
रफ्तार पर लगाम: जब तकनीक ही बने जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा
कानपुर में हालिया हादसा और उससे पहले पुणे में हुआ हाई-प्रोफाइल सड़क मामला, दोनों ने एक बार फिर यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि क्या केवल कानून और जागरूकता के सहारे तेज़ होती गाड़ियों को काबू में किया जा सकता है? जिस तरह से सड़कों पर बेलगाम रफ्तार आम होती जा रही है, उससे साफ़ है कि अब सिर्फ चेतावनी, चालान और अपीलें नाकाफी साबित हो रही हैं। ज़रूरत है ऐसे ठोस और तकनीकी समाधान की, जो मानवीय चूक की गुंजाइश ही खत्म कर दे।
आज हालत यह है कि शहर की सीमाओं में भी वाहन ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे वे किसी रेस ट्रैक पर हों। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी हो या कैमरे, सब कुछ जानते हुए भी चालक बेखौफ हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि या तो बच निकलेंगे या मामला संभाल लिया जाएगा। यह मानसिकता आम नागरिकों के लिए जानलेवा बन चुकी है। ऐसे में सबसे पहला कदम होना चाहिए — अनियंत्रित और ओवरस्पीडिंग गाड़ियों का तुरंत ऑटोमैटिक चालान, बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के, ताकि प्रभाव, पहचान या रसूख की कोई भूमिका न रहे।
लेकिन सिर्फ चालान से बात नहीं बनेगी। अब समय आ गया है कि हम हाईटेक स्पीड कंट्रोल सिस्टम की दिशा में गंभीरता से सोचें, जिसमें वाहन खुद ही तय सीमा से अधिक तेज़ न चल सके। जैसे एयर कंडीशनर में तापमान की एक सीमा तय होती है, वैसे ही गाड़ियों में स्पीड लिमिटर को अनिवार्य और नॉन-रिमूवेबल बनाया जाए। शहर, हाईवे, स्कूल ज़ोन और रिहायशी इलाकों के हिसाब से डिजिटल जियो-फेंसिंग के जरिए गाड़ी की अधिकतम गति अपने आप निर्धारित हो जाए। ड्राइवर चाहे भी तो वह सीमा पार न कर सके।
यह तकनीक कोई कल्पना नहीं है। दुनिया के कई देशों में इंटेलिजेंट स्पीड असिस्टेंस (ISA) जैसे सिस्टम पहले से लागू हैं, जो सड़क के साइन, जीपीएस और सेंसर के ज़रिए वाहन की गति नियंत्रित करते हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ हर साल लाखों सड़क दुर्घटनाएँ होती हैं, यह व्यवस्था जीवनरक्षक साबित हो सकती है। इससे न केवल दुर्घटनाएँ कम होंगी, बल्कि ड्राइविंग कल्चर में भी बुनियादी बदलाव आएगा।
इस तरह की तकनीकी सख्ती का एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि मानवीय लापरवाही, नशे की हालत और गुस्से में ड्राइविंग जैसे जोखिम स्वतः सीमित हो जाएँगे। जब वाहन तय सीमा से ऊपर जा ही नहीं सकता, तब रफ्तार का उन्माद भी खत्म हो जाएगा। इससे सड़कें केवल यात्रा का माध्यम नहीं, बल्कि सुरक्षित सार्वजनिक स्थान बन सकेंगी।
दरअसल, आज सबसे बड़ा संकट यह है कि आम लोगों की ज़िंदगी सस्ती होती जा रही है। किसी की एक लापरवाही, किसी का एक घमंड, किसी की एक गलत हरकत — और कई घर उजड़ जाते हैं। अगर अब भी हमने तकनीक को मानवीय सुरक्षा की ढाल नहीं बनाया, तो सड़कें रोज़ किसी न किसी की चिता बनती रहेंगी। इसलिए यह महज़ ट्रैफिक सुधार का सवाल नहीं, बल्कि मानव जीवन के संरक्षण का राष्ट्रीय एजेंडा बनना चाहिए।
कानपुर और पुणे की घटनाएँ हमें साफ़ संकेत देती हैं कि अब सुधार की गति हादसों की गति से तेज़ होनी चाहिए। रफ्तार पर नियंत्रण, स्वचालित चालान और अनिवार्य स्पीड लिमिटिंग सिस्टम — यही वह रास्ता है जो सड़कों को फिर से सुरक्षित बना सकता है। अन्यथा, आम आदमी की ज़िंदगी यूँ ही किसी न किसी बेकाबू गाड़ी के नीचे दबती रहेगी, और हम हर बार सिर्फ एक नई खबर पढ़कर आगे बढ़ते रहेंगे।
Ankit Awasthi
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