
न्याय की प्रतीक्षा में देश: अदालतों में लंबित मामलों पर चिंतन
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को त्वरित और निष्पक्ष न्याय का अधिकार देता है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर न्याय की यह अवधारणा आज अदालतों में लंबित मामलों के भारी बोझ के नीचे दबती जा रही है। करोड़ों मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना केवल न्यायिक व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि यह लोकतंत्र, सामाजिक विश्वास और मानवीय गरिमा का गहरा संकट बन चुका है। जब न्याय समय पर नहीं मिलता, तो कानून केवल किताबों में रह जाता है और आम नागरिक के जीवन से उसका विश्वास धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
वर्तमान समय में देश की विभिन्न अदालतों में लगभग पाँच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मुकदमों की है जो पाँच, दस, यहाँ तक कि बीस वर्षों से भी अधिक समय से विचाराधीन हैं। यह केवल आँकड़ों की समस्या नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी पीड़ा की कहानी है। हर लंबित मामला किसी किसान की ज़मीन का संघर्ष है, किसी मजदूर की मेहनत की कमाई है, किसी महिला की न्याय की पुकार है और किसी बुज़ुर्ग की अंतिम आशा है। हर तारीख के साथ केवल मुकदमा नहीं टलता, बल्कि भरोसा, धैर्य और उम्मीद भी टूटती जाती है।
न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि न्याय में देरी स्वयं अन्याय के समान है। जब फैसले वर्षों तक नहीं आते, तो निर्दोष लोग जेलों में सड़ते रहते हैं, पीड़ित न्याय से निराश हो जाते हैं और दोषी कानूनी जटिलताओं का लाभ उठाकर खुले घूमते रहते हैं। इससे समाज में कानून का भय कम होता है और धीरे-धीरे भीड़ न्याय, बदले की भावना और अराजक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है। कानून जब समय पर प्रभावी नहीं होता, तब समाज वैकल्पिक रास्ते खोजने लगता है, जो अंततः सामाजिक अस्थिरता को जन्म देता है।
लंबित मामलों के पीछे कई गहरे कारण हैं। न्यायाधीशों की भारी कमी इस संकट का प्रमुख कारण है। भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर जजों की संख्या वैश्विक मानकों से काफी कम है, जिससे एक न्यायाधीश पर अत्यधिक बोझ पड़ता है। इसके अतिरिक्त, जटिल प्रक्रियाएँ, बार-बार स्थगन, अनावश्यक औपचारिकताएँ और वकीलों की हड़तालें भी मामलों को वर्षों तक खींचती हैं। तकनीकी पिछड़ापन और डिजिटल व्यवस्था की सीमाएँ भी न्याय प्रक्रिया को धीमा बनाती हैं। इसके साथ ही, सरकारी विभागों द्वारा अनावश्यक अपील और मुकदमेबाज़ी भी अदालतों पर अतिरिक्त दबाव डालती है।
इस न्यायिक विलंब का प्रभाव केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर समाज की मानसिकता और लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है। जब नागरिक वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते हैं, तो उनका संविधान, कानून और शासन प्रणाली पर विश्वास डगमगाने लगता है। गरीब और कमजोर वर्ग यह मानने लगता है कि न्याय केवल धनवान और शक्तिशाली लोगों के लिए है। इससे सामाजिक असंतोष बढ़ता है, लोकतंत्र कमजोर होता है और कानून व्यवस्था पर खतरा उत्पन्न हो जाता है।
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए त्वरित और ठोस एक्शन प्लान की आवश्यकता है। सबसे पहले युद्धस्तर पर न्यायाधीशों की नियुक्ति की जानी चाहिए, ताकि अदालतों पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके। प्रत्येक मुकदमे के लिए अधिकतम समय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए, जिससे वर्षों तक खिंचने वाली प्रक्रिया समाप्त हो सके। बार-बार तारीख देने की संस्कृति पर कठोर नियंत्रण लगाया जाए और अनावश्यक स्थगन पर दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाएँ। डिजिटल न्याय प्रणाली को मजबूत बनाते हुए ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और आधुनिक केस ट्रैकिंग सिस्टम को हर अदालत तक पहुँचाया जाए। सरकार को भी अपनी अपील नीति में संयम बरतना चाहिए और केवल अत्यंत आवश्यक मामलों में ही उच्च अदालतों का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए। साथ ही लोक अदालत, मध्यस्थता और सुलह जैसे वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र को व्यापक रूप से अपनाकर छोटे मामलों का त्वरित समाधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय भरोसे का आधार होता है। वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटते बुज़ुर्ग, अपनी जवानी मुकदमों में गंवा चुके युवा और टूटती उम्मीदों के साथ न्याय की प्रतीक्षा करती महिलाएँ — ये सभी हमारी व्यवस्था के मौन साक्ष्य हैं। हर लंबित मामला एक टूटती आत्मा और एक बुझती उम्मीद की कहानी कहता है। यदि न्याय समय पर नहीं मिला, तो यह केवल व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार बन जाती है।
अंततः यह स्वीकार करना होगा कि न्याय की गति ही लोकतंत्र की वास्तविक गति है। जिस देश में फैसले दशकों में आते हों, वहाँ कानून नहीं, केवल प्रक्रियाएँ बची रह जाती हैं। अब समय आ गया है कि भारत न्याय को फाइलों और तारीखों के जाल से निकालकर आम नागरिक की ज़िंदगी तक पहुँचाए। क्योंकि तेज़, सुलभ और निष्पक्ष न्याय केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक सभ्य समाज की पहचान है। समय पर मिला न्याय ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत और मानवीय गरिमा की सच्ची रक्षा है।
Ankit Awasthi
लेखक के पत्रकारिता जीवन के चुनिंदा लेखों का संग्रह किताब के रूप में प्रकाशित हो चुका है, नीचे दिये गये लिंक से आप पुस्तक खरीद सकते है।





Leave A Comment
Don’t worry ! Your email address will not be published. Required fields are marked (*).