार राजनीति को प्रभावित करता है।
अमेरिका-ईरान युद्ध ऊर्जा, समुद्री व्यापार और वैश्विक महंगाई को सीधे प्रभावित कर रहा है।
लेकिन तीनों में एक चीज समान है—
इनकी कीमत केवल युद्ध लड़ने वाले देश नहीं चुका रहे।
यूरोप ऊर्जा और रक्षा खर्च के दबाव से गुजरता है।
एशिया तेल और समुद्री व्यापार की चिंता करता है।
भारत ऊर्जा आयात और विदेशों में रहने वाले अपने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता है।
अफ्रीका और गरीब देश खाद्य और ऊर्जा कीमतों के झटकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
और दुनिया भर में सरकारों के बजट में रक्षा पर खर्च बढ़ने का मतलब अक्सर सामाजिक और विकासात्मक खर्च के लिए कम गुंजाइश भी हो सकता है।
भारत के लिए इसका अर्थ क्या है?
भारत की स्थिति दिलचस्प है।
एक तरफ भारत रूस के साथ पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखना चाहता है।
दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिम के साथ भारत की रणनीतिक तथा आर्थिक साझेदारी भी तेजी से महत्वपूर्ण हुई है।
मध्य-पूर्व में भारत की अपनी बड़ी ऊर्जा जरूरतें हैं और खाड़ी देशों में करोड़ों भारतीयों की आजीविका जुड़ी हुई है।
इसलिए भारत के लिए इन युद्धों में कोई सरल 'पक्ष' चुनना आसान नहीं है।
नई दिल्ली की वास्तविक चुनौती है—
तेल भी मिले, व्यापार मार्ग भी खुले रहें, भारतीय नागरिक सुरक्षित रहें, रूस के साथ संबंध भी चलते रहें और अमेरिका तथा यूरोप के साथ रणनीतिक संबंध भी प्रभावित न हों।
यही कारण है कि वैश्विक युद्धों का असर भारतीय विदेश नीति पर भी पड़ रहा है।
दुनिया आखिर किस दिशा में जा रही है?
इन तीनों युद्धों को देखकर एक निष्कर्ष निकालना आसान है कि दुनिया युद्धों से भर गई है। लेकिन तस्वीर इतनी सरल नहीं है।
कुछ जगह युद्ध के बीच बातचीत के रास्ते खुले हैं।
गाजा में संघर्षविराम के बावजूद राजनीतिक समाधान अधूरा है।
यूक्रेन में युद्ध के साथ-साथ कूटनीतिक प्रयास भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
अमेरिका-ईरान के बीच भी सैन्य टकराव के बावजूद परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज़ जैसे मुद्दों पर बातचीत की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
लेकिन फिलहाल किसी भी मोर्चे पर ऐसा निर्णायक समझौता दिखाई नहीं देता जो संघर्ष के मूल राजनीतिक प्रश्नों को स्थायी रूप से हल कर दे।
और यही आज की दुनिया की सबसे बड़ी चिंता है।
युद्ध अब केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाता।
वह समुद्र में जहाजों के रास्ते रोकता है।
वह तेल के दाम बदलता है।
वह ब्याज दरों को प्रभावित करता है।
वह रक्षा बजट बढ़ाता है।
वह चुनावों और सरकारों की राजनीति बदलता है।
वह प्रवास बढ़ाता है।
और अंत में वह उस नागरिक के घर तक पहुंचता है जिसने शायद कभी युद्ध का नक्शा भी ठीक से नहीं देखा।
तीन साल पहले की सुबह को केवल उस हमले की तारीख के रूप में याद करना पर्याप्त नहीं होगा।
यह तारीख अब उस पूरी श्रृंखला का प्रतीक बन चुकी है जिसमें आतंकवादी हमला, सैन्य जवाब, मानवीय तबाही, क्षेत्रीय संघर्ष, समुद्री असुरक्षा, तेल संकट और वैश्विक कूटनीतिक ध्रुवीकरण एक-दूसरे से जुड़ गए।
आज जब इजरायल में लोग मारे गए लोगों को याद कर रहे हैं और गाजा में लोग अपने उजड़े घरों को याद कर रहे हैं, उसी समय यूक्रेन में मिसाइलें गिर रही हैं और होर्मुज़ में टैंकरों पर हमले हो रहे हैं।
दुनिया एक साथ कई मोर्चों पर जल रही है।
लेकिन शायद इससे भी बड़ा संकट यह है कि युद्ध धीरे-धीरे सामान्य खबर बनता जा रहा है।
एक दिन मिसाइलों की खबर।
दूसरे दिन तेल की कीमत।
तीसरे दिन प्रतिबंध।
चौथे दिन कूटनीतिक बयान।
फिर अगला हमला।
और फिर बाजार खुल जाता है।
मानो दुनिया ने युद्ध के साथ जीना सीख लिया हो।
लेकिन किसी भी युद्ध का सबसे खतरनाक चरण वह नहीं होता जब पहली मिसाइल चलती है।
सबसे खतरनाक वह समय होता है जब समाज यह मानने लगे कि मिसाइलें चलना सामान्य है।
7 अक्टूबर की तीसरी बरसी शायद इसी बात को याद करने का दिन है—
युद्ध की शुरुआत एक तारीख से हो सकती है, लेकिन उसकी कीमत कई पीढ़ियां चुकाती हैं।
और आज रूस-यूक्रेन से लेकर अमेरिका-ईरान और गाजा तक दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सवाल केवल यह नहीं है कि अगली मिसाइल कहां गिरेगी।
सवाल यह है कि अगली शांति की मेज कहां लगेगी—और क्या दुनिया उसके लिए समय रहते तैयार है?
लेखक के बारे में
Ankit Awasthi
श्री अवस्थी स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं कंटेंट राइटर हैं। पिछले करीब छह वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय श्री अवस्थी ने न्यूज़ट्रैक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों के साथ कार्य किया है। समाचार एवं फीचर लेखन के अलावा डिजिटल कंटेंट, SEO और ऑनलाइन मीडिया प्रोडक्शन में भी उनका अनुभव रहा है। राजनीति विज्ञान में परास्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा MBA (IT) की शिक्षा प्राप्त श्री अवस्थी की विशेष रुचि समसामयिक राजनीति, सामाजिक बदलाव, शासन-व्यवस्था और जनसरोकारों से जुड़े विषयों पर तथ्यपरक एवं खोजपरक लेखन में है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों के माध्यम से किसी विषय की बारीक पड़ताल कर उसके विभिन्न पहलुओं को सामने लाना उनके लेखन की प्रमुख विशेषता है। श्री अवस्थी एक पुस्तक के लेखक भी हैं और लेखन के माध्यम से समकालीन सामाजिक एवं राजनीतिक प्रश्नों को समझने और उन पर विमर्श विकसित करने में सक्रिय हैं। पत्रकारिता के साथ डिजिटल मार्केटिंग, वेब कंटेंट और लीड जनरेशन के क्षेत्र में भी उन्होंने कार्य किया है। काम के अलावा उन्हें अध्ययन, संगीत और यात्रा में विशेष रुचि है। उनसे ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है। Ankit Awasthi की सभी खबरें देखें →
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