
जेएनयू विवाद के 10 साल: कैंपस में असहमति पर निगरानी
नई दिल्ली। फरवरी 2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में हुए विवाद और राजद्रोह मामले के एक दशक बाद देश के विश्वविद्यालय परिसरों का माहौल बदला हुआ दिखाई देता है। शिक्षकों और छात्रों का कहना है कि कैंपस में असहमति की आवाज़ें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन अब वे पहले की तुलना में अधिक सतर्क और सीमित हो गई हैं।
9 फरवरी 2016 को संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु की फांसी के विरोध में आयोजित एक कार्यक्रम के बाद जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत कई छात्रों पर राजद्रोह के आरोप लगे थे। उस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी थी और विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रवाद का प्रश्न केंद्र में आ गया था।
इसके बाद देशभर के विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक सख्ती बढ़ने की बात कही जाती है। सार्वजनिक कार्यक्रमों, सेमिनारों और प्रदर्शनों को लेकर अनुमति प्रक्रिया कड़ी हुई और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों में वृद्धि देखी गई। 2017 में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में एक सेमिनार रद्द होने और झड़पों के बाद यह बहस और तेज़ हो गई थी।
दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस कार्रवाई ने भी राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। छात्रों और नागरिक समूहों ने बल प्रयोग के आरोप लगाए, जबकि पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की दलील दी।
शिक्षकों का कहना है कि बीते वर्षों में कुछ विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक नियुक्तियों और नीतिगत फैसलों को लेकर भी बहस हुई है। पाठ्यक्रम बदलाव, सेमिनार रद्द होने और छात्रों के निलंबन जैसे मामलों को अभिव्यक्ति की सीमाओं से जोड़कर देखा जा रहा है। हाल में डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली और जेएनयू में छात्रों के निलंबन की घटनाओं ने भी यह चर्चा तेज़ की है।
कई छात्र मानते हैं कि अब किसी भी विरोध या सार्वजनिक बयान से पहले संभावित अनुशासनात्मक कार्रवाई, सोशल मीडिया निगरानी और भविष्य के करियर पर असर जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है। शिक्षकों का कहना है कि विश्वविद्यालय परंपरागत रूप से बहस और मतभेद के मंच रहे हैं, लेकिन मौजूदा माहौल में अभिव्यक्ति अधिक नियंत्रित और सतर्क दिखाई देती है।
हाल के साहित्य महोत्सवों और अन्य आधिकारिक कार्यक्रमों में आमंत्रित वक्ताओं की सूची को लेकर भी परिसर में वैचारिक संतुलन पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं प्रशासन का पक्ष है कि विश्वविद्यालयों में अनुशासन, राष्ट्रीय एकता और संस्थागत गरिमा बनाए रखना आवश्यक है।
कुल मिलाकर, जेएनयू विवाद के दस वर्ष बाद भी विश्वविद्यालय परिसरों में अभिव्यक्ति, असहमति और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर बहस जारी





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