
गांव-गांव में ‘गज मित्र’: यूपी में इंसान–हाथी संघर्ष कम करने की नई उम्मीद
"मन की बात" में पीएम मोदी ने सराहा मॉडल
—तराई क्षेत्र में ‘गज मित्र’ बने ग्रामीण, बढ़ी सतर्कता और घटे टकराव के मामले
दीप चन्द त्रिपाठी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्रों में लंबे समय से इंसान और हाथियों के बीच टकराव एक गंभीर चुनौती रहा है। खासकर फसल के मौसम में जब जंगलों से निकलकर हाथियों के झुंड गांवों की ओर बढ़ते हैं, तब किसानों की आजीविका और जान-माल दोनों पर खतरा मंडराने लगता है। लेकिन अब इस समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर ही तैयार होता दिख रहा है—‘गज मित्र’ पहल के रूप में।
26 अप्रैल को प्रसारित कार्यक्रम "मन की बात" में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर में वन्यजीव संरक्षण के चार सफल उदाहरणों का उल्लेख किया, जिनमें उत्तर प्रदेश का ‘गज मित्र’ मॉडल प्रमुख रूप से शामिल रहा। यह पहल न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है, बल्कि ग्रामीणों के जीवन में भी भरोसा और सुरक्षा का भाव पैदा कर रही है।
क्या है ‘गज मित्र’ पहल?
‘गज मित्र’ दरअसल स्थानीय ग्रामीणों की एक टीम होती है, जिसे वन विभाग के सहयोग से प्रशिक्षित किया जाता है। ये लोग हाथियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं और जैसे ही झुंड गांव के पास आता है, तुरंत आसपास के लोगों को सतर्क कर देते हैं। मोबाइल, सायरन या पारंपरिक तरीकों से सूचना प्रसारित कर गांव वालों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी जाती है।
इस पहल की खास बात यह है कि इसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी सबसे अहम है। वे न केवल क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों को बेहतर समझते हैं, बल्कि हाथियों के व्यवहार से भी परिचित होते हैं। इससे समय रहते कार्रवाई संभव हो पाती है और टकराव की घटनाएं कम हो रही हैं।
तराई क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव
उत्तर प्रदेश के तराई इलाके, जैसे लखीमपुर खीरी, बहराइच और पीलीभीत, हाथियों के आवागमन के प्रमुख मार्ग हैं। पहले जहां अचानक हाथियों के गांव में घुस आने से अफरा-तफरी मच जाती थी, वहीं अब ‘गज मित्र’ टीमों की सक्रियता से स्थिति काफी हद तक नियंत्रित हुई है।
सामुदायिक भागीदारी का सफल मॉडल है गज मित्र योजना : अनुराधा वेमुरी
प्रदेश की प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अनुराधा वेमुरी ने इस पहल को “सामुदायिक भागीदारी का सफल मॉडल” बताया है। उनके अनुसार, “गज मित्र कार्यक्रम का उद्देश्य केवल टकराव को कम करना नहीं, बल्कि लोगों और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाना है। स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी से समय पर सूचना मिलती है, जिससे किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सकता है। आने वाले समय में इस मॉडल को और तकनीकी सहायता—जैसे ट्रैकिंग और अलर्ट सिस्टम—से मजबूत किया जाएगा, ताकि अधिक प्रभावी परिणाम मिल सकें।”
वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इस पहल के बाद मानव-हाथी संघर्ष के मामलों में स्पष्ट कमी आई है। फसलों के नुकसान में भी गिरावट दर्ज की गई है और ग्रामीणों में जागरूकता बढ़ी है। लोग अब हाथियों को खतरे के रूप में देखने के बजाय उनके साथ सह-अस्तित्व की दिशा में सोचने लगे हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर सराहना
प्रधानमंत्री द्वारा ‘गज मित्र’ पहल का उल्लेख किए जाने के बाद यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। गुजरात में ग्रेटर फ्लेमिंगो, छत्तीसगढ़ में ब्लैक बक और राजस्थान-गुजरात में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण के साथ यूपी का यह प्रयास एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘गज मित्र’ जैसी सामुदायिक भागीदारी वाली योजनाएं ही भविष्य में वन्यजीव संरक्षण की कुंजी साबित होंगी। यदि इस मॉडल को और मजबूत किया जाए, तकनीकी संसाधनों से जोड़ा जाए और अन्य राज्यों में भी लागू किया जाए, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश का यह प्रयास यह साबित करता है कि जब स्थानीय समुदाय और प्रशासन साथ मिलकर काम करते हैं, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का समाधान संभव है। ‘गज मित्र’ अब सिर्फ एक पहल नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की एक नई सोच बन चुकी है।





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