
राज्य कर के संघो की नाराजगी 2027 मे न पड जाए भारी
लखनऊ। यूपी मे विधानसभा चुनाव 2027 मे है जिसको लेकर राज्य की भाजपा सरकार ने तैयारी शुरू कर दी, इसके लिए सरकार सोशल इंजीनियरिंग के जरिए हर तबके को टटोलने की भी कोशिश कर रही है। ऐसे मे सरकारी एजेंसियों के लिए यह जानना जरुरी है कि प्रदेश के सबसे बडे मानव सम्पदा वाले राज्य कर विभाग मे नौकशाहो ने सरकारी मुलाजिमों व सरकार के बीच भारी खाई खोद दी है कारण यह है कि विभाग के इतिहास मे अधिकारियों/ कर्मचारियों की मांगो को कभी भी इतने हल्के मे नही लिया गया, लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चुनकर आए संघो के अध्यक्ष व महासचिव की हालत यह है कि उनको भी अपने सदस्यों की समस्याओं को लेकर गणेश परिक्रमा करनी पड़ रही है। ऐसे मे सदस्यो की लाचारगी लाजमी है। कारण यह है कि वर्तमान मे विभाग के किसी भी संघ के पास एक भी चेहरा ऐसा नही है जो सीधी सीएम से मिलकर अपनी बात रख सके। वही पिछले अनुभवो को देखते हुए वर्तमान के नौकर शाह भी यह जान चुके है कि संघ के पदाधिकारी अधिवेशन के मंच के कलाकार मात्र है। खुलकर संघर्ष करने के लिए अच्छी तैनाती का मोह छोडने का दम रखने वाले ही संघ मे स्थान बना सकेगें।
सरकार के लिए यह जानना जरुरी है कि विभाग के नौकर शाह न्थायालयो के आदेशो का पालन तक करवाने मे समीक्षा करते है। यही कारण है कि कोर्ट से स्थगन आदेश पा चुके निलंबित अधिकारियों को अपनी बहाली के आदेश का पालन करवाने के लिए अवमानना याचिका के रुप मे पुनः कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड रहा है अभी तक लगभग 20 अधिकारियों को अवमानना याचिका दायर करनी पडी इसके बाद कोर्ट के आदेश का पालन हो सका। अगर सुप्रीम कोर्ट की तरह हाई कोर्ट एक दो नौकरशाओं को व्यक्तिगत रूप से तलब करके इनकी काबिलियत का परीक्षण कर लेती तो कोर्ट से भी ऊपर करने का सारा नशा काफूर हो जाता ऐसा विभाग के अधिकारियों का मानना है। हालत यह है कि जिन अधिकारियों की पदोन्नति 10 साल की संतोषजनक सेवाएं पूरी होने के बावजूद भी 15 सितंबर 2025 को होने की जगह पर अप्रैल 2026 तक नहीं हो सकी इसके बावजूद भी अधिकारी संगठनों का याचना और स्तुति का कार्यक्रम जारी है जो कि संघ के सदस्यों को भारी निराशा व अंधकार की ओर धकेल रहा है ऐसे में विभाग के संगठनों के सदस्यों को अगले चुनाव में प्रत्याशी की व्यक्तिगत क्षमता का आकलन करने के बाद ही वोट डालना होगा।





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