
पुरुलिया विधानसभा सीट: पहचान, पिछड़ापन और 2026 के चुनाव
पश्चिम बंगाल का पुरुलिया ज़िला अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, छऊ नृत्य, पहाड़ियों और लोकपरंपराओं के लिए जाना जाता है। राज्य के नक्शे में यह जिला एक अलग रंग भरता है, लेकिन विकास के पैमाने पर आज भी यह काफी पीछे खड़ा दिखता है। आने वाले विधानसभा चुनावों में पुरुलिया की एक प्रमुख सीट पर होने वाला राजनीतिक मुकाबला सिर्फ सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि दशकों से उपेक्षित इस क्षेत्र की दिशा तय करने का अवसर भी है।
जमीनी हकीकत: पहचान है, विकास नहीं
पुरुलिया की सबसे बड़ी समस्या उसका भौगोलिक और प्रशासनिक अलगाव है। यह जिला बंगाल के औद्योगिक और शहरी केंद्रों से दूर स्थित है, जिससे यहां निवेश और आधारभूत सुविधाओं की रफ्तार धीमी रही। खेती मुख्य आजीविका है, लेकिन सिंचाई सुविधाओं का अभाव, सूखे जैसी स्थिति और परंपरागत खेती के चलते किसान आज भी संघर्षरत हैं। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं, जिसके कारण बड़े पैमाने पर पलायन होता है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी औसत से नीचे है, जहां प्राथमिक सुविधाएं तो मौजूद हैं, लेकिन गुणवत्ता और पहुंच दोनों ही कमजोर हैं।
राजनीतिक परिदृश्य: भरोसे की तलाश
पुरुलिया की यह विधानसभा सीट लंबे समय तक वैचारिक राजनीति का गढ़ रही है। यहां मतदाता भावनात्मक अपील से ज्यादा जमीन से जुड़े मुद्दों पर वोट देता रहा है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में यह साफ दिखा कि लोगों का भरोसा राजनीतिक दलों से धीरे-धीरे खिसक रहा है। वादे हुए, योजनाएं बनीं, लेकिन उनका असर गांवों और कस्बों तक पूरी तरह नहीं पहुंच सका। नतीजा यह कि मतदाता अब बड़े नारों के बजाय ठोस काम और विश्वसनीय नेतृत्व तलाश रहा है।
विकास में बाधाएं: सिर्फ संसाधन नहीं, नीति की कमी
पुरुलिया के पिछड़ेपन की वजह सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि योजनाओं के क्रियान्वयन में ढिलाई और स्थानीय जरूरतों की अनदेखी भी है। यहां की जलवायु और भूगोल को देखते हुए अलग विकास मॉडल की जरूरत थी, लेकिन वही शहरी-केंद्रित योजनाएं यहां भी लागू कर दी गईं, जिनका वास्तविक लाभ सीमित रहा। स्थानीय कारीगरी, वन आधारित उत्पाद और पर्यटन जैसी संभावनाओं को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। प्रशासनिक स्तर पर भी समन्वय की कमी ने विकास की गति को और धीमा किया।
2026 चुनाव: क्या बदल सकता है समीकरण?
आगामी विधानसभा चुनाव में इस सीट पर मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि उम्मीद और निराशा के बीच होगा। मतदाता अब यह देखना चाहता है कि कौन सा प्रत्याशी स्थानीय मुद्दों को समझता है और उनके लिए लगातार संघर्ष कर सकता है। पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी सवाल इस चुनाव के केंद्र में होंगे। यदि कोई दल केवल भावनात्मक या पहचान आधारित राजनीति पर निर्भर रहा, तो उसे जनसमर्थन हासिल करना मुश्किल होगा।
क्या चाहिए पुरुलिया को: एक व्यावहारिक रोडमैप
पुरुलिया के लिए सबसे पहले जल प्रबंधन और सिंचाई पर ठोस काम जरूरी है। छोटे बांध, वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई योजनाएं खेती को नई जान दे सकती हैं। इसके साथ ही वन आधारित उद्योग, हथकरघा, हस्तशिल्प और लोककला को बाजार से जोड़कर स्थानीय रोजगार सृजित किया जा सकता है। पर्यटन की अपार संभावनाओं को विकसित कर होमस्टे, गाइड और स्थानीय व्यवसायों को बढ़ावा दिया जा सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश कर मानव संसाधन को मजबूत बनाना भी उतना ही जरूरी है।
पुरुलिया की यह विधानसभा सीट केवल एक राजनीतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि बंगाल के उस हिस्से का प्रतीक है जिसे आज भी विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का इंतजार है। आने वाला चुनाव इस बात की परीक्षा होगा कि क्या राजनीति यहां केवल सत्ता की अदला-बदली तक सीमित रहेगी या वास्तव में बदलाव की नींव रखेगी। अगर मतदाता जागरूक होकर सही सवाल पूछे और नेता जमीन से जुड़ी सोच के साथ आगे आएं, तो पुरुलिया अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ विकास की नई कहानी भी लिख सकता है।
Ankit Awasthi
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