
कोर्ट की शरण मे जाने को मजबूर जीएसटी अधिकारी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य जीएसटी विभाग मे अटकाओ लटकाओ की परम्परा ऐसी हावी है कि जिन मामलो का निस्तारण विभाग स्तर से हो सकता है उनके लिए भी अधिकारियों को कोर्ट की शरण मे जाना पडता है। हालत ये है कि कोर्ट का आदेश आने के बाद उसके अनुपालन के लिए जितने मार्ग दर्शन लिए जाते हैं उतने मे तो हरि दर्शन हो जाते। विभाग मे चल रही इस कार्यप्रणाली का जिम्मेदार कौन है इसकी समीक्षा होने चाहिए।
हम बात कर रहे है विभाग के उन निलंबित अधिकारियों की जिनको आरोप पत्र दिए गए और उन्होंने उसका जवाब भी दे दिया, जिस पर अब विभाग को निर्णय करना है कि उनको दोष मुक्त किया जाए या फिर सजा दी जाए ऐसे कई मामले समीक्षा व मार्ग दर्शन के बीच पेन्डूलम बने हुए है। बात यहां भी समाप्त नही हो जाती जिन मामलो मे अधिकारी कोर्ट गए और उच्च न्यायालय ने निलंबन पर स्थगन आदेश दे दिया उनको भी कोर्ट के आदेश का पालन करवाने को लिए डबल बेंच या फिर अवमानना याचिका दायर करनी पडी। लखनऊ की एक महिला सहायक आयुक्त को मामले मे तो डबल बेंच को बहेस को दौरान बहाली के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कास्ट अवार्ड किए जाने की तल्ख टिप्पणी तक करनी पडी। वही बोगस फर्मों के मामले मे निलंबित अधिकारियों ने बताया की पंजीयन देते समय सभी औपचारिकता पूरी की गयी दस्तावेजों की जांच व भौतिक सत्यापन भी किया गया गया उस समय सब कुछ ठीक था बाद मे फर्म स्वामी ने फर्जी वाडा किया तो उसमे खंड अधिकारी कैसे दोषी हो सकता है। यह तो ठीक ऐसा ही हो गया कि कोई पिता अपने बच्चे को पढा लिखाकर अधिकारी बनाए और बाद मे उसी अधिकारी बेटे पर भ्रष्टाचार का आरोप लग जाए और इसके लिए दोषी पिता को मान लिया जा कि उसने भ्रष्टाचारी बेटे को जन्म ही कयो दिया।





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