
शिकायत से समाधान तक—क्या IGRS को सिर्फ “क्लोजर मशीन” से आगे बढ़ने का समय आ गया है?
उत्तर प्रदेश का IGRS (जनसुनवाई) सिस्टम देश के सबसे बड़े और सबसे अधिक निगरानी वाले शिकायत निवारण प्लेटफॉर्म्स में गिना जाता है, जहां हर दिन हजारों शिकायतें दर्ज होती हैं और औसतन 20–25 दिनों के भीतर उनका निस्तारण दिखा दिया जाता है; आंकड़ों की यह चमक पहली नजर में एक सक्षम और तेज़ तंत्र की तस्वीर पेश करती है, लेकिन जब इन्हीं आंकड़ों को जमीनी अनुभव के साथ रखा जाता है तो एक असहज सवाल उभरता है—क्या वास्तव में समस्याएं हल हो रही हैं, या केवल फाइलों में “निस्तारित” दर्ज हो रही हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सबसे ज्यादा शिकायतें उन्हीं बुनियादी क्षेत्रों से आती हैं, जिनसे आम नागरिक रोज जूझता है—भूमि विवाद, पुलिस में सुनवाई, नगर सेवाओं की बदहाली, बिजली-पानी की दिक्कतें और सरकारी योजनाओं में गड़बड़ी; यानी IGRS केवल एक तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक संवेदनशीलता का आईना है।
समस्या की जड़ यही है कि मौजूदा सिस्टम में “स्पीड” और “क्लोजर” को प्राथमिकता दी गई है, जबकि “समाधान की गुणवत्ता” अक्सर पीछे छूट जाती है; जब अधिकारियों का मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि उन्होंने कितनी जल्दी शिकायतें बंद कीं, तो स्वाभाविक रूप से फोकस समस्या के मूल कारण को खत्म करने के बजाय उसे कागज़ पर निपटाने पर चला जाता है, और यही वह बिंदु है जहां IGRS को एक चेतावनी संकेत समझना चाहिए—क्योंकि अगर नागरिक को बार-बार एक ही समस्या के लिए शिकायत करनी पड़ रही है, तो यह सिस्टम की गति नहीं, उसकी कमजोरी का प्रमाण है। यही स्थिति धीरे-धीरे प्रशासन और नागरिक के बीच भरोसे को भी कमजोर करती है।
अन्य राज्यों के अनुभव इस संदर्भ में महत्वपूर्ण सीख देते हैं; मध्य प्रदेश का CM Helpline और आंध्र प्रदेश का Spandana जैसे सिस्टम यह दिखाते हैं कि शिकायत निवारण केवल “टाइम-बाउंड क्लोजर” से नहीं, बल्कि “फीडबैक-ड्रिवन अकाउंटेबिलिटी” से मजबूत होता है, जहां नागरिक की संतुष्टि को अंतिम कसौटी माना जाता है और यदि शिकायतकर्ता असंतुष्ट है तो मामला स्वतः दोबारा खुल सकता है; दक्षिण भारत के कई राज्यों में सेवा वितरण को समयबद्ध बनाने के साथ-साथ अधिकारियों की जवाबदेही इस तरह तय की गई है कि वे केवल प्रक्रिया पूरी न करें, बल्कि परिणाम भी सुनिश्चित करें; वहीं महाराष्ट्र जैसे राज्यों में डिजिटल सेवाओं के साथ ट्रैकिंग और पारदर्शिता पर अधिक जोर दिया गया है, जिससे नागरिक को हर चरण की जानकारी मिलती रहती है।
उत्तर प्रदेश के लिए अब समय है कि वह अपने विशाल और मजबूत ढांचे को “क्वालिटी-ड्रिवन सिस्टम” में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाए; इसके लिए सबसे पहले मूल्यांकन के पैमाने बदलने होंगे—अधिकारियों की रैंकिंग केवल क्लोजर की संख्या पर नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता की संतुष्टि और समस्या के स्थायी समाधान पर आधारित होनी चाहिए; दूसरा, एक मजबूत “री-ओपन मैकेनिज्म” विकसित करना होगा, जहां असंतुष्ट शिकायतें स्वतः उच्च स्तर पर चली जाएं; तीसरा, उन विभागों और क्षेत्रों की पहचान कर विशेष निगरानी की जाए जहां बार-बार एक ही तरह की शिकायतें आ रही हैं, ताकि समस्या को जड़ से खत्म किया जा सके; और चौथा, तकनीक का उपयोग केवल डेटा इकट्ठा करने के लिए नहीं, बल्कि पैटर्न समझने और नीतिगत सुधार के लिए किया जाए।
अंततः, IGRS की असली सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसने कितनी शिकायतें बंद कीं, बल्कि इस बात से कि उसने कितनी समस्याओं को वास्तव में खत्म किया; यह सिस्टम यदि सच में “जनसुनवाई” बनना चाहता है, तो उसे नागरिक की आवाज़ को आंकड़ों से ऊपर रखना होगा और प्रशासन को यह समझना होगा कि हर शिकायत एक फाइल नहीं, बल्कि एक वास्तविक समस्या है, जिसका समाधान ही असली लक्ष्य होना चाहिए; यदि उत्तर प्रदेश इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाता है और अन्य राज्यों के सफल मॉडलों से सीख लेकर अपने सिस्टम को संवेदनशील और जवाबदेह बनाता है, तो IGRS न केवल देश का सबसे बड़ा, बल्कि सबसे भरोसेमंद शिकायत निवारण तंत्र भी बन सकता है।
Ankit Awasthi





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