लखनऊ | पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब भारत पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भारत को तेल, गैस और खाद्यान्न आपूर्ति से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल, वैश्विक शिपिंग मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। इसी मार्ग से भारत के करीब 40 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात भी होता है। भारत अपनी कुल जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में इस मार्ग के प्रभावित होने से ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों में तेजी आ सकती है। हाल के दिनों में घरेलू और व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कीमतों में बढ़ोतरी से आम लोगों पर महंगाई का असर दिखने लगा है। इसके साथ ही उर्वरक आपूर्ति पर भी संकट के संकेत मिल रहे हैं। पश्चिम एशिया वैश्विक उर्वरक उत्पादन का बड़ा केंद्र है और वैश्विक यूरिया निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। यदि आपूर्ति प्रभावित होती है तो खेती पर असर पड़ सकता है और खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आने की आशंका भी जताई जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत वृद्धि होने पर भारत की जीडीपी में लगभग 0.3 से 0.6 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इस स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने निर्यात से जुड़े मंत्रालयों और शिपिंग कंपनियों के साथ बैठक कर हालात पर नजर रखने के लिए कंट्रोल रूम और सहायता डेस्क स्थापित किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर ऊर्जा, उर्वरक और व्यापार पर पड़ सकता है, जिससे भारत के निर्यात और घरेलू बाजार दोनों प्रभावित हो सकते हैं। सरकार और उद्योग जगत अब इस संभावित संकट से निपटने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। अगर चाहें तो मैं इसके लिए और भी ज्यादा आकर्षक 5–6 अखबारी हेडलाइन विकल्प भी बना सकता हूँ।






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